रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'
पथ के साथी
Friday, September 10, 2021
Sunday, September 5, 2021
1129
1-रश्मि विभा त्रिपाठी
मैं गीली माटी थी
गुरु तुमने दिया आकार
शिक्षा के साँचे में ढाला
और गढ़े सुन्दर
संस्कार
बियाबान के झुरमुट में
मैं व्यर्थ पड़ी एक खोखल थी
पर वसंत की आशा भी
मुझमें अतिशय प्रबल थी
तुम कृष्ण- से
कृपा दृष्टि पा
मैं खोखल से वेणु हुई
कंचन हो जाए निश्चय ही
गुरु - चरणों ने जो
रेणु छुई
मुझे ज्ञान का पाठ पढ़ा
अतुलित साफल्य दिया है
कभी क्रोध कर बोध जगाया
औ कभी निरा वात्सल्य दिया है
मैं अबोध और महामूढ़
अब हल करती हूँ जो प्रश्न गूढ़
यह केवल तुम्हारा ही दिग्दर्शन है
तुम्हारी शिक्षा है तुम्हारा दिव्य दर्शन है
मैं कृतज्ञ हूँ जो अमूल्य ऋण तुमसे पाया है
गुरु दक्षिणा में शीश तुम्हारे चरणों में नवाया है।
-0-
2- मधुशाला छंद
मेघा राठी
मेरे नैनों सम्मुख लाई , जीवन का ताना -बाना
प्रथम नमन है माँ को मेरा, सीखा तुमसे मुस्काना
डगमग-डगमग चलते मेरे, क़दमों को तुमने थामा
बोले पापा गुड़िया मेरी, तुम आगे बढ़ती जाना
सहज नेह के साथ ज्ञान दें, गुरु वही कहलाते हैं
जिनकी शीतल छाया पाके , पुष्प नहीं मुरझाते हैं
कभी जिंदगी कभी किताबें, गुरु बनी धरती सारी
सभी गुरुजन के चरणों में, हम ये शीश झुकाते हैं।
-0-
1128- भविष्य निर्माण में शिक्षा की भूमिका
राशिद अमीन नदवी
के किरदार को सजाती है सँवारती है। दुनिया में मौजूद तमाम चीज़ें ख़र्च करने से घटती जाती हैं ,मगर तालीम बाँटने से बढ़ती जाती है, जितना इंसान किसी को सिखाता है ,कुछ बताता है उतना ही उसके इल्म और जानकारियों में तरक़्क़ी और उन्नति होती जाती है,यह बस तालीम ही का करिश्मा है।
धार्मिक दृष्टिकोण से भी तालीम की अहमियत है,इल्म
को हर इंसान के लिए ज़रूरी क़रार दिया गया। यह दौर टेक्नोलॉजी की तरक़्क़ी का दौर है,
जिसमें क़दम क़दम पर मुक़ाबले हैं ,प्रतिस्पर्धाओं
और चुनौतियों का जाल है, इसीलिए इस जाल को तोड़ने के लिए अपनी
सोई हुई सलाहियतों को जगाने की ज़रूरत है ,और अपनी क़ाबिलियतों
को विशेष परवान चढ़ाने की ज़रूरत है। यह सब शिक्षा प्राप्ति से
ही संभव है। जब साइंस और कंप्यूटर का दौर हो, तो उसमें आप हाथ पर हाथ धरे कल के इंतज़ार में नहीं बैठ सकते,आपको जो करना है आज करना है,वरना मंज़िल दूर होती
जाएगी , रास्ते और कठिन, डगर और
मुश्किल होती जाएगी।
इसके साथ साथ मौजूदा हालात के परिदृश्य में इंसान की इंसानियत से दोस्ती
के लिए नैतिक शिक्षा भी बहुत महत्त्वपूर्ण है। इस शिक्षा के
कारण ही ख़ुदा से लगाव और इंसान से प्रेम, और अपने फ़र्ज़ और
कर्तव्यों में ईमानदारी, ज़िम्मेदारियों में निस्वार्थता,
जीवन में सेवा का भाव और , इंसानों के प्रति
सहानुभूति जागृत होती है। इसीलिए नैतिक शिक्षा की ज़रूरत भी आज की अहम ज़रूरतों में
से हैं,नैतिक शिक्षा ही एक बेहतर और खुशहाल समाज का निर्माण
कर सकती है। शिक्षा का प्राथमिक लक्ष्य हमेशा व्यक्ति को मानसिक, शारीरिक और आध्यात्मिक रूप से विकसित करना होता है। इसलिए तालीम के लिए
ऐसे शिक्षकों की ज़रूरत है, जो पुस्तकें पढ़ाने और क्लास लेने
के अलावा ,अपनी ज़िम्मेदारियों का भी अहसास रखता हो,उसको किसी एक इंसान को बेहतर बनाने के साथ साथ पूरे समाज को बेहतर बनाने
