पथ के साथी

Thursday, March 6, 2014

मेरी नई कविताएँ

मेरी नई कविताएँ –डॉ सुधेश

1-साधक की खोज

ख़ुशामदी अवसरवादी
तोता चश्म यशलोभी
निकले आगे
और आगे और आगे
मैं धिकलता गया पीछे
और पीछे और पीछे
साधक की खोज हुई
आगे बहुत भीड़ थी
पीछे वालों में
सरस्वती की करुण दृष्टि
पड़ गई मुझ पर
बिना याचना के
मैं पाया गया
प्रथम ।
-0-

2-दु:ख कहाँ है

दु:ख सब को माँझता है
पर जो दु:ख को
काली कमाई से माँज कर
सुख की मरीचिका में बदलते
पूछते हैं-
दु:ख कहाँ है
मन का भ्रम है
भक्ति का पर्याय
परोपकार का बीज है ।
  पर उन का क्या होगा
    जो दु:ख की पहाड़ियों में दबे
    मौत माँगते हैं ?
-0-



   

Monday, March 3, 2014

रेत के आशियाँ

 रेनू सिंह  आगरा विश्वविद्यालय से एम. एस –सी. भौतिकी ।
केन्द्रीय विद्यालय आयुध उपस्कर निर्माणी की 2008 बैच  में कक्षा 12 की छात्रा रही है।मुझे कुछ समय हिन्दी शिक्षण का अवसर  मिला । केन्द्रीय माध्यमिक बोर्ड की कक्षा 12 में हिन्दी में 98% अंक लाकर  विशिष्ट प्रमाण –पत्र प्राप्त किया । यहाँ इनकी दो कविताएँ दी जा रही हैं । आशा है इनको आप सबके द्वारा प्रोत्साहन  मिलेगा।
-रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’
-0-

 रेनू सिंह

सच्चे लोग चले जाते हैं,
कदमों के निशाँ नहीं मिलते।
उनकी धड़कन में बसे हुए,
यादों के जहाँ नहीं मिलते।
कितना सुन्दर सपना था वो,
अक्सर जो देखा करते थे।
कितना सक्षम भव्य भारत था,
वे हरदम सोचा करते थे।
सुख व शांति के अनमोल बीज,
जहाँ-तहाँ वे उगा कर गए.
प्रेम मार्ग सदा अपनाना,
ये सीख हमें बता कर गए.
घृणा-द्वेष सब कुछ दूर हो,
ऐसा जतन किया करते थे।
क्षमादान ह़ी महादान है,
वे यह सीख दिया करते थे।
अनेक सुनहरी पुस्तकों में,
उनके नाम दोहराए जाएँगें।
जिनकी महान गाथा सुनकर,
हम अपना शीश झुकाएँगे।
स्वर्णिम काल गुजर गया है,
पर आगे नया जमाना है।
दफ़न पड़े सपनों को,
हमें अब जी कर दिखाना है।

-0-
1-डर
डर था अगर  अँधेरे में  खोनॆ का,
 तो यूँ हसीन सपने सजा ना  होते।
 परवाह थी इन तेज हवाओं की अगर,
तो रेत के आशियाँ बनाये ना होते।
डर था अगर गिरकर चोट खाने का,
तो अपने कदम आगे  ढ़ाए ना होते
इतने ही पस्त होने थे अगर हौसले,
तो अपने  पंख यूँ फैला ना होते।
डर था अगर हारकर टूट जाने का,
तो दिये उम्मीद के जला ना होते।
थमकर यूँ ही ठहर जाना था अगर,
तो गीत खुशी के गाये ना होते।
2-ज़रूरी है
गुजरते हुए वक़्त के साथ ठहराव जरूरी है,
युग बदलेंगे, लेकिन खुद में बदलाव जरूरी है
तरक्की का परचम लहरा रहा है आसमान में,
चाँद को भी छू रहा है इन्सान ये।
पर अपनी धरती से भी जुड़ाव जरूरी है
गुजरते हुए वक़्त के साथ ठहराव जरूरी है।
मॉडर्न सोच का माहोल यूँ छा रहा है
ये विज्ञान वरदान नए मौके ला रहा है
पर अपनी संस्कृति से भी लगाव जरूरी है
गुजरते हुए वक़्त के साथ ठहराव जरूरी है।
इंसानियत खो ग है इस दौड़ में कहीं,
दिल से तो अब कोई सोचता ही नहीं।
इस बदलती सोच से अपना बचाव जरूरी है
गुजरते हुए वक़्त के साथ ठहराव जरूरी है

