पथ के साथी

Saturday, October 13, 2018

852


कृष्णा वर्मा
1
कैसे कह दूँ कि
थक चुका हूँ ज़िंदगी से
न जाने
किस-किस का हौसला हूँ मैं।
2
चित्र :अक्षय अमेरिया 
तुम्हारे मुख मंडल पर
देख कर खुशी की तरंगें
पकड़ने लगती है रफ़्तार
मेरी जीवन कश्ती।
4
सीख भरे शब्द -बीजों से
उगाती है माँ
नन्हे हृदयों में
संस्कारों की खेती।
5
प्रेम को मिला था सुकून
जिस दिन बाँध ली थीं उसने
अपने पल्लू के छोर से
मेरे घर की चाबियाँ।
6
उम्मीद के पंछी को
लग जाएँगे हौसलों के पंख
जो मुस्कुराता रहा तुम्हारा स्पंदन
मेरी साँसों के सफ़र में।
7
उम्र भले जितनी चाहे बढ़ा दे
बस रखना ध्यान
बालक- सा रहे मन और
होने न पाए बूढ़ी कभी
मेरी मासूमियत की मुस्कान।
8
कलम की नोक
तपे शब्द लिखकर
पिघला देती है
पीड़ा का मौन।
9
मेघ निनादित
बरखा लहराई
यादों की कश्तियाँ
नैनों में तैर आईं।
10
मेघों की लाडली
बरसना सँभलके
सबके लिए तेरा आना
नहीं होता सुहाना
बहुतों की छत को तो
देना पड़ जाता है इम्तहान।
11
 दिनों-दिन उन्नति की
बढ़ती जाती रफ़्तार
दिखाए अजूबे
विकास की नैया में
बैठ लोग डूबे।
-0-

Thursday, October 11, 2018

851-मन -जीवन


1-मन -जीवन
भावना सक्सैना

देह और मन का संघर्ष है बरसों से
कि दोनों ही अकसर साथ नहीं होते
देह जीती है अपने वर और शाप
कभी समतल धरती पर तो कभी
उबड़-खाबड़ घने गहरे जंगल में
और मन बुनता है घोंसला आकाश में
वह जीता है अकसर कल में
सपनों में, पुरानी डायरियों के पन्नों में
और कभी बैठ जाता है
दहकते ज्वालामुखी के मुहाने पर
फूँकता है उसमें शीतलता
कभी शांत हो जाती है ज्वाला
तो कभी राख हो जाता है मन।
जहाँ देह होती है
अकसर मन नहीं होता
यह जानते  हुए कि
कहीं होकर भी न होना
समय को खो देना है
मन बैठा रहता है
ऊँचे वृक्ष की फुनगी पर
वृक्ष के फलों से सरोकार नहीं
वह देखता है दूर तलक
सपने सुनहरे नए कल के।
देह जब अर्जित कर रही होती है
रेखांकन : रमेश गौतम 
अपने अनुभव और ज़ख्म सुख के
मन गुनगुनाता है
गीत किसी और क्षण के
किंतु शापित है मन
युगो-युगों से फिर-फिर
वही दोहराता आया है
उम्र भर देह से  रहकर जुदा
देह के बाद न रह पाया है
लाता है नियति एक ही
चलती नहीं किसी की जिस पर
मन जो रहता नहीं देह का होकर
खत्म हो जाता है देह संग जलकर।
फिर भी मन असीम अनंत
नन्ही चिड़िया- सा सँभालो इसे
कि जब टूटता है मन
देह में प्राण रहें ,न रहें
रह जाता नहीं उसमें जीवन।
-०-
2 -दोहे-
रेनू कुमारी
1
उसके आनन की चमक,जैसे खिलती धूप।
काली अलकों की घटा,सदा निखारे  रूप।।
2
फूलों से सजती शिखा,नैनन कजरा धार।
चंचल है वह रूपसी,करती दिल पर वार।।
3
मलयज -सी खुशबू  भरे ,सुन्दरता के गीत।
सहनशीलता प्रेम हैं, उसके सच्चे मीत।।
4
हाथों में कंगन सजा,पायल की झनकार।
करती हैं शृंगार जब,उर में  उमड़े  प्यार।।
5
वसुधा का शृंगार है, हरियाली चहुँ ओर।
मोर पपीहा मस्त हैं, पंछी  करते शोर।।
-०-

