पथ के साथी

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Friday, August 21, 2026

1514-वह स्त्री है

 

[आपने स्त्री जीवन के संघर्ष को पीड़ा को समझा अपने शब्दों से उसके मौन स्वर को मुखरित किया। साधुवाद आदरणीय। उसी कविता की अंतिम पंक्ति से जोड़कर मैंने-‘ स्त्रीहै’  कविता अभी लिखी है।]

 

  स्त्री है /  डॉ. वंदना शर्मा 

  


वह निष्प्राण- सी है अपनी मर्यादाओं के कारण

लेकिन मरती नहीं है

क्योंकि स्त्री है 

सृजन करती है दर्द सहकर 

विनाश भी कर सकती है महाकाली बनकर 

वह  शक्ति है जग की 

उसकी जिजीविषा को कोई नहीं हरा सकता 

समाज ने डाली बेड़ियाँ पैरों में उसके 

ताकि उसकी उड़ान रोक सके; 


पर बहती हवा को
 

कौन रोक पाया है आज तक 

उसके लिए कोई व्रत नहीं रखा जाता 

कोई मन्नत नहीं माँगी जाती 

फिर भी वह  जीती है ज्यादा 

बो जाते हैं बेटे उग आती हैं बेटियाँ 

स्प्रिंग देखा है कभी आपने 

जितना दबाओं उतना उछलता है 

स्त्री की असीम शक्ति से डर 

लगाई पाबंदी पुरुष समाज ने 

पर वह  शक्ति और अधिक मुखरित हुई 

अपनी राह खुद बनाई 

वह  चांद पर जा वापिस आई 

हर अभेद क्षेत्र में परचम लहराया 

नभ अपने कदमों में झुकाया 

क्योंकि व स्त्री है 

हार नहीं सकती 

परिस्थितियाँ अनुकूल भले न हो 

वह  ड़ना जानती है 

वह  स्त्री है 

हर सीमा से परे 

हर बाधा उससे डरे 

वह  कुछ भी कर सकती है 

शक्ति बिना शिव अधूरे 

शक्ति से हो सारे कार्य पूरे 

कण- कण में व्याप्त है जो

जो ऊर्जा, जो प्राण है 

वह  स्त्री है

-0-

Tuesday, August 11, 2026

1507

 

शब्द खामोश क्यों हो जाते हैं / डॉ. वंदना शर्मा

 

एक उम्र पर आकर  

शब्द खामोश क्यों हो जाते हैं  

अक्सर बहुत बोलने वाले  

मौन क्यों हो जाते हैं  


 

आसमाँ वही है, वही है धरती  

मौसम के मायने बदल क्यों जाते हैं  

जिसको पाने की जिद में उम्र गुजारी  

उसको पाकर भी हाथ खाली रह जाते हैं  

 

खुशी एक छलावा है पल भर का  

वो पल बीतते ही भाव खुशी के  

नीरस हो जाते हैं  

 

जाने किस अंधी दौड़ में  

दौड़ रही है दुनिया सारी  

जब सब कुछ खो जाए  

कुछ पाने के अर्थ व्यर्थ हो जाते हैं  

 

कभी जिससे बात करने को  

तरसता था मन सारे दिन  

सामने पाकर उसे अपने  

लब खामोश क्यों हो जाते हैं  

 

चारों तरफ मेला है भीड़ का  

फिर भी क्यों हम खुद को  

भरे मेले में अकेला पाते हैं  

 

गलत कहते हैं लोग अक्सर  

अज्ञानता दुख का कारण है  

मैंने तो देखा है अक्सर  

सब जानकर रिश्ते टूट जाते हैं।

-0-

Sunday, July 12, 2026

1504

1-नवगीत

मौसम   का  अभिमान /  विज्ञान   व्रत

 


पता   नहीं  अब  

क्या   कर  डाले

मौसम   का  अभिमान  

 

दहशत   में    हैं   जंगल    सारे

सहमे - सहमे     पेड़      बिचारे

                    मन  ही  मन  में

                    घुटते   हैं    बस

                    अब   इनके   अरमान 

 

जड़ी - बूटियाँ   काँप   रही   हैं

इसके   रुख़  को  भाँप  रही  हैं

                    आज  दाँव   पर 

                    लगी    हुई     है 

                    इन   सबकी   पहचान

 

