पथ के साथी
Wednesday, November 28, 2018
Saturday, November 17, 2018
857
कृष्णा वर्मा
1
1
सहयोग से महँगी
और
सलाह से सस्ती
कोई चीज़ नहीं है
इस दुनिया में।
2
ईश्वर के बाद
केवल माँ ही ऐसी मर्मज्ञ है
जो कर सकती है संतान के
मौन का अनुवाद।
3
पता नहीं किस सामग्री से
बना होता है दिल का सफ़ा
कहे गए शब्दों को
बिना क़लम
लिख लेता है गहरी स्याही से।
4
संवाद ही तो हैं
जो दे जाते हैं मन को
यादों की पूँजी
वरना फ़कीर न होता
हर शख़्स का मन।
5
मन के तरकश में
न रख ईर्ष्या के तीर
चल गए तो मिट जाएगा
अपने ही हाथों
तेरा अपना वजूद।
6
चलाने ही हैं तो चला
प्रेम के अस्त्र
फिर देख कैसे जी उठेंगे
मृत संबंध।
7
रात भर जल कर बाती
काटती रही सघन अन्धकार को
और कितनी सहजता से कहे जग
दीप ने किया उजियारा।
8
बंध रही हूँ तुमसे
ज्यों दूर स्थित सितारों की
टिमटिमाहट के सम्मोहन में
बंधता मन।
9
जीती रही तुम्हें
ज्यों हथेलियों में समाए
शाश्वत स्पर्श को
जीता है मन।
10
डूबी मैं तुझमें
ज्यों डूबे मन
हवा की सरसराहट में रचे
मद्धम संगीत में।
बहती जो कभी
तुम्हारे हृदय में प्रेम नदी
तो करते महसूस
मेरी उर सरिता का स्वर स्पंदन।
11
खाए हैं ज़ख़्म दिल पर
कोई मलहम न उपचार
रूह के नासूरों का
मिला न कोई हक़ीम।
-0-
Friday, November 2, 2018
856
1-कर्ण
श्वेता राय
आज युद्ध की इस बेला में, मुझको सत्य बताते हो।
पांडव मेरे रक्त सहोदर, कैसा भ्रम फैलाते हो।
हे केशव! यदि ये सच है तो भी मुझको
स्वीकार नहीं।
समर भूमि से पीछे हटने का मुझको अधिकार
नहीं।
अंधड़ आंधी में तरु शाखा से विगलित मैं
पर्ण बना।
हो कठोर, सुन सूत पुत्र मैं, आज यहाँ ये कर्ण बना।
कैसे कह दूँ कुंती को माँ, राधा को मैं माँ जाना।
बचपन से ही प्रेमिल उसका, आँचल मैंने पहचाना।
पाप समझ कुंती ने त्यागा, राधा ने स्वीकार किया।
मेरे हर आँसू को बढ़कर, उसने अंगीकार किया।
जग के कटु वचनों को सुनकर, सूर्य रश्मि सम स्वर्ण बना।
हो कठोर सुन सूत पुत्र मैं आज यहाँ ये
कर्ण बना।
हे कृष्णा! अब ये बतलाएं, उस दिन क्यों वो मौन रहीं।
कृपाचार्य जब रोके तब वो, आ मुझको क्यों नहीं गहीं।
उसदिन दुर्योधन ने मुझको, मान मेरा लौटाया था।
हो हक था मेरा उसदिन, मैंने उस से पाया था।
अंगदेश को पाकर उसदिन, सम्मानित मैं वर्ण बना।
हो कठोर सुन सूत पुत्र मैं आज यहाँ ये
कर्ण बना।
कल कुंती आ मुझसे कहतीं, दुर्योधन को छोड़ दो।
पांच पांडवों के बन भ्राता, समर दिशा तुम मोड़ दो।
हे गिरधारी! क्या संभव ये, वार पीठ पर मैं कर दूँ।
सम्मानित इक रिश्ते पर मैं दाग पंक से
मैं मढ़ दूँ ।
मीत मिताई में बोलो कब कोई कहीं विवर्ण
बना।
हो कठोर सुन सूत पुत्र मैं,आज यहाँ ये कर्ण बना।
हे वनवारी! सत की महिमा, युद्ध अंत का तुम जानो।
क्या होगा अगले क्षण में ये भली भांति
तुम पहचानो।
यदि कल समरांगण में मेरा वध संभव हो पाता
है।
या अर्जुन का सिर में सम्मुख आकर गिर
जाता है।
होंगें पांडव पांच सदा ही,मत इसको अब अर्ण बना।
हो कठोर सुन सूत पुत्र मैं आज यहाँ ये
कर्ण बना।
सुन बातें सब कर्ण कृष्ण नत अपना शीश
झुकाते हैं।
कहते जग में तुमसा कोई, मित्र कहाँ सब पाते हैं।
दुर्योधन के मान से बढ़कर, तुमने जो सम्मान किया।
मानवता को अभयदान दे, स्वर्णिम एक विहान दिया।
मर्यादित इस भाव को सुन मैं स्वंय यहाँ
उत्कर्ण बना।
अब जाना मैं पहचाना, कैसे ये निर्भय कर्ण बना।
-०-
2-दोहे
अनिता
मंडा
1.
