पथ के साथी

Monday, May 24, 2021

1110-सोन चिरिया


सोन चिरिया

रतन रैना 


स्मृतियों के झरोखे से


झाँकती सोन चिरिया- सी

विचारों की एक लहर

उमड़ती- सी आई

मेरे मानस पर छा गई

और पहुँचा गई

हिमाच्छादित पर्वतों के आँगन में

खिलते पम्पोश से सुवासित 

डल झील में

तुम्बकनारी के साथ

गीत गुनगुनाते

हाजियों के पास

मलयज का गीत 

गुनगुनाते

सेव अखरोटों के 

बागान में

लुका- छिपी खेलता

मासूम बचपन

पनचक्की में

धान पीसता

सौन्दर्य जो

दिल की गहराइयों तक पैठा है

निर्वासन के बाद 

और भी बढ़ गया।

एक पीर , एक कसक 

फिर से जाग गई

जन्नते- कश्मीर के लिए।

-0-

परिचय

 श्रीमती रतन रैना

एम,ए संस्कृत, हिन्दी,एम एड

जन्म स्थान- श्रीनगर कश्मीर 

शिक्षा    ग्वालियर (म,प्र)

केन्द्रीय विद्यालय ग्वालियर  1969 प्राथमिक अध्यापक। विभिन्न केन्द्रीय विद्यालय मै कार्यरत कामठी,सागर,सूरत, बाल्को,ध्रांगध्रा ,दिल्ली ।दिल्ली मे करीब बीस साल ।यहीं से प्राचार्या से सेवानिवृत्त। 

यत्र तत्र कहानियो का प्रकाशन ।कविता  पुस्तक 

विचारो की सोन चिड़िया  प्रकाशित ।

Sunday, May 23, 2021

1109-छोटी_बड़ी कविताएँ

 1-भीकम सिंह 

 


पेड़
-1

 

जुगनूँ का 

अँधेरे पर आघात 

रात को 

जमीं नहीं ये बात 

इस पर

फड़-फड़ , लड़े ,पीपल पात 

तब हुई शांत 

अँधेरा पीती रात  ।

-0-

पेड़ -2

 

छाँह

पीपल की 

ऑक्सीजन डोज ।

स्नेह का धागा 

बाँधते हो 

रोज ।

कभी तो 

पीपल के वास्ते जी लो 

लगाकर पौध  ।

-0-

पेड़-3

 

टूट कर गिरे पत्ते 

फैली 

पेड़ों में भ्रांति 

वनविभाग 

बता रहा 

कोई क्रांति  ।

-0-

 1-नदी 

 

सुना है-

तुम फिर झिलमिलाने 

खिलखिलाने लगी हो, नदी ।

 

वो चाँद से 

मन का बहलाना 

नजदीकियाँ बढ़ाना 

हवाओं के स्पर्श से 

लहरें उड़ाना 

रातों में 

फिर करने लगी हो, नदी ।

 

किसी 

अधजली लाश से 

पछाड़ खाकर पास से 

दियों और सिक्कों से 

नंगों और भुक्खों से 

बातों  में

पिंड छुडाने लगी हो, नदी ।

सुना है-

-0-

 2-लड़कियाँ 

 

गुज़रे वक्त में 

बड़ी होती हैं लड़कियाँ  ।

 

इसलिए 

सुनसान सड़कों पर

कुछ फुसफुसाती 

ह्रदय विदारक पीर लिये

खड़ी होती हैं, लड़कियाँ ।

 वे सुन रही होती हैं 

शब्द !

पगध्वनि !

जो आशंका की 

घड़ी होती हैं, लड़कियाँ ।

 

विश्वास से भरा 

परि-आवरण 

अन्दर छुपाए 

घर-घर में खुशी की 

झड़ी होती हैं लड़कियाँ ।

-0-

 2-अनिता मंडा

 1-गाय

 


एक गाय थी उसके पास

वह उसे चारा देती, दूहती

गोबर पाथती

कभी-कभार जब गाय को

पसंद न आता सानी-पानी

सींग दिखा देती गाय

लात मारती।

 

उसके तो सींग भी लुप्त हो चुके

सदियों पहले

लात मारना उसका

उसे असभ्य करार देता।

-0-

 

2-पत्थर

 

