पथ के साथी

Friday, August 11, 2023

1348-लिली मित्रा की कविताएँ

 लिली मित्रा

 


1- ठोकरों की राह पर

 

 

ठोकरों की राह पर

और चलने दो मुझे

पाँव छिलने दो ज़रा

दर्द मिलने दो मुझे 

 

फ़र्क क्या पड़ता है चोट,

लगी फूल या शूल से

रो पड़ी है या नदी 

लिपट अपने कूल से

घाव सारे भूलकर 

नई चाह बुनने दो मुझे 

 

पाँव छिलने दो ज़रा 

दर्द मिलने दो मुझे... 

 

खटखटाता द्वार विगत के

क्यों रहे मन हर समय

घट गया जो, घटा गया है

कालसंचित कुछ अनय

पाट नूतन खोलकर

नई राह चुनने दो मुझे 

 

पाँव छिलने दो ज़रा

दर्द मिलने दो मुझे.. 

 

कौन जाने क्या छिपा है

आगतों की ओट में?

निर्माण की अट्टालिका

फिर धूसरित विस्फोट में

अवसाद सारे घोलकर

नई आह सुनने दो मुझे 

 

पाँव छिलने दो ज़रा

दर्द मिलने दो मुझे..

-0-

 2-उमस

 

टहलते हुए पार्क के

‘पाथ वे’ पर

उतरती शाम को देखा

थोड़ा और ध्यान से

छुटपुट बारिश से 

बुझी नहीं थी तपती जमीन की प्यास

भाप उगल रही थी वह

धुंध बनाकर ओढ़े बैठी थी 

अपनी ही उमसती कुनमुनाहट को

पेड़ स्तब्ध थे,

उनमें साहस नहीं था कि 

हिला सकें अपनी एक भी पात,

एक तरफ रह -रहकर  महकते कुटज 

अपनी ही धुन में बेसुध अनचाहे प्रयास करते,

उमस की धुंध महक से जाती है क्या??

नीम की कसैली कड़ुवी महक हावी थी हर बार उनके 

सहृदयी सुगंधित प्रयासों पर

धरती ने खींचकर भर ली थी सारी कड़ुवाहट 

चबा लिये थे नीम उमसती तिलमिलाहट के चलते

विद्रोह के ये शांत स्वर 

शाम की लालिमा पर कालिमा से फैल रहे थे

रात रोई होगी रातभर 

पर मुझे पता है आज भी 

वह वैसी ही खुद में उफनती 

नीम चबाती

पड़ी रहेगी ... 

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3- निकलने तो दीजिए दुर्गा को 

 

क्या शातिर सारा ज़माना?
क्यों डर के साए में ही
सतर्कता का अलख जगाना?
सशक्तीकरण का औजार
थमाते हुए ,
क्या जरूरी है विद्रूपताओं
के घृणित रूप दिखाना?
विश्वास के धरातल  पर
आत्मविश्वास का अंकुर क्यों
नहीं बोते?
अच्छाइयाँ भी हैं... 
बुराइयों के दलदल में ही क्यों भिगोते?
घूँघट से निकल
गरदन उठाकर मुस्कुराती
कलियाँ,
ना समझिए निमत्रंण इसे
नहीं ये पैगाम ए रंगरलियाँ। 
समझ इनमें भी है
जरा भरोसा तो रखिए
रेशम- सी हैं तो क्या
गरदन पर इनकी

जकड़ भी परखिए,
जूझने तो दीजिए इन्हें 
परिवेश से 
निकलने तो दीजिए दुर्गा
को निज आवेश में । 

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4-देवी



प्रेम विस्तार पा चुका है
इंसान से देवी बनाई जा चुकी हूँ
आराध्या हूँ
मानवीय आचरण अब
निषेध हैं
अभयदान की मुद्रा
और चेहरे पर
करुणा भाव सदा के लिये
चिपकाए रखना है
शीश झुकाए आते
जाएँगे श्रद्धालु
अपनी फ़रियाद लिये,
बस सुनते रहना है
अपनी सभी इच्छाएँ,
अभिलाषाएँ, कुंठाएँ,
अभिव्यक्तियाँ,अनुभूतियाँ
प्रतिमा की प्रस्तर
वर्जनाओं में कैद कर लेनी है

सुनो लोगो!
देवी बनना
इतना भी आसान नहीं..

