पथ के साथी

Tuesday, November 15, 2016

687



1-बुझ क्यों नहीं जाता है सूरज...
डॉ जेन्नी शबनम 

बुझ क्यों नहीं जाता है सूरज   
क्यों चारों पहर ये जलता है,   
दो पल चैन से सो लूँ मैं भी   
क्या उसका मन नहीं करता है?   

बुझ क्यों नहीं जाता है सूरज   
क्यों चारों पहर ये जलता है!   

देस -परदेस भटकता रहता   
घड़ी भर को नहीं ठहरता है,   
युगों से है वो ज्योत बाँटता   
मगर कभी नहीं वह घटता है!   

बुझ क्यों नहीं जाता है सूरज   
क्यों चारों पहर ये जलता है!   

कभी गुर्राता कभी मुस्काता   
खेल धूप-छाँव का चलता है,   
आँखें बड़ी-सी ये मटकाता   
जब बादलों में वह छुपता है!   

बुझ क्यों नहीं जाता है सूरज   
क्यों चारों पहर ये जलता है!   

कभी ठंडा कभी गरम होता   
हर मौसम-सा रूप धरता है,   
शोला-किरण दोनों बरसाता   
मगर ख़ुद कभी नहीं जलता है!   

बुझ क्यों नहीं जाता है सूरज   
क्यों चारों पहर ये जलता है!   

जाने कितने ख्वाब सँजोता   
वो हर दिन घर से निकलता है,   
युगों-युगों से खुद को जलाता   
वो सबके लिए ये सहता है!   

बुझ क्यों नहीं जाता है सूरज   
क्यों चारों पहर ये जलता है !   
-0-
2- बचपन- मंजूषा मन  
बाबू जी से
नज़रें बचाकर,
चुपके से अम्मा
रख देती थी
हथेली पर
पाँच पैसे का सिक्का,
उस सिक्के को ले
इठलाते हुए
दौड़ते फिरते थे
सारे गाँव में हम....
आज अफसर कहलाकर भी
अम्मा का दिया
वो सिक्का
बहुत याद आता है
बचपन के दिन भी
क्या अमीरी के दिन थे।
-0-

Wednesday, November 9, 2016

686



1-दोहा
मंजूषा मन
1
गौरैया उड़ जा अभी, बुरे हुए हालात।
आ जाना उस रोज़ जब, बीते दुख की रात।।
-0-
2-राख
मंजूषा मन
कुरेदते रहे
मुद्दतों तक
रिश्तों पर जमी राख,
इसी उम्मीद में
कहीं शायद बची होगी
थोड़ी सी आँच
थोड़ी तपन....

जितना टटोला,
जितना खोला
यही पाया
हरबार
कि बुझ चुकी थी आग
लम्बे अरसे से,
बच रही थी
सिर्फ और सिर्फ राख...
जो उड़ -उड़कर
ढकती रही चेहरे के रंग
बनाती रही सब कुछ
बदरंग।

अब जुटाने होंगे
नये साधन
फिर सुलगाने के लिए
एक नई आग।
-0-
3-अपने हिस्से का अमृत
कृष्णा वर्मा

भीतर की बारादरी में भटकती
बेस्वाद कसैली यादों का बोझ
उनींदी रातें खिंडता सुकून
और लम्बी सूनी दोपहरियाँ
आठों पहर - इस बिन्दु के आस-पास
चकरघिन्नी सी घूमती
थक गई है ज़िंदगी - इस व्यवसाय से।
साय की तरह साथ चलती मेरी तन्हाई
और चिन्दी-चिन्दी होता मेरा मन
शून्य में टटोलता है नित कुछ नया
मेरी ग़ैरत मेरी खुद्दारी
फड़फड़ा रही है घायल पंछी -सी
और मैं ! तड़ से पड़े तमाचे के ताप से
तमतमाई गाल- सी खड़ी हूँ स्तब्ध
बहुत हुआ नहीं सह पाऊँगी और
काटनी ही है अब मुझे
अपने संस्कारों से जुड़ी
परम्पराओं की नाल
पैरों की गति के आड़े आती
यह रुनझुनाती साँकलें
नहीं चाहिए मुझे अब जीने को
तुमसे उधार की साँसें
बंद करो अब तुम -खेलना यह चौसर
क्योंकि नहीं लगना मुझे
अब तुम्हारे दाव पर
पाना है मुझे मेरी मुठ्ठी में बंद
अब मेरा अपना सूरज
सिरजना है अब अपने ही ढंग से
मुझे अपना वजूद
आसमाँ की अलगनी पर
टाँग कर अपनी नाम पट्टी
गढ़्नी है मुझे एक अद्भुत पहचान
ताकी लौटा सकूँ तुम्हें सूद समेत
तुम से ही मिली जीवन भर की तमाम पीड़ाएँ
तुम्हारे भ्रम को बल क्या देती रहीं
मेरी मिथ्या मुसकाने
तुम ने तो यूँ समझ लिया कि
वाकिफ हो गए तुम मेरी नस-नस से
सुनो-तुम अपने रुतबे में ऐसे अंधे हुए
यह तक ना जान पाए कि कब
अपने हिस्से का अमृत
पीने की ठान ली मैंने।
-0-

