1-बुझ क्यों नहीं जाता है सूरज...
डॉ जेन्नी शबनम
बुझ क्यों नहीं जाता है सूरज
क्यों चारों पहर ये जलता है,
दो पल चैन से सो लूँ मैं भी
क्या उसका मन नहीं करता है?
बुझ क्यों नहीं जाता है सूरज
क्यों चारों पहर ये जलता है!
देस -परदेस भटकता रहता
घड़ी भर को नहीं ठहरता है,
युगों से है वो ज्योत बाँटता
मगर कभी नहीं वह घटता है!
बुझ क्यों नहीं जाता है सूरज
क्यों चारों पहर ये जलता है!
कभी गुर्राता कभी मुस्काता
खेल धूप-छाँव का चलता है,
आँखें बड़ी-सी ये मटकाता
जब बादलों में वह छुपता है!
बुझ क्यों नहीं जाता है सूरज
क्यों चारों पहर ये जलता है!
कभी ठंडा कभी गरम होता
हर मौसम-सा रूप धरता है,
शोला-किरण दोनों बरसाता
मगर ख़ुद कभी नहीं जलता है!
बुझ क्यों नहीं जाता है सूरज
क्यों चारों पहर ये जलता है!
जाने कितने ख्वाब सँजोता
वो हर दिन घर से निकलता है,
युगों-युगों से खुद को जलाता
वो सबके लिए ये सहता है!
बुझ क्यों नहीं जाता है सूरज
क्यों चारों पहर ये जलता है !
-0-
2- बचपन- मंजूषा मन
बाबू जी से
नज़रें बचाकर,
चुपके से अम्मा
रख देती थी
हथेली पर
पाँच पैसे का सिक्का,
उस सिक्के को ले
इठलाते हुए
दौड़ते फिरते थे
सारे गाँव में हम....
आज अफसर कहलाकर भी
अम्मा का दिया
वो सिक्का
बहुत याद आता है
बचपन के दिन भी
क्या अमीरी के दिन थे।
-0-
बुझ क्यों नहीं जाता है सूरज...
ReplyDeleteडॉ जेन्नी शबनम
कल्पनात्मक , नई सोच उत्कृष्ट कविता
बचपन- मंजूषा मन
असर छोड़ती पंक्ती
आप दोनों को बधाई
लेखिका द्वय को हार्दिक शुभकामनाएँ एवं बधाई, सुन्दर रचनाएँ
ReplyDeleteदोनों रचनाएं बहुत मन मोहक! जेन्नी जी, मंजूषा जी आप दोनों को बहुत बधाई।
ReplyDeleteडॉ.जेनी जी यथार्थ पर आधारित सृजन
ReplyDeleteमंजूषा जी मार्मिक सृजन
डॉ जेन्नी जी बुझ क्यों नहीं जाता सूरज और मंजूषा जी की बचपन की अनेक यादों को मन में समाये कविता ने मन मोह लिया हार्दिक बधाई |
ReplyDeleteबहुत ही सुन्दर प्रस्तुति ..... very nice ... Thanks for sharing this!! :) :)
ReplyDeleteजेन्नी जी बहुत सुंदर रचना ...बुझ क्यों नहीं जाता है सूरज
ReplyDeleteक्यों चारों पहर ये जलता है ...अति सुंदर
मंजूषा जी बहुत सुंदर बालमन की रचना ये रचना दोबारा पढने का सोभाग्य प्राप्त हुआ ..बचपन के दिन भी
क्या अमीरी के दिन थे...सच में वो अमीरी आपकी रचना से याद आ गई
बहुत सुंदर
ReplyDeleteजेन्नी जी क्या सोच है सूरज के प्रति आप की ? सूरज पर तरस करते कोमल भाव अच्छे लगे ।
ReplyDeleteउसके कार्यों का बाखूब वर्णन किया आप ने ।बधाई ।
मंजूषा मन जी बचपन सच में अमीरी के दिनों वाला होता है ।ना कोई फिकर न दिन भर करने को काम । खेलो खायो मस्त रहों । बहुत अच्छा लिखा । बधाई ।
वाह! बहुत सुंदर रचनाएँ दोनों !
ReplyDeleteसूरज के बारे में हम कहाँ कभी सोचते हैं -बहुत सुंदर वर्णन जेन्नी जी!
बचपन के उस सिक्के के आगे सारी दौलत फीकी है -बिल्कुल सही कहा मंजूषा जी !
आप दोनों को हार्दिक बधाई !!!
~सादर
अनिता ललित
वाह, क्या बात है
ReplyDeleteबचपन की दुनिया को साकार करती बहुत प्यारी कविता .. बधाई
ReplyDeleteकभी गुर्राता कभी मुस्काता
ReplyDeleteखेल धूप-छाँव का चलता है,
आँखें बड़ी-सी ये मटकाता
जब बादलों में वह छुपता
कितना प्यारा चित्रण
जेन्नी जी बधाई
मेरी रचना को यहाँ स्थान एवं सम्मान मिला काम्बोज भाई का हृदय से धन्यवाद. मेरी रचना को आप सभी का स्नेह और प्रशंसा मिली, तहे दिल से आभारी हूँ.
ReplyDeleteमंजूषा जी की रचना बचपन की याद दिला गई. 5 पैसे में भी अमीरी का एहसास होता था बचपन में. बहुत सुन्दर रचना बधाई मंजूषा जी को.
बुझ क्यों नहीं जाता है सूरज
ReplyDeleteक्यों चारों पहर ये जलता है,
दो पल चैन से सो लूँ मैं भी
क्या उसका मन नहीं करता है?
बहुत सुन्दर रचना..... बधाई मंजूषा जी !!!
जेन्नी जी...बहुत सुन्दर बात...|
ReplyDeleteबचपन के दिन भी
क्या अमीरी के दिन थे।
इससे तो शायद हर कोई सहमत होगा...|
आप दोनों को हार्दिक बधाई...|