की फ़िक्र हो।जब यह भाव किसी उस्ताज़ के अंदर पैदा होगा तो एक स्वस्थ समाज उभरकर
सामने आएगा और शिक्षा को एक नई दिशा
मिलेगी।
विद्यार्थियों को भी यह
समझना होगा कि उनका लक्ष्य सिर्फ़ परीक्षा उत्तीर्ण करना ही न हो, बल्कि
वह शिक्षा के माध्यम से अपने आस पास के माहौल को बेहतर बनाने के लिए फ़िक्रमंद हों,एक स्वस्थ समाज की नींव तभी रखी जा सकती है, जब समाज
सुधारकों के दिलों में बेलौस जज़्बा हो ,जो किसी ओहदे और
चौधराहट के लालची न हों। विद्यार्थी और शिक्षक ही इस काम को बख़ूबी कर सकते हैं, क्योंकि उनके पास
इल्म का जौहर है।
शिक्षक जिस तरह अपने काम को क्लासरूम में पूरा करता है,
उसी तरह विद्यार्थी अपने
कर्तव्यों का निर्वहन अपने समाज में करें तो समाज के अंदर शिक्षा के प्रति नई
जागरूकता देखने को मिलेगी,क्योंकि तालीम ही इंसान को अदब
सिखाती है,तालीम ही तहज़ीब सिखाती है,
तालीम ही सही -ग़लत में तमीज़ सिखाती है,अच्छाई
और बुराई में फ़र्क़ करना सिखाती है। ,तालीम ही से,बड़े बड़े शिक्षाविदों ने ही शानदार और बाकमाल यूनिवर्सिटीज की बुनियाद रखी
जिनसे लाखों बच्चों के भविष्य सँवारे जाते हैं,इसलिए तालीम ही वक़्त की ज़रूरत है,और यह ज़रूरत हमेशा
बाक़ी रहेगी,ज़माने की रफ़्तार के साथ साथ इसकी बहुत ज़रूरत महसूस की जाती रहेगी,क्योंकि तालीम का दायरा
कभी सिमटता नहीं है , बल्कि सिर्फ़ बढ़ता है और बढ़ता जाता है।।
इसीलिए विद्यार्थी और शिक्षक के साथ- साथ अभिभावकों को भी इस तरफ़ ध्यान देने की
आवश्यकता है कि वह अपने बच्चों पर नज़र रखें,गाहे बगाहे उनकी
तालीम का जायज़ा लेते रहें,स्कूल या कॉलेज जाकर उनकी रिपोर्ट
लें और पता करें कहीं आपका नूर ए नज़र अपने और अपने परिवार और समाज के ख़्वाबों को
चकनाचूर तो नहीं कर रहा है।
बड़ी
दुख भरी बात है कि परीक्षा में नक़ल की कसरत ने हमारे पूरे तालीमी सिस्टम को दीमक की तरह खोखला और
बच्चों के भविष्य को अंधकारमय बना दिया
है।
वक़्त रहते हम जागरूक नहीं हुए, तो हमारा सामाजिक ताना- बाना बिखर जाएगा और एक
बिखरा हुआ समाज ज़िन्दगियों को बिखेर तो सकता है, सँवार नहीं
सकता।
इस के लिए ज़रूरत है हमारी शिक्षा प्रणाली में
वह जान हो वह ताक़त हो और वह ढाँचा हो, जिससे मुस्तक़बिल सँवरते हों, ऐसा न हो कि स्कूल या कॉलेज से पढ़ने के बाद सिर्फ़ वह परेशान हाल होकर दर- बदर ठोकरें खाते रहें और उनके पास ज़िंदगी को बेहतर बनाने का ठोस सामान न हो,इसके लिए
वोकेशनल एजुकेशन की जितनी ज़रूरत है ,उतनी ही टीचर्स को क्लास
में भविष्य की ज़रूरतों को सामने रखकर उनको तालीम देने की भी
ज़रूरत है।
हम खुद अपने बच्चों को अपने तौर पर तैयार करें
कि सिर्फ़ सिलेबस का पढ़ लेना ही ज़िंदगी का हासिल नहीं होता बल्कि ज़िंदगी जो शुरु
होती है वह फुरसतों और फ़रागतों के बाद शुरू होती है।
इस के लिए बेहतर तालीम,बेहतर
रहनुमाई व गाइडेंस और बेहतर काउंसलिंग की ज़रूरत है जो जगह जगह पर अलग अलग इलाक़ों
में बच्चों को दी जाए ताकि उन्हें अपना भविष्य रौशन नज़र आए
और वे किसी भी तरह हीन भावना का शिकार न हों ,और अपनी उम्मीदों को पंख देकर अपने ख़्वाबों को ताबीर दे सकें।
-0-राशिद अमीन नदवी,गाँव मलाई,ज़िला
पलवल,(हरियाणा) 121103
Sunday, August 22, 2021
1127
1-अफ़ग़ानिस्तान : कुछ
कविताएँ / हरभगवान
चावला
1.