Tuesday, November 1, 2016

685



1-आई दिवाली –
पुष्पा मेहरा  
       
  आई दिवाली
  श्रद्धा–मन्दिर में       
  पधारे श्री लक्ष्मी-गणेश जी            
  दीये हमने जलाए
  प्रेम और विश्वास के,                      
  बाती हमने जगाई
  तप और त्याग की,
  लड़ियाँ हमने लगाईं    
     भाव शृंगार की ।
                
  आई दिवाली
  रँगोली हमने सजाई
  आस्था–संस्कार की,                               
  रोशन हुआ चौबारा
  धुन बजी हर्ष की
  तम को हराने का प्रण ले
  मात्र प्रकाश पर्व की ।

  तम का इशारा करती    
  साँझ जो बीती थी
  वह भी सुखद–सिन्दूरी थी
  पाखी गणों के कलरव से
  सरस रँगीली थी,
  अंतत: आत्मशक्ति केन्द्रित वह
  रतजगे का आलम रात को सौंप गई।

  रोशनी की लहरों में तैरती
  नशीली रात,अमा के तम को
  जो भगाने आई   
  बम,पटाखों-फुलझड़ियों से खेलती
  सबकी खुशियों में झूमती
  नये सूर्य के इन्तजार में
  अगणित दीप-मालिका
  सजा के जागती रही  ।
  क्योंकि –
  दीपावली के शुभ दीपोत्सव में
  उसकी भी तो भागीधारी रही
  प्रकाश को तो फैलना है ,
  ज्योति ने सदा अँधेरे से
  ऊपर उठने की ठानी है ।
  जड़ता और अज्ञान तम मिटाने की
  आतंक की जड़ें खोदने की,
  एकता का बीज रोपने की, 
  बाल ,युवा किशोर –वृद्ध
  सभी को कमान सँभालनी है ।
  तो आओ!भेदभाव भुला कर
  सही दिशा में कदम धर
  आतंक की अमा में डूबी
  मन की अँधेरी गलियों में  
  प्रेम–प्रकाश भर
  वसुधैव कुटुम्बकम के
  स्वप्न को साकार कर
  धरती पर स्वर्ग लाने की ठान लें  
  क्योंकि मानवता का संदेश साथ  
  लाई दिवाली है ।             
-0-
2-आज अमृता जी को उनकी पुण्यतिथि पर उनको याद करते हुए..........एक कविता।
अनिता मण्डा

अमृता !
प्यारी अमृता!
तुम करती रही
देवताओं को जगाने की कोशिश
ताउम्र
जो सोये थे इन्सानों के भीतर
तुम एक साथ वर्जनाओं को तोड़ती
और संस्कारों को ढाल बनाती
चलती रही अंगारों की राह पर!

ठहर गया था जो निगौड़ा सोलहवाँ साल
उम्र में, जीती रही साँस दर साँस
और दे गई जाने कितनी आँखों को
इश्क़ के ख़्वाब।
जलाते हुए इश्क़ के दिये
टाँग दी कितनी आँसू की झालरें।

सिगरेट के बचे बट से ढूँढ़ते
समेटती रही साहिर को,
कभी इमरोज़ के पीछे स्कूटर पर बैठ
तुम्हारी अंगुलियाँ
लिखती रही साहिर का नाम
इमरोज़ की पीठ पर
पीती रही अम्बर की सुराही से !

कौन कह सकता था तुम बिन
वारिस शाह से कि
उठो अपनी क़ब्र से और लिखो
भारत की बेटियों के आँसू !

कौन पूछता तुम बिन नानक की माँ को
कैसा था अहसास
सूरज को नो महीने कोख़ में रखने का !

तेरे लफ़्जों पर फौजदरियाँ
कहाँ रोक पाई
उनकी उड़ानों को
थाम इमरोज़ की बाँह
पी लिए तुमने सारे आँसू !

अधकच्ची नींद के ख़्वाब से
तुम बटोरती रही हरसिंगार !
पाक मुहब्बत के सच्चे परिन्दे
भरते रहे रंग
जीवन के आसमान में
माँडते रहे धनक।

देख एक दूजे को जब मुलक लिए
जब आँखों ने कह दिया - तुमसे प्यार है!
जुबाँ को कहना जरूरी नहीं लगा।
जहाँ बैठ रचे तुमने कितने किरदार
ढहा दिया वो ताजमहल सा इक मन्दिर
इमरोज़ के सामने।
पर तुम अब भी हो
इमरोज़ की मुस्कान में।
तुम सदा रहोगी
जब तक इश्क़ है दुनिया में।
तुम अब भी जगा रही हो
इंसानों के भीतर सोये देवताओं को।

अमृता तुम सदा मिलती रहोगी इमरोज़ को
कभी तारों की छाँव में,
कभी बादलों की छाँव में,
कभी किरणों की रोशनी में,
कभी ख़यालों के उजाले में रंग लेकर
सच! जिस्म मिट जाने मात्र से
इन्सां थोड़े ही मिटते हैं.......