दो पत्थर थे घर में

दोनों से वह सुबह शाम रूबरू होती

एक पर मिर्च मसाला पीसती

एक को अगरबत्ती दिखाती

छोटी सी गृहस्थी में

कुछ नहीं था

इनसे ज़्यादा ज़रूरी

-0-

Tuesday, May 18, 2021

1107-नहीं, अब वहाँ नहीं जाना

[कल यानी 17 मई को डॉ. हरदीप कौर सन्धु  जी का जन्म दिन था। सहज साहित्य, त्रिवेणी और हिन्दी हाइकु के सब रचनाकारों की तरफ़ से आपको हार्दिक बधाई !  विश्वभर में हाइकु, ताँका , सेदोका , चोका , हाइबन, माहिया आदि का जो प्रचार- प्रसार हुआ है, उसके लिए हिन्दी हाइकु और त्रिवेणी का योगदान सर्वाधिक है। बहन हरदीप जी ने इन दोनों ब्लॉग[ आज वेब रूप] से मुझको जोड़ा , यह मेरा सौभाग्य है। निःस्वार्थ रूप से कार्य करने वाली हरदीप जी को वे लोग भी  भूलते  जा रहे हैं, जिन्होंने इनसे सीखा। वे  अपना अलग रास्ता अपना चुके हैं। मैं इस बात को विशेष रूप से रेखांकित करना चाहता हूँ कि मैंने  जो इन विधाओं में थोड़ा-बहुत काम किया , उसमें हरदीप बहन का योगदान है। ईश्वर करे आप सदा स्वस्थ एवं प्रसन्न रहेंत, दीर्घायु हों और ये विधाएँ आपकी छत्रछाया में पल्ल्वित-पुष्पित होती रहें।  ] 

रामेश्वर काम्बोज



डॉ. हरदीप कौर सन्धु 

 

‘नहीं, अब वहाँ नहीं जाना’


जब भी मैं ये शब्द
, वाक्य दोहराता हूँ 

उसे मैं अपने सामने ही पाता  हूँ- 

' तुम समझे नहीं 

तुम बोलते बहुत हो'-

अपनी निरंतर चलती बातों की लड़ी को तोड़ते हुए 

उस ने कहा था, 

भर आँखों में उदासी 

वह मुस्करा रहा था- 

तुझे देख-देख जीता था 

कैसे भूल जाऊँ !

लौट आ अब भी 

मैं तो  अब तक वहीं  खड़ा हूँ 

'नहीं, नहीं अब वहाँ नहीं जाना 

तुझे दी जहाँ पीड़ा 

तेरा तोड़ा था यकीन 

चला गया तुझसे दूर 

तुझे करके ग़मगीन’- 

उस ने फिर कहा था 

भर आँखों में उदासी 

मन्द -मन्द मुस्करा रहा था- 


तेरी वो मुहब्बत
 

तेरा वो यकीन 

अब भी वैसा है 

कुछ भी बदला नहीं 

तेरा ऐसे चला जाना 

मुझे देकर झकानी ( बिना बताए )

सोचता हूँ कहीं 

कोई ख़्वाब तो नहीं 

मैं तो वहीं खड़ा हूँ 

वक्त जाता चाहे बीत 

मेरा वो आज है 

तेरा वो अतीत 

नहीं, अब वहाँ नहीं जाना 

हाँ, अब वहाँ नहीं जाना 

क्योंकि 

मैं तो वहीं ही खड़ा हूँ 

आज भी वहीं ही खड़ा हूँ।

-0- 

Tuesday, May 11, 2021

1105

 1-भीकम सिंह 

जल

 


बूँद
- बूँद-सा 

घुट -घुटकर

चुप्पी धर रहा है 

जल मर रहा है  ।

 

मुरझा गया 

झील तालों में 

नदी नालों में 

बोतलों में भर रहा है  ।

 

ध्वस्त हो रहा 

हिम का किला 

किरचें- किरचें उड़

हवा में बिखर रहा है ।

जल मर रहा है  ।

-0-

2-लहर

 

पुलिनों पर 

गिरती श्वेत-सी

थोड़ा खुद को दुबकाकर ।

 

सागर पर चलती 

मंथर-मंथर 

लौटे तो शरमाकर  ।

-0-

क्षणिकाएँ-अंजु गुप्ता

1

उगती है

सर उठाती है

फिर...