एक अफ़ग़ान माँ ने
अपनी बच्ची को
कँटीले तारों के ऊपर से
एयरपोर्ट के भीतर उछाला
और चिल्लाकर कहा -
मेरा जो हो, सो हो
यह बच्ची शायद ज़िंदा रहे
बच्ची से अलग होने के बाद
वह माँ क्या कर रही होगी?
रो-रोकर मर गई होगी
या अपनी बच्ची जैसी बच्चियों को
बचाने के लिए लड़ रही होगी?
2.
माँ मुझे हर क़ीमत पर ज़िंदा देखना चाहती है
इसीलिए बुर्क़ा पहनने के लिए मिन्नतें करती है
मैं बुर्क़ा पहनती हूँ, तो मेरी
पहचान जाएगी
बुर्क़ा नहीं पहनती हूँ तो मेरी जान जाएगी
मुझे लगता है कि रोज़-रोज़ मरने से बेहतर है
कि मैं लड़कर मरूँ और मरकर ज़िंदा रहूँ
3.
तालिबान के कंधों पर भारी-भरकम बंदूकें
धर्मांध पौरुष के रुआब की तरह लदी हैं
और अफ़ग़ानिस्तान के कंधों पर अभिशाप की तरह
4.
अफ़ग़ानिस्तान में न डॉक्टर होंगे
न वैज्ञानिक, न इंजीनियर, न वकील
न कलाकार, न दार्शनिक, न लेखक
सिर्फ़ एक अमूर्त मज़हब होगा
और उसकी हिफ़ाज़त में जुटे हत्यारे
किसी भी दौर में, कहीं भी मज़हब
जब मनुष्यों को नियंत्रित करता है
मनुष्यता ख़ून के आँसू रोती है
5.
धर्मांध तानाशाह
किताबें जलाते हैं सबसे पहले
जिसके पास किताब होती है
उसे फंदे से लटका देते हैं
भयावह हथियारों और
सेहतमंद शरीरों के बावजूद
वे किताबों से इतना क्यों डरते हैं
कि किताबों से बिहूना कर देना चाहते हैं
करोड़ों की आबादी का मुल्क
क्या सचमुच बेक़िताब हो जाएगा मुल्क?
कुछ लोग तो ज़रूर होंगे
जो किताबों को उनसे बचाकर रखेंगे
वे किताबों को छुपा देंगे ठीक वैसे ही
जैसे कोई बच्चा छुपाता है अपने कंचे
जैसे नौजवान छुपाते हैं अपनी मुहब्बत
या जैसे किसी पेड़ की दुरूह शाख पर
घोंसले में पंछी छुपा लेता है अपने बच्चे
6.
अफ़ग़ानिस्तान महज़ एक मुल्क नहीं है
कँटीली झाड़ियों से भरा एक भूखंड है
सारे फूल यहाँ कुचल दिए गए हैं
सारी हरी घास उखाड़ी जा चुकी है
यहाँ की धरती साँपों बिच्छुओं से पटी है
यहाँ पाँव धरने का अंजाम सिर्फ़ मौत है
दुनिया के बहुत से हिस्सों में तानाशाह
ऐसे ही भूखंडों के निर्माण में जुटे हैं
ऐसे तानाशाहों पर हम अगर मुग्ध रहे
दुनिया में हर जगह होंगे अफ़ग़ानिस्तान
7.
