पथ के साथी

Friday, January 17, 2020

944

1-रश्मि शर्मा

फ़ोटोः रश्मि शर्मा

























-0-

2-प्रवासी वेदना-शशि पाधा

उड़ती- उड़ती-सी इक बदली
मोरे अँगना आई
मैंने पूछा मेरे घर से
क्या संदेशा लाई?
राखी के दिन भैया ने क्या
मुझको याद किया था
पंख तेरे संग बाँध किसी ने
थोड़ा प्यार दिया था
दीवाली की थाली में जब
सब ने दीप जलाएँ होंगे,
मेरे हिस्से के दीपों को
किसने थाम लिया था?
सच बताना प्यारी बहना
क्या तू देखके आई
उड़ते-उड़ते मेरे घर से
क्या संदेशा लाई
मेरी बगिया के फूलों का
रंग बताना कैसा था
उन मुस्काती कलियों में
क्या कोई मेरे जैसा था
‍मेरे बिन आँगन की ‍तुलसी
थोड़ी तो मुरझाई होगी
हर शृंगार की कोमल बेला
कुछ पल तो कुम्हलाई होगी
बचपन की उन सखियों को
क्या मेरी याद सताई
मैंने पूछा मेरे घर में
क्या-क्या देखके आई
आते-आते क्या तू बदली
गंगा मैया से मिल आई
देव नदी का पावन जल क्या
अपने आँचल में भर लाई
मंदिर की घंटी की गूँजें
कानों में रस भरती होंगी
चरणामृत की शीतल बूँदें
तन-मन शीतल करती होंगी
तू तो भागों वाली बदली
सारा पुण्य कमा कर आई
उड़ते-उड़ते प्यारी बहना
किससे मिल के आई
अब की बार उड़ो तो बदली
मुझको भी संग लेना
अपने पंखों की गोदी में
मुझको भी भर लेना
ममता -मूर‍‍त मैया को जब
मेरी याद सताएगी
देख मुझे तब तेरे संग वो
कितनी खुश हो जाएगी
याद करूँ वो सुख के पल तो
अँखियाँ भर-भर आईं
उड़ते-उड़ते प्यारी बदली
क्या तू देखके आई
और न कुछ भी माँगूँ तुमसे
बस इतना ही करना
मेरी माँ का आँगन बहना
खुशियों से तू भरना
सरस स्नेह की मीठी बूँदें
आँगन में बरसाना
मेरी बगिया के फूलों में
प्रेम का रंग बिखराना
जब-जब भी ‍तू लौटके आए
मुझको भूल न जाना
मेरे घर से खुशियों के
संदेश लेते आना।
घड़ी-घड़ी में अम्बर देखूँ
कब तू लौट के आई
मेरे घर से प्यारी बदली
क्या संदेशे लाई?'

Wednesday, January 15, 2020

943


बढ़ता चल
डॉ0 सुरंगमा यादव

अँधेरों से हम
नहीं डरने वाले
अँधेरों को करके
सूरज के हवाले
हम चलते रहेंगे
यूँ हीं मतवाले
पाँव में बेशक
पड़े अपने छाले
कंटकों से ही हमने
हैं काँटे निकाले
और क्या हम सुनाएँ
ढंग अपने निराले
चले जा रहे हम अकेले
खुद ही खुद को सँभाले
धरा भी अकेली
चाँद-सूरज अकेला
मगर उनका कोई
सानी नहीं है
कह रहा मन निरंतर
चलाचल
गँवा बिना पल
-0-


Sunday, January 5, 2020

942-आ लौट चलें!