-0-

Thursday, February 27, 2014

वह दौर यह दौर

मंजु मिश्रा

(माँ-बाप की तरफ से कुछ शब्द अपने बड़े हो गए बच्चों के लिए आजकल घर-घर में ये फिकरे आम हो गए हैं- "you don't know mom/dad  or you won't understand it"- बस उसी अनुभव से उपजी यह कविता )
हमें नादाँ समझते हो, और ये भूल बैठे हो
हमीं ने उँगलियाँ थामीं तो तुमने चलना सीखा है
                   **
न होते हम अगर उस दौर में तो तुम जरा सोचो
गिरते और सँभलते कितनी चोटें खा गए होते
                   **
मगर ये फर्ज था माँ-बाप का, कर्जा नहीं तुम पर
न रखना बोझ दिल पर और चुकाने की न सोचो तुम
                   **
जहाँ भी तुम रहो खुशहाल बस इतनी- सी ख्वाहिश है
 हमारा क्या है अपनी जिंदगी तो जी चुके हैं हम
                   **



Tuesday, February 25, 2014

जीवन के बहाने -दो कविताएँ

1-कुर्सी और कविता
कमला निखुर्पा
कुर्सी जीने नहीं देती
कविता मरने नहीं देती
चारों पायों ने  मिलकर जकड़ रखा है
उड़ने को बेताब कदमों को

हाथों में थमी कलम
दौड़ने को विकल

कल्पना की घाटी में
जहां फूलों की महक में
कोई सन्देश छुपा है
जहां पंछियों के कलरव में
 मधुर संगीत गूंजा है
 अभी-अभी जहां बादलों ने
 सूरज से आंखमिचौली खेली है

वो प्यारी सी रंगीन डायरी
जाने कब से उपेक्षित है
धूल से सनी कोने पे पड़ी
हर रोज नजर आती है
और मैं नजरें चुरा लेती हूँ

फाइलों के ढेर में डूबती जा रही कविता
टूटती साँसों के बीच
कहीं दूर से इक हवा का झोंका
कानों में कुछ कह जाता है
बंद लिफ़ाफ़े से झाँककर
खिलखिला उठती है किताबें
किताबों में पाकर अपनी खोई सहेलियों को
फिर से जी उठती है कविता

सारे बंधनों  के बीच भी
आजादी के कुछ पल
पा लेती है कविता
जी लेती है कविता |
-0-

इस कविता को पढ़कर कुछ पंक्तियाँ अनायास कलम की नोक पर आईं, कुछ इस तरह-

2-जीने को जी चाहे ।
रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

कुछ लोग हैं इतने शातिर
कि जीने नहीं देते
और कुछ है इतने प्यारे कि
प्राण होठों पे   लगे हों
मरने को मन करे
तो प्यार का इतना अमृत उडेल देते हैं कि
मरने नहीं देते ,
क्योंकि दुनिया उन्हीं के दम पर
इतनी खूबसूरत है कि
सदियों जीने को जी चाहे ।

-0-

Sunday, February 23, 2014

खूबसूरत सफ़र

अनिता ललित
1
मेरी दूर की नज़र कमज़ोर,
पास की सही !
तुम्हारी पास की नज़र कमज़ोर,
दूर की सही !
तो चलो फिर !
तुम दूर की ज़िन्दगी सँवार लो...
मैं पास की ज़िन्दगी सँवार लूँ...
अपने 'साथ' के सफ़र को ख़ूबसूरत  बना लें हम ...!!!
       2
       जब भी मेरे दिल में कोई तूफ़ानी लहर उठती है...
       मेरी नज़रें तुम्हें तलाशती हैं...
       हाथ तुम्हारा थामकर
       मैं सुकून से खुद को उस लहर के हवाले कर देती हूँ...
       तुम्हीं मेरी कश्ती, तुम्हीं पतवार..
       तुम साथ हो जब...
       मुझे डूबने का कोई डर नहीं...
       3
       जब तुम पास होते हो ...
       सबकुछ उजला-उजला लगता है,
       मैं भरी-भरी होती हूँ … !
       जब तुम पास नहीं होते...
       सबकुछ फीका-फीका हो जाता है ,
       और मैं.बिलकुल रीती हो जाती हूँ ....
      
       -0-





Wednesday, February 5, 2014

चलो मीत

रामेश्वर काम्बोज  हिमांशु
बहुत रहे हो इस जंगल में
अब तो यारो चलना होगा ।
जिसको समझा शुभ्र चाँदनी
वह सूरज है, जलना होगा ।
सोच-समझकर सदा बनाई
हमने अपनों की परिभाषा
फिर भी खाई चोट उम्रभर
अब हर शब्द बदलना होगा।
सूरज ढलता और निकलता
इसी फेर में ढली उमरिया 
चलो मीत अब बाट पुकारे
हमको दूर निकलना होगा ।
-0-
(25 दिसम्बर-2013)

Saturday, February 1, 2014

सीढ़ियाँ गवाह हैं ...