अफ़ग़ानिस्तान महज़ एक मुल्क नहीं है
यह इतिहास का रक्तरंजित अध्याय है
इस ख़ूनी अध्याय के पन्ने पलटते हुए
उंगलियाँ रक्त से सन कर झुरझुराती हैं
ऐसे अध्याय वहशियों की प्रेरणा होते हैं
मनुष्यता के पक्षधरों के लिए नसीहत
इस अध्याय को पढ़ते हुए जो लोग मज़े से
चटख़ारे लेते हुए उंगलियाँ चाट रहे हैं
उन पर पैनी नज़र रखी जानी चाहिए
ये वही लोग हैं जो मनुष्यता के इतिहास में
ऐसे अध्याय जोड़ने के लिए कसमसा रहे हैं
8.
अफ़ग़ानिस्तान महज़ एक मुल्क नहीं है
यह लाभ-हानि के गणित की बिसात भी है
अफ़ग़ानिस्तान में पसरी चीखों से निर्लिप्त
शासनाध्यक्ष जोड़ घटा गुणा भाग में लगे हैं
कि दरिंदों के समर्थन से क्या हासिल होगा
और कौन सा हासिल विरोध से खो जाएगा
वे विरोध भी करते हैं तो उनका नाम नहीं लेते
शासनाध्यक्षों ने यह गणित गिद्धों से सीखा है
या मुर्दाखोर गिद्धों ने इन शासनाध्यक्षों से?
9.
अफ़ग़ानिस्तान महज़ एक मुल्क नहीं है
यह ख़ूबसूरत दृश्यों की क़त्लगाह है
मज़हबी हुकूमत को शोर नापसंद है
उसे मरघटी सन्नाटा ही अच्छा लगता है
इस हुकूमत में चहकने पर रोक होगी
पेड़ों पर चिड़ियाँ नहीं चहकेंगी
स्कूल जाती बच्चियाँ नहीं चहकेंगी
बाज़ार में घूमते या काम पर आते जाते
मर्द और औरतें नहीं चहक सकेंगे
चहकने पर सज़ा-ए-मौत दी जाएगी
चहकने वालों पर नज़र रखी जाएगी
हालात ऐसे बना दिए जाएँगे कि चहक
सपनों में भी आए तो सिसकी की तरह
चहकते लोग दुनिया भर के तानाशाहों की
आँखों में कंकड़ियों की तरह कसकते हैं
10.
अफ़ग़ानिस्तान महज़ एक मुल्क नहीं है
यह नफ़रत का लावा उगलता ज्वालामुखी है
ऐसे ज्वालामुखी एक जगह तक महदूद नहीं
दुनिया के हर हिस्से में यह लावा धधक रहा है
यक़ीन न हो तो अपने आसपास ही देखिए
आपके कहकहों के शोर में भी गूँज उठती हैं
आग से जले, झुलसे लोगों की चीख़ें, कराहें
मनुष्यता के पक्षधरों को समझना ही होगा कि
विलाप दुनिया के किसी भी हिस्से में हो, कँपाता है
लावा किसी भी ज्वालामुखी से फूटे, जलाता
है
-0-
2- पेड़ों
के बोल / भीकम सिंह
पेड़ों के -
भर उठे बोल
मेह-मेह टेरते ,
सूखी पत्तियाँ रोईं
कोंपलों की आँखें
सिसकी …
सुबकी …
कोयल कूकी
चिड़िया हूकी
फूलों ने
पँखुड़ी झुकाई
पर मेघों को
दया ना आई ।
चुप्पी साधे
सिन्धु तक
पत्तों-पत्तों ने
बात पहुँचाई
सिन्धु चीखा
हुआ खारा-तीखा
बुलाए सारे
काले , सफेद, कपासी
ठाकुर, पंडित, पासी
और फटकार लगाई
सब दो-
हिसाब पाई-पाई ।
नन्हे-नन्हे
मेघों के बच्चे काँपे
कच्छे धोती
बदली के
अच्छे-अच्छे मर्द काँपे
इन्द्र ने
इरादे भाँपे
अपनी
कमजोरी को ढाँपे
सुलह की
अर्जी लगाई
सिन्धु ने
सभा बुलाई ।
नभ में फैले
जो रीते-रीते
लगने लगे
खाते -पीते
हुआ गर्जन-वर्जन
फिर अँधियारा
व्याकुल दिखी
विद्युत धारा
धड़ाम से गिरा
पारा-वारा
पेड़ों की साँस ,
तब -
साँस में आई ।
-0-
Sunday, August 15, 2021
1126
1-
क्षणिकाएँ
डॉ. सुरंगमा
यादव
1
बिखरा -बिखरा था मन
तेरे वादों ने आकर
समेट लिया।
2
जीवन में हो न हो
मन में सभी के
पलता है प्रेम।
3
चित्रकार नहीं हूँ
तुमसे मिली तो
सीख गयी रंग- संयोजन।
4
सीली दीवारें
पैच लगाया पर
उभरी सीलन।
5
पीड़ा गहरी
कभी न कभी आकर
मुख पर ठहरी।
6
जब टूटे सहारे
आँखों की ज़द में
थे किनारे।
7
हुआ विह्वल
फिर सीख गया मन
परिस्थितियों को जीना।
8
कैसा ये प्यार
रेतीले तट पर
नाव खेना दुश्वार!