डॉ.सुरंगमा यादव

आ लौट चलें बचपन की ओर

माँ की गोदी में छिप जाएँ
खींचे कोई डोर
हर आहट पर पापा-पापाकहते
भागें द्वार की ओर
मिट्टी के रंगीन खिलौने
मिल जाएँ तो झूमें -नाचें
कॉपी फाड़ें नाव बनाएँ
पानी में जब लगे तैरने
खूब मचाएँ शोर
भीग-भीगकर बारिश में
नाचें  जैसे मोर
गिल्ली-डंडा,खो-खो और कबड्डी
छुपम-छुपाई,इक्कल-दुक्कल,कोड़ा जमाल शाही
खेल-खेलकर करते खूब धुनाई
वह भी क्या था दौर!
कच्ची अमिया और अमरूद
पेड़ों पर चढ़ तोड़ें खूब
पकड़े जाने के डर से फिर
भागें कितनी जोर
आ लौट चलें बचपन की ओर!
-0-

Wednesday, January 1, 2020

941-जग बदले तो बात बने



 मुकेश बेनिवाल

जग बदले तो बात बने
हम बदलें तो बात बने
क्या होगा
तारीखों के बदलाव से
मन बदलें तो बात बने
ये बेसब्री ये उतावलापन 
साल का ये पागलपन
वो आधी रात तक जगना
वो जाम का छलकना
संदेशों का आदान-प्रदान
जश्न में डूबा ज़हान
हर साल एक और
ईंट जिन्दगी की ढह जाती है
आती- जाती ,घटती हुई
हर साँस ये कह जाती है
जिन्दगी कहाँ  सँभली है
सिर्फ़ तारीख ही तो बदली है
जज़्बात बदले तो बात बने
हालात बदले तो बात बने
दिन महीने साल नहीं
काली रात बदले तो बात बने

Thursday, December 19, 2019

940-एक शिक्षक से मिलिए


एक शिक्षक से मिलि
सुलक्षणा
     
अगर सीखनी है सहनशीलता ,
एक शिक्षक से मिलिए ।
अगर सीखनी है  सिखाने का धैर्य ,
एक शिक्षक से मिलिए । 

अगर सीखना है निष्ठापूर्वक करना परिश्रम,
एक शिक्षक से मिलिए 
अगर सीखनी है कर्मठता,
 एक शिक्षक से मिलिए ।

अपने बच्चों से तो सभी करते हैं प्यार ,
अगर सीखना है  दूसरे बच्चों के लिए 
प्यार और लगाव , स्नेह की फुहार
तो  एक शिक्षक से मिलिए ।

दान तो सभी देते हैं
अगर देना चाहते हैं -सच्चा दान 
 वह है शिक्षा का दान ,
 तो एक शिक्षक से मिलिए ।

अगर सीखना चाहते हैं देकर ,
कुछ पाने की इच्छा ना करना ,
तो एक शिक्षक से मिलिए । 

शिक्षक का आदिकाल में था बहुत सम्मान ,
पर खो रहा है अब उसका मान 
अगर सीखनी है ऐसी सहनशीलता ,
तो एक शिक्षक से मिलिए ।


ख़ूब मेहनत करने पर भी नहीं मिलता है
उसको उचित आदर सम्मान और स्थान 
अगर सीखना  है ऐसा कर्म निष्काम ,
तो एक शिक्षक से मिलिए ।

शिक्षक एक है पर निभाता है भूमिका ,
माता- पिता और शुभचिंतक की 
अगर सीखनी है ऐसी भूमिका  का निर्वाह,
तो एक  शिक्षक से मिलिए ।

शिक्षक छात्र  का जीवन सँवारता है ,
बुनता है उसके  लिए सपने 
अगर सीखनी है ऐसी  स्वप्नदर्शिता ,
तो  एक शिक्षक से मिलिए ।
-0- सुलक्षणा, राजकीय प्रतिभा विकास विद्यालय,सेक्टर-21 रोहिणी दिल्ली

Sunday, December 8, 2019

939-सर्दी की रात


कमला  निखुर्पा

1
सर्दी की रात
रश्मिरथी बनके 
आया है चाँद।


2
चंद्र- किरण
पतझड़ी तरु को
दे पुलकन।
3
चंदा के मीत
चकवी- संग गाएँ
मिलन गीत।
4
चाँदनी रात
तरु पहरेदार
खड़े तैयार। 
-0-