पशु - पक्षी भी  बहुत  विकल हैं

सभी युक्तियाँ  आज  विफल  हैं

                    सन्नाटे में

                    और  डराएँ

                    अनचाहे  अनुमान 

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2- मन बेचारा/ डॉ.सुरंगमा यादव

 


आगत और विगत में उलझा

 वर्तमान से उदासीन मन

 कभी भविष्य के सपने गढ़ता

 कभी अतीत में ढूँढे सुख- क्षण

 जिसने पाया सहज- सहज सब

 उसको भी विश्राम नहीं है

भौतिकता की नेति-नेति में

 जाने क्या पाने की धुन में

 भटका फिरता मन बेचारा

 अधिक,अधिकतर और अधिकतम

गति का कोई ध्यान नहीं है

 हर पथ पर है गति की सीमा

 गति की लय खोना है-

  जीवन की लय  खोना

 संघर्षों के फेज़ में है जो

 सवालिया नजरों में है वो

 राह नहीं जब मिल पाती है

 खीज बहुत खुद पर आती है

  मन कितना विचलित होता है

 विश्वास नहीं खुद पर होता है

  समझेंगे दुनिया वाले

उँगली महज उठाने वाले।

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2-क्षणिकाएँ/ डॉ.सुरंगमा यादव

1

जिसने होठों को सिया है

 दम घुटने का अनुभव

 उसने किया है।

2

 उजियारों के बीच खड़ा

 अँधियारों में डूबा मन

 अपनी ही छत और दीवारों से

पाता मन अपनापन

3

 चाहा बहुत भुलाना  लेकिन

 अतीत खड़ा किरदार या बन

 चोट फिर- फिर चोट पड़े तो

 कब तक बिखरेगा मन।

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3-कविता जीवन का मर्मडॉ.वंदना शर्मा

 

लिखा है क्या हाथों की लकीरों में  

छुपा है क्या इन तकदीरों में  

मिलता है वही, होता है जो नसीबों में  

सिर्फ मेहनत करने से नहीं मिलती सफलता  

खेल विधाता का कोई नहीं समझ सकता  

 

होना था जिस दिन राम का राज तिलक  

हुआ वनवास उसी दिन, लगा कैकेयी पर कलंक  

होनी थी हो गई टाल सका ना कोई  

भविष्य की गर्त में राज छिपे हैं कई  

 

चक्र है ये कर्मिक फल का  

हिसाब है ये कई जन्म का  

नहीं ज्ञात कौ-न सा कर्म  

बदल देगा अगले जन्म का मर्म  

 

रहता है इंसान इसी भ्रम  

'मैं' करता ना समझता कर्म-  

कर्ता करे ना कर सके  

बाल ना बाँका होय

 

जिसकी किस्मत महाकाल लिखे 

उसकी बिगाड़ सके ना कोई  

कब किससे कैसे मिलना है  

कर्मों का फल जरूर मिलना है  

 

दीन सेवा ही परम धर्म है  

अक्षर नाद ही परम ब्रह्म है  

तप वाणी का जिसने किया  

मोह छोड़ पर उपकार किया  

सुधारा उसने अपना कर्म है  

यही जीवन का मर्म है।

-0-डॉ. वंदना शर्मा पांडव नगर नई दिल्ली 

vandna.reporter@gmail.com

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4-अनुरोध/ रश्मि लहर

 


व्यर्थ-सा लगने लगा है

     वर्जनाओं का सघन पथ

        सारथी जीवन के रथ के तुम! 

            तनिक अब ध्यान रखना।

 

हाथ में वल्गा तुम्हारे, दीखते घबराए हो तुम।

साथ में सहचर लिये पर, लग रहे अकुलाए क्यों तुम?

 

ज्ञात तुमको हो ग हैं

     दुःसह सच संबंध के पर;

        हो सके तो समर्पण की 

            वेदना का मान रखना।

 

सुर तुम्हीं ने तो दिया था, स्वप्न की उद्विग्न लय को।

फिर नया जीवन दिया था, शुष्क- सी निस्तेज वय को।

 

तोड़ सकते तंतु हो विश्वास के

     अनुबंध के पर;

         प्रणय के मृतवत अधर पर

            चेतना का गान रखना।

 

सारथी जीवन के रथ के तुम, तनिक अब ध्यान रखना।।

सारथी जीवन के रथ के तुम, तनिक अब ध्यान रखना।।

 

-0- इक्षुपुरी कॉलोनी, लखनऊ-226002

मोबाइल नंबर -9794473806

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