 सीढ़ियाँ गवाह हैं ...
कमला निखुर्पा
ये  खेतों की सीढ़ियाँ  गवाह हैं ...
एक ही साँस में, जाने किस आस में.... 
पूरा पहाड़ चढ़ जाती पहाड़न के पैरों की बिवाई को ...
रोज छूती हैं ये सीढ़ियाँ खेतों की ...
ये गवाह है -पैरों में चुभते काँटों की ....
माथे से छलकती बूँदों की ... 
जिसमें कभी आँखों का नमकीन पानी भी मिल जाता है .... 
ढलती साँझ के सूरज की तरह... 
किसी के आने की आस की रोशनी भी ....
पहाड़ के उस पार जाकर ढल जाती है... रोज की तरह ... 
धूप भी आती है तो मेहमान की तरह ...कुछ घड़ी के लिए ..
पर तुम नहीं आते ...
जिसकी राह ताकती हैं ,रोज ये सीढ़ियाँ खेतों की ... 
जिसकी मेड़ पर किसी के पैर का एक बिछुवा गिरा है ... 
किसी के काँटों बिंधे क़दमों से एक सुर्ख कतरा गिरा है ...
कितनी बार दरकी है... टूटी ह ये सीढ़ियाँ  खेतों की ... 
वो पीढ़ियाँ शहरों की ....कब जानेंगी ?
 !!!!

 -0-

Saturday, January 18, 2014

आहत हैं दिशाएँ

रामेश्वर काम्बोज  हिमांशु
1
तेज़ हवाएँ
घायल हुए डैने
उड़ें किधर जाएँ ?
कोहरा छाया
जीवन-पथ पर
आहत  हैं दिशाएँ।
2
कौन अपना?
हर साथी हो गया
इक टूटा सपना,
शब्दों की कीलें
चुभती दिन- रात
बोलो किसे बताएँ।
3
बेरुखी तोड़े
सारे प्यारे सम्बन्ध
जीवन-अनुबन्ध,
जब अपने
चोट दे मुस्कुराएँ
किसे दर्द बताएँ ?

-0-

Sunday, January 5, 2014

किसी से भी न गिला

1-डॉ ज्योत्स्ना शर्मा
1
सबसे न्यारी
खुशियों की दस्तक
बहुत प्यारी !!
2
मन- निर्मल
किसी से भी न गिला
कोई तो मिला ... :)
-0-
2-मुमताज टी एच खान
1
काँटे ही सही
सुख दुख के साथी
सोचे गुलाब
2
मानव वेश
लिये बैठे  भेदिये
नोचने दे
3
री गागर
यादों के सागर से
लक उठी ।

.-0-

Monday, December 23, 2013

तुम दर्द नहीं हो

डॉ.ज्योत्स्ना शर्मा

मधुर-मधुर ये गाया करती ,
सुन्दर छंद सुनाया करती ।

तुम कान्हा हो तो मधुबन में ,
रसमय रास रचाया करती ।

शिवमय होकर पतित-पावनी ,
गंगा -सी बह जाया करती ।

राम ,रमा-पति कण्ठ लगाते ,
मुग्धा बहुत लजाया करती ।

चाहत थी जो तुम छू लेते ,
कलियों- सी महकाया करती ।

तुम बिन गीत-ग़ज़ल में कैसे ,
इतना रस बरसाया करती ।

अच्छा है ! तुम दर्द नहीं हो ,

वरना कलम रुलाया करती ।

Wednesday, December 4, 2013

नवस्वर

ज्योत्स्ना प्रदीप, जलन्धर
  
श्रीमती विमल शर्मा
मैं
राधा न सही
मीरा न सही                                                
पर क्या मुझे तुम्हारे                            
वंशी-स्वर सुनने का
कुछ हक नहीं ?
तुम तो
बाँस के खोखलेपन को भी
भर देते हो।
छिद्रों को भी तो
स्वर देते हो।
फिर मैं
इतनी खोखली भी नहीं
आओ !
वेणु समझकर ही
अधरों से लगा लो
साँसें भरकर तो देखो
शायद, मुझमें भी
कोई नव-स्वर सुनाई दे।
-0-

कविता के साथ दी गई श्रीमती विमल शर्मा (ज्योत्स्ना प्रदीप की माताश्री) जी  की पेण्टिंग के लिए आभार !