होठों पर हैं चुप्पियाँ, भीतर कितना शोर।
सूरज ढूँढे खाइयाँ, आये कैसे भोर।।
2.
परछाई हैं रात की, बुझी -बुझी सी भोर।
उजियारे के भेष में, अँधियारे का चोर।।
3.
जुगनू ढूँढे भोर में, पतझड़ में भी फूल।
कुदरत के सब क़ायदे, लोग गए हैं भूल।।
4.
प्रतिलिपियाँ सब नेह की , दीमक ने ली चाट।
पांडुलिपि धरे बैर की, बेच रहे हैं हाट।।
5.
सूनी घर की ड्योढियाँ, चुप हैं मंगल- गीत।
जाने किस पाताल में, शरणागत है प्रीत।।
-0-
Saturday, October 27, 2018
855
सार / ललित छन्द
1- ज्योत्स्ना प्रदीप
1
चंदा -सी काया हर घर में, बाट चाँद की जोहे ।
निशिकर
आया नभ में देखो ,नयनों को वो सोहे ।
चाँद विभा का खुद प्रेमी हैं, प्रेम न उसका दूजा l
युग बदला हो चाहे कितना, निशिकर सबने पूजा !
2
छलनी लेकर हाथों में प्रिय ,तुमको नैन निहारे l
झरे ओज चंदा से प्यारा, तेरी आँखों वारे l
छलनी से पूजा है तुमको, छन- छन छने अँधेरे l
छलना ना जीवन में सजना, सुख -दुख तेरे -मेरे !
3
दीप -दीप से जग रौशन है, मन में पर अँधियारा,
कोना-कोना मन का चमके , हो ऐसा उजियारा I
अँधियारी रातों को मिलकर, भोर बना लो प्यारी,
नेह
बना लो दिनकर -सा
तुम, हर मन हो सुखकारी।
4
कोमल मन तितली -सा है राहें बड़ी कँटीली,
4
कोमल मन तितली -सा है राहें बड़ी कँटीली,
जिस पर नेह लुटाया मन से, आँखें उस पल गीली,
छल -बल से ना चलता जीवन, जीत तो मन की होती,
टहनी पर कितने काँटे हों, कलियाँ पर ना रोतीं !
-0-
2-अनिता ललित
1.
तुमसे ही माथे का सूरज, सजे माँग में तारे
तुम्हीं आस, विश्वास तुम्हीं हो , तुमसे सपने सारे
दुनिया सारी एक तरफ़ है, तुम प्राणों से प्यारे ।।
2.
चाँद गगन में आज खिला है, केसरिया- सा न्यारा
मेरे मन-आँगन में जैसे, साँवरिया है प्यारा ।
नयनों में है छवि रुपहली , तन-मन मैंने हारा
अर्पित मेरा जीवन प्रियवर , जनम-जनम है वारा ।
-0-
3-पूर्वा
शर्मा
1
शरण तुम्हारी आऊँ
गुरुवर, आशीष सदा पाऊँ ।
राह दिखाते तुम ही पग-पग, और कहाँ मैं जाऊँ ।
बिखरा देते ज्ञान की ज्योति, फिर उजियारा पाऊँ ।
गुरु -शरण से सफल है जीवन, गुरु महिमा
ही गाऊँ ।।
2
मैं ना जानूँ कैसे भाँपे, यह मन ख़ुशबू तेरी ।
तेरे आने से पहले ही, महकीं बातें तेरी ।
तेरे क़दमों की आहट से, थमती धड़कन मेरी ।
प्रेम-गीत की धुन पर देखो, चलतीं साँसें मेरी ।।
-0-
Sunday, October 21, 2018
854
1-सीढ़ी
डॉ.सुषमा गुप्ता
सीख तो सकते थे हम भी
ज़माने का चलन
पर ये हम से हो न सका ।
अब लोग ज़मीं नहीं
इंसानों को बिछाते हैं
पैर जमाने के लिए
और सीढ़ियों की कोई अहमियत नहीं
बस चंद लोग चाहिए ,
गिराके खुद को ऊँचा उठाने के लिए ।
-0-
2-दरिया थे हम
मंजूषा मन
दरिया थे हम
मीठे इतने
कि प्यास बुझाते,
निर्मल इतने कि
पाप धो जाते।
अनवरत बहे
कभी न थके
निर्बाध गति से
भागते रहे,
सागर की चाह में
मिलन की आस में
न सोचा कभी
परिणाम क्या होगा।
अपनी धुन में
दुर्गम राहें
सब बाधाएं
सहते रहे हँस के,
और अंत में
अपना अस्तित्व मिटा
जा ही मिले
सागर के गले।
पर हाय!!!
स्वयं को मिटाया
क्या पाया?
ये क्या हाथ आया?
कि
खारा निकला सागर,
खाली रह गई
मन की गागर।
-0-
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