-0-
2-आज़ादी का
मोल / कृष्णा वर्मा
सारी सलेटें मिटाईं थीं
सारी कड़ियाँ तोड़के
ख़ून से लकीर लगाई थी
तब कहीं पाई थी
यूँही नहीं मिली थी आज़ादी
उजडीं थीं अनगिन माओं की कोख
छिन गई थी राखियों से कलाइयाँ
बेरंग हुए थे असंख्य माँगों के सिंदूर
टूट गई थीं पिताओं के बुढ़ापे की लाठियाँ
मिट गए थे सरमाए
जवान बच्चियों को ज़हर के निवाले दे
किया था कुँओं तालाबों के सुपुर्द
चीरकर अपने कलेजे पाई थी
यूँही नहीं मिली थी आज़ादी
छाती पर गोलियाँ
गर्दनों पर छुरियाँ और पीठ पर पड़े
कोड़ों के निशान
साक्षी है आज़ादी की क़ीमत के
बलिदानों की ईंटों से
भरी थी आज़ादी की नीव
मृत्यु का वरण किया था तब पाई थी
यूँही नहीं मिली थी आज़ादी
आज़ादी की अंधी दौड़ में
छूट गए अपनों से अपनों के हाथ
लापता हो गए रिश्ते-नाते मित्र संबंधी
टुकडों-टुकड़ों में बँट गए
धर्म- जाति, भाषा -बोलियाँ
कोसों दूर छूट गईं थीं यारियाँ
तड़पड़ाके रह गया प्यार- मोहब्ब्त
आज भी टँगी हैं पलकों पर यादें
अपनों के सपनों में रंग भरने को
हँस-हँसके सूलियों पर लटके थे
आज़ादी के दीवाने
असाध्य को साधा था तब पाई थी
यूँही नहीं मिली थी आज़ादी
सूख नहीं पाया कभी 75 साला सैलाब
मरते दम तक भीगा रहा माँओ का आँचल
उठती रही कलेजे में हूक
सब्र के आँसुओं से धोती रहीं
दिल के ज़ख़्म
लहू से सींचा था धरा का आँचल
तब जन्मा था तिरंगा
बड़ा भारी मोल चुकाया तब पाई थी
यूँही नहीं मिली थी आज़ादी
दुविधाओं से जूझ-जूझ के देश संवारा है
वीरों के ख़ून से निखारा है
तिरंगा महज कपड़े का टुकड़ा नहीं
इसमें गुँथे हैं बलिदानों के किस्से
शौर्य की गाथाएँ
पहचान है यह मान है हमारा
विश्व में रहे अग्रिम बुलंद हो सितारा
तिमिर का वक्ष चीर पाई है आज़ादी
आज़ाद रहे आबाद रहे हिन्दुस्तान हमारा।
1125-आज़ादी के मायने
रश्मि विभा त्रिपाठी 'रिशू'
आज 15 अगस्त
है
आँख खुलते ही
आज़ादी के मायने
याद आए
जो ज़्यादातर
के लिए
यही हैं
बिल्कुल सही हैं
कार्य-स्थल पर
कुछ नारे लगवाने हैं
देश-भक्ति के गीत गाने
हैं
अमर शहीदों को
श्रद्धांजलि-सुमन
अर्पित कराने हैं
बच्चों के हाथों में
तिरंगे थमाने हैं
बूँदी के दौने
बँटवाने हैं
कुछ घर के लिए
बचाने हैं
आखिर उन्हें भी तो
ये उत्सव मनाने हैं
रैली निकाली जानी है
एक सभा
आयोजित करानी है
अपना पक्ष
गम्भीरता से रखना है
भाषण में करना है
परतन्त्रता का विरोध
स्वतंत्रता में बड़ा अवरोध
जो सदा से है
फिर साहब को
घर वापस जाना है
स्व-सुविधा हेतु
कुसुमा पर
दिन भर हुकुम चलाना है
शोषण मुक्ति की बात
साहब
मजदूर दिवस पर अगली बार करेंगे
फिर भाषण दे दासी का उद्धार करेंगे।