पैरों तले रौंद दी जाती है

क्या घास, क्या औरत !

 

2

फर्क है…

तेरे और मेरे समर्पण में !

मैं तुझको और तू मेरी देह को

समर्पित है ! !

-0-

Sunday, May 9, 2021

1104-माँ

 

1-माँ

 डॉ. रत्ना वर्मा  

 

हमारी माँ जो कभी


हमें तकलीफ़ में देख

दर्द दूर करने के

अनेकों उपाय करती थी

वो आज खुद दर्द में हैं

 

मैं कैसे दूर करूँ उनका दर्द

वो तो खुद हम सबका

दर्द समेटती आई है

 

कैसे पूछूं उनसे कि माँ

कैसे समेट लेती थी तुम

आँचल में हमारा दर्द

 आज

कराहती मां को देख

दर्द से भर आती हैं मेरी आँखें

 

अब जाकर समझ में आया

आँसूओं से भीगे उनके

 आँचल का राज़

 

हृदय के एक कोने में

 कैसे छिपा लेती थी

हम सबका दर्द

 

माँ ममता की खान होती है

प्यार और दुलार का

भंडार होती है

माँ और कुछ नहीं

बस माँ होती है l

-0- ( सम्पादक उदन्ती मासिक  http://www.udanti.com )

-0-

2-माँ  - सुशीला शील राणा

1.

हँसली बोली हार से, कलयुग है घनघोर।

माँ की साँसें गिन रहा, बँटवारे का शोर।।

2.

आले-खूँटी-खिड़कियाँ, चक्की-घड़े-किवाड़।

माँ की साँसें जब थमीं, रोए बुक्का फाड़।।

3.

माँ ने मुझको दे दिया, जो था उसके पास।

त्याग-नेकियाँ-सादगी, अपनी पूँजी ख़ास।।

4.

फिरकी -सी फिरती रही, दिन देखा न रैन।

बच्चों के सुख में मिला, माँ को हर पल चैन।।

-0-

सासू माँ को समर्पित -

5.

गहरे हों आघात या, विपदा हो घनघोर।

पी लेती हर पीड़ माँ, लाने को नव भोर।।

6.

हर दिन ही माँ का सखे, सौ टके की बात।

पहले खोले आँख माँ, फिर होता प्रभात।।

7.

इतराया है आसमाँ, कई सितारे जोड़।

ख़ुदा ज़मीं के वास्ते, बचे सितारे छोड़।।

8.

निश्छल माँ के प्यार- सा, मिला न कुछ भी शील।

दुनिया लपटें आँच की, माँ है शीतल झील।।

9.

धागे-सी जलती रही, पिघला सारा मोम।

ख़त्म हुई; रौशन हुए, माँ से जगती-व्योम।।

-0-

3-दोनो ही अभिनय में पारंगत ! मैं और माँ

अंजू खरबंदा

 


कल कितने दिन बाद मिले मैं और माँ

दिल का हाल बाँटा कुछ इघर की कुछ उधर की

जब मिल बैठे मैं और माँ !

 

कुछ बातों में उनका मन भर आया

कुछ में आंखे छलछला आई मेरी

जब हाल बाँटने बैठे मैं और माँ !

 

गई थी कि खूब बातें करूँगी

जी का सब हाल उनसे कहूँगी

अपना अपना दर्द बाँटेंगे मैं और माँ!

 

हम दोनों ही प्रत्यक्ष में हँस-हँसकर बोले

कितनी बातों पर हँसे दिल खोले

पर मन ही मन सब समझे मैं और माँ!

 

उनकी उदास आँखो ने कहा कुछ

मेरी उदास आँखो ने भी बतलाया कुछ

वास्तव में कहकर भी कुछ न बोले मैं और माँ!

 

बातों -बातों में कुछ उन्होंने छुपाया

मैंने भी उनको कहां सब बतलाया

एक दूसरे से कुछ कुछ छुपाते मैं और माँ!

 

जिस भारी मन से गई थी

भारी मन से ही वापिस

एक दूसरे को दुख न हो-दोनों ही सोचे मैं और माँ!

-0-

दिल्ली