Tuesday, October 9, 2018

850


1-क्षणिकाएँ
सत्या शर्मा 'कीर्ति '

1-ओस

तुम हो मेरे
अनन्त आकाश
और मैं धरा की
कोमल दूब- सी
बरसे तेरा प्यार
मुझपे यूँ
जैसे ओस बूँद हो
वसंत ऋतु- सी
2
ये मोती सी  ओस
चन्द क्षणों में
पूरा  करके जीवन
समा जाती
धरती की गोद में
देने किसी पौधे को
नया जीवन
3
हरी  घास पर सोई
वो नन्ही-सी ओस
सूरज से
शरमाके
छिप जाती
धरती की  गोद में
और करती है
इंतजार पुनः
रात के आने का
4.
हवाओं के संग
झूमती
दूब की  नोक  पर
बैठी वो नन्ही-सी ओस
पानी की एक
बूँद नहीं
वो तो
आकाश की आँख से गिरा
आँसू है
जो धरती  की  याद में हर
रात रोता है।
5..
चाँद ने भेजे थे
चाँदनी के हाथों
जो अनगिनत
सितारे वो
मासूम से
ओस में ढल
धरती की
प्यास बुझा गए ।
-०-
2-दोहे
डॉ. सुरंगमा यादव
1
सावन- भादों बन गए,  मेरे  प्यासे  नैन।
मन पापी प्यासा फिरे, तुम बिन है बेचैन।।
2
आज न जाने शाम क्यों, लगती और उदास।
पल- छिन भी बीतें नहीं, साजन नाहीं पास।।
3
नारी अबला है नहीं, ज्ञान बुद्धि की खान।
रत्न बने तुलसी यहाँ, पा रत्ना से ज्ञान।।
4
आज मनुज  को देखकर, विधना भी हैरान।
पल-पल बदले रूप ये, मुश्किल है पहचान।।
5
पल में  आँखें फेर  लीं,   अपने थे जो खास।
जब तक सुख की छाँव थी, रहे तभी तक पास।।
6
जीर्ण पुरातन त्याग दो, मधु  ऋतु आयी द्वार।
नव पल्लव, नव सुमन से, प्रकृति  करे शृंगार
7
द्वेष घृणा का हो गया, आदी सकल समाज।
दया,  प्रेम बंदी खड़े, हाथ जोड़ कर आज।।
8
शब्दों  पर बंदिश लगी, सच पर कसी लगाम।
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता,  देता हमें निजाम ।।

Friday, October 5, 2018

आज का चिन्तन

बीमार सोच

रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'

        बीमार सोच को ढोने वाले लोग हर क्षेत्र में मिल जाएँगे ।सुबह जागकर अख़बार में चोरी ,डकैती ,हत्या ,लूट ,दुर्घटना की ख़बर तलाश करना ; दिन भर ऐसी ख़बरों के वर्णन में अपनी सारी ताकत झोंक देना कुछ लोगों का शगल बन गया है ।दूसरी श्रेणी में वे भले लोग हैं ;जो बुरी ख़बर को ‘आज का चिन्तन’ की सुबह ही सुबह परिचितों को सुनाएँगे ।उस समय उनकी मुखमुद्रा एक सुलझे हुए सन्त जैसी लगेगी ।वे अपनी बात के कुप्रभाव से पूरी तरह निरीह रूप से अनजान होते हैं ।इसी तरह की नकारात्मक सोच हमारे शिक्षा –जगत् की भी सबसे बड़ी खामी है । ऐसा तभी होता है ;जब व्यक्ति अपने वर्तमान से ऊपर नहीं उठ पाता है ,अपने अतीत से मुक्त नहीं हो पाता है ।आने वाले समय के लिए न योजना बना सकता है ,न उन्हें लागू करने का ख़तरा उठा सकता है ।अपने अतीत के प्रक्षेपण से पूरे भविष्य को आच्छादित करना चाहता है । अपनी नकारात्मक सोच से पूरे विश्व को नरक बनाने का उद्यम ज़रूर कर लेता है ; लेकिन छोटे –से प्रयास से फूल देने वाला का एक पौधा लगाने में अपना अपमान समझने लगता है । ऐसे बीमार लोग इस देश में बहुतायत से पाए जