शशि पाधा
मिलने आए मीत सुदामा
गदगद कान्हा दौड़े आए
गले लगाए मीत सुदामा।
आँखों से बरसे जलधारा
अधरों पे मुस्कान सजे
मौन हुई शब्दों की वाणी
साँसों में सुरताल बजे
भर बाँहों में रोए
कान्हा
अचरज में थे मीत सुदामा।
झीनी धोती, धूसरित पाँव
देख के कान्हा अकुलाए
भूल गए सब राजपाठ वह
राजमहल तक ले आए
प्रेम सहित सौंपा
सिंहासन
सकुचाए- से मीत सुदामा।
भर- भर मुट्ठी चाव से खाए
कच्चे चावल भेंट मिली
बालसखा खिलखिलकर हँसते
यूँ मिस्री की डली घुली
बचपन की घड़ियाँ अनमोल
याद दिलाएँ मीत सुदामा।
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शशि पाधा । वर्जीनिया, यू एस ए
ईमेल: shashipadha@gmail.com
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