Thursday, August 10, 2023

1347

 

1-रश्मि शर्मा

 


बारिश ( एक )

 

केले के उन हरे सघन पत्तों पर

अनवरत बरसती बूँदों का राग है

हर बरस इस मौसम में बस एक ही बात सोचती हूँ-

क्या कोई होगा, जो मेरी तरह यूँ ही

बारिश को महसूस करता होगा...

 

क्या उसके अंदर भी

जंगल में बारिश देखने की चाह उगती होगी

क्या मेरी तरह वह भी छत पर भीगता होगा

 

कितने तो ख्याल हैं

बारिश से बदलती धरा के अनगिनत रंग और

माटी से उठती सोंधी गंध है

 

ये कैसी अनजानी-सी पीड़ा है

कि पहाड़ पर बारिश से बजती टीन की छत भी जैसे

किसी अनदेखे को पुकारती लगती है

 

मेरे लिए कोई है क्या इस दुनिया में

जो यूँ बारिश को आत्मा से महसूस करता होगा।

 

बारिश ( दो)

 

चित्र-स्वाति बरनवाल

उस बारिश से इस बारिश तक

न जाने कितनी बरसातें गुजर गईं

यह हमारे साझे का मौसम है

 

हवा, बादल, मोगरे, रातरानी

सब तो हैं,

टूटकर बरसता है आसमान भी

पर भीगता नहीं मन

हवाओं में घुली खुशबू नहीं आती इन दि‍नों मुझ तक

 

तुम थे, तो कितनी सुंदर लगती थी दुनिया

बारिश बजती थी कानों में

संगीत की तरह

और पहाड़ों से बादलों को लिपटते देख

नहीं थकती थीं आँखें

-----

यह एक शांत सुबह है

अभी -अभी थमी है बारिश

हवाओं में ठंडक घुली है

और मैं उसी जगह बैठी हूँ जहाँ पहली बार

बारिश में भीगे थे हम साथ-साथ।

-0-

1

2-विभा रश्मि 

 

1-तितलियाँ

तितलियों के जहाँ में 

चलो मेरे साथ 

कितनी आज़ाद  ख़्यालात ,

कोई  बंधन-पूर्वाग्रह  नहीं ।

बस पुष्पों से सजी फुलवारी 

और मँडराने के लिए 

क्यारियाँ, पत्रावली , सुगंध  ,

कोमल कच्ची शाखाएँ 

साथी सहेलियों का हाथ 

और कौतूहल- भरे बालक के नेत्र 

बेसाख्ता लहराता प्यार  ।

2-सूरज

 

रोक नहीं पाओगे 

प्रदीप्त सूरज को 

जो जगत को ऊर्जावान 

बनाता रहा है, वो -

सफ़र पर है सदियों से 

उसे किसी मशीन - संविधान 

नियम, स्वार्थपरक संबंधों के - 

छद्म जाल में नहीं फँसा सकोगे ।

वह इससे इतर 

बच निकलेगा अपने तेज -

सद्भाव और सद्गुण लेकर ।

0

Saturday, August 5, 2023

1345- मुझसे ही बस माना करना

अनिल पाराशर ‘मासूम’

 

मुझसे ही बस माना करना

सारे जग से रूठा करना

 

भारी दिल को हल्का करना

सीखो सबको अच्छा करना

 

नफ़रत जैसी भी कर लेना

प्यार तो मेरे जैसा करना

 

झूठ नहीं मैं कह पाऊँगा

हाल मेरा मत पूछा करना

 

उम्र गुजारी ये सुन-सुनकर

ऐसे जीना ऐसा करना

 

मुझको कसम कभी मत देना

सच मेरा मत झूठ करना

 

मैं क्‍या हूँ परछाई हूँ बस

तुम साये का पीछा करना

 

जब अम्बर से तारा टूटे

मुझको उससे माँगा करना

 

मेरी याद दिलाएँगे ये

आँसू मत तुम पोंछा करना

 

कभी देखना मेरे सपने

कभी रात भर जागा करनी

क्‍या ‘मासूम’ में ख़म देखा है

अच्छे  को अच्छा क्या करना

( तेरे जाने के बाद  काव्य-संग्रह से)


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