Friday, November 22, 2019

बुद्ध और नाचघर


 13 अक्तुबर, 2011एक पुरानी पोस्ट आपको भेंट। हरिवंशराय बच्चन जी की कविता, एक बार ज़रूर सुनिए और वाचन की उत्कृष्टता भी देखिए। निम्नलिखित लिंक क्लिक कीजिए-



Thursday, November 14, 2019

937-मन से मन का नाता


मन से मन का नाता
डॉ. सुरंगमा यादव

मैं रख लूँगी मान तुम्हारा
तुम मेरा मन रख लेना
दर्द अकेले तुम मत सहना
मुझसे साझा कर लेना
मन की बात न मन में रखना
तुम चुपके से कह देना
मैं अपना सर्वस्व लुटा दूँ
नेह तनिक तुम कर लेना
देह कभी मैं बन जाऊँगी
तुम प्राणों-सा बस जाना
तुम से ही जीवन पाऊँ मैं
साँसों की लय बन आना
अनादि प्रेम की फिर अनुभूति
अन्तर्मन को दे जाना
देह बदलकर वेश नया धर
जग में हम फिर-फिर आएँ
गीत पुरातन बही प्रेम का
फिर मिलकर हम दोहराएँ
प्रीत पुनीत करे जो जग में
विधना के मन को भाता
देह से बढ़ कर होता है
मन से मन का एक नाता
-0-

Thursday, November 7, 2019

936


1-स्मृतियों के घेरे में / कृष्णा वर्मा

जब-तब घिरे स्मृतियों का कोहरा
सन्नाटों में धड़कता मौन
पलटने लगता है अतीत के पन्ने
किसने कब क्यूँ कहाँ और कैसे को
कुरेदता मन
झाँकने लगता है बीती की तहों में
किसके छल ने डसा और
किसके व्यंग्य ने भेदी आत्मा
किसने उकेरने चाहे
मेरे तलवों की ज़मीं पर अपने नक़्शे
कौन मेरे पाँव की ज़मीं खिसकाकर
बनाने के प्रयत्न में था अपना महल
किसने चलाए मेरे वक़्त पर
तिरछे बाण और
किसने बँधाया मेरी अस्थिरता को धीर
किसके हाथों का स्पर्श दे गया
कांधे को आश्वासन
किसकी हथेली की उष्मा दे गई
अपनापे की गरमाहट मेरी ठंडी हथेली को  
किसने निभाया दिली रिश्ता और
किसने औपचारिकता
कौन था जिसने ज़ख़्मों को भरा
और किसने उन्हें कुरेदा
किसने दी भर-भर के पीड़ा और किसने हरी
आंकलन करता समीक्षा में उलझा
पगला मन भूल जाता है
कुहासे को छाँटना
अतीत की डबडबाहट में भीगी पलकें
बार-बार लग जाती है
गुलाबी डोरों के गले
कतरा-कतरा सोज़ 
उड़ेलकर कोरों के काँधों पर
छाँटना चाहती हैं तुषारावृत को
पर यादों का समंदर है कि सूखता ही नहीं
हठी स्मृतियाँ इंतिहा मजबूती से
थामे जो रहती हैं मन की अँगुली।
-0-
2-फ़ेहरिस्त -प्रीति अग्रवाल

एहसानों की फ़ेहरिस्त
बड़ी हो रही है,
माथे पे चिंता
घनी हो रही है।

अभावों में डूब
तिनके ढूँढती हूँ जब,
हौली सी आवाज़
कानों में गूँजती है तब,

मेरा खुदा सकुचाया सा
मुझसे कहे-
क्या करूँ , ये सारे,
करम हैं तेरे।

पर रुक, कुछ फ़रिश्ते
भी संग कर रहा हूँ,
हिफ़ाज़त के सारे
प्रबन्ध कर रहा हूँ।

तुझे पंखों पे बैठा,
ले जाएँगे उस पार,
लगी, तो लगी रहने दे
अभावों की कतार!!

