शशि पाधा, वर्जीनिया, यू एस ए
माँ की ममता की छाया- सी
अधरों की
पहली भाषा है।
हिन्दी ही मेरी बाल सखा- सी
इस जीवन की परिभाषा है
अक्षर-अक्षर दीप जले हैं
अर्थ -अर्थ उजियारा है
हाथ कलम जब- जब भी थामी
हर शब्द को सँवारा है
बोलूँ तो कितना अपनापन
सोचूँ तो प्रेम समाया है
सात समन्दर, पर्वत लाँघे
भाषा ने
बाँध बनाया है ।
युगों- युगों से अविरल बहती
हिन्दी ही गंगा- धारा है
सूर कबीरा , तुलसी मीरा
ज्ञान
सभी का न्यारा है
माटी की सोंधी खुशबू इसमें
दादी की कथा कहानी है
माँ की लोरी, सीख पिता की
तुझसे ही सीखी - जानी है
दूर देश की धरती पर जब
मन ढूँढे कोई अपना
घर
तब गा लूँ कोई गीत पुराना
बाहों में भर ले ,
तू आकर
जब तक मन में शब्द रहेंगे
जब तक साँसें-धड़कन हैं
ओढूँ- पहनूँ रंग तेरे ही
तू माथे का चन्दन है
नई सदी के नए शब्द भी
हिन्दी में आन समाए हैं
भरती रहती निधियाँ इसकी
हर देस में दीप जलाए हैं
यही हमारी पूँजी अक्षय
हम सब की यही धरोहर है
हमें मिले संस्कार इसी से
हिन्दी
ही ज्ञान सरोवर है
पीढ़ी बदले समय बदलता
चाहे बदले घर परिवेश
जब तक हिन्दी संग रहेगी
संग रहेगा भारत देश
कहीं किसी भी देश में
जाऊँ
यह मुझको पास बिठाएगी
उँगली थामके मेरी यह
अपने घर तक ले
जाएगी
माँ की बोली, मन की भाषा
देवों का वरदान
है हिन्दी
मुझमें- इसमें अंतर कैसा
मेरी तो पहचान है हिन्दी
-0-
हिंदी दिवस को सार्थक करती हुई
ReplyDeleteप्यारी कविता है.. हिंदी दिवस की शुभकामनाएं.
शशि पाधा की कविता *"मेरी पहचान हिंदी"* हिंदी के प्रति आत्मीय जुड़ाव की मार्मिक अभिव्यक्ति है।
ReplyDeleteकवयित्री ने हिंदी को माँ की ममता की छाया, अधरों की पहली भाषा और बाल सखा कहा है। "अक्षर-अक्षर दीप जले हैं" जैसी पंक्तियाँ लेखन की साधना को दर्शाती हैं। सात समन्दर पार रहकर भी हिंदी ने बाँध बनाए रखा, यह प्रवासी मन की सच्ची पीड़ा और प्रेम है। डॉ वंदना शर्मा नई दिल्ली
माटी की सोंधी खुशबू, दादी की कथा, माँ की लोरी से जुड़ी यह कविता भावुक करती है। यह रचना बताती है कि हिंदी सिर्फ भाषा नहीं, हमारी पहचान है।