किस सोच में खड़ी
क्या कोई असमंजस,
इक फ़रिश्ते ने पूछा
काम से रुककर।

अभाव जितने,
उनसे दुगुने फ़रिश्ते,
कर्ज़ कैसे अदा हो
ये दुविधा बड़ी है !

मुस्कुराया और सुझाया,
है यह भी तो सम्भव,
तू फ़रिश्ता थी हमारी
जन्मों जन्म तक!!

एहसान तेरे
चुकाए जा रहे हैं,
कर्ज़ न कि तुझ पर
चढ़ाये जा रहे हैं ।

ऐसा तो पहले
सोचा ही नहीं था,
खुश हुई मैं,
और मेरा खुदा भी खुश था!!!
-0-
3-दोहा /मंजूषा मन

दूर बसे परदेस तुम, मिलने की क्या आस।
माँगूँ निशदिन ये दुआ, आ जाओ अब पास।।
-0-

Sunday, November 3, 2019

935-पतझड़ को सांत्वना


सविता अग्रवाल 'सवि' (कैनेडा)

गर्मी का मौसम जाते ही
वसुधा में भी थी हरियाली
छायाचित्र; प्रीति अग्रवाल
बैठा सूरज देख रहा सब
सूझी उसको एक ठिठोली
भर- भर कर पिचकारी रंग की
ऊपर से ही दे दे मारी
कहीं गुलाबी, पीला, नीला,
लाल, जामुनी रंग बिखेरा
कलाकार की कलाकृति-सा
कैनवास पर चित्र उकेरा  
देख- देखकर क दूजे को
वृक्ष खुद से ही शरमा
लेकर बारिश की कुछ बूँदें
धो -धो तन को खूब नहा
रगड़ा तन को इतना तरु ने
पत्ता भी क टिक ना पाया
हो क्रोध में लाल और पीला
जाकर सूरज से वह बोला-
खेल खेलकर तुमने होली
अपना तो आनंद मनाया
पर मेरी हालत तो देखो
तिरस्कृत करके मुझे रुलाया
धरती पर अब कोई मुझको
देख नहीं खुश होता है  
मानव की जर्जर काया से
मेरी उपमा करता है
पतझड़ में आक्रोश था इतना
कचहरी में सूरज को लाया
इलज़ाम लगा उसने इतने
सुनकर सब, सूरज मुस्काया
छोड़ -छाड़कर जिरह कचहरी
सूरज पतझड़ के संग आया
गले लगाया, चूमा माथा
पतझड़ को उसने सहलाया
छोड़ क्रोध, अब सोचो तुम भी
कितने रंग दिए हैं तुमको
देख तुम्हारे रंग अनोखे
जग सारा कितना हर्षाया
बोला सूरज पतझड़ से तब
समझो मेरी भी मजबूरी
शरद ऋतु से किया है वादा
उसको भी है मुझे निभाना
धरती पर कुछ दिन उसको भी
अपना है आधिपत्य जमाना
तुमसे भी मैं वादा करता
नया नाम मैं तुमको दूँगा 
खोया जो तुमने अपना है
सब कुछ मैं वापिस कर दूँगा
बसंत नाम से तुम फिर आकर
धरा पर जाने जाओगे
नव पत्तों और नव कलियों- संग
खिल खिलकर हँस पाओगे
बनकरके ऋतुओं का राजा
जग में पूजे जाओगे
देखूँगा मैं ऊपर से ही
जब स्वयं पर तुम इतराओगे।
          -सविता अग्रवाल ‘सवि’ (कैनेडा)
 दूरभाष : (९०५) ६७१ ८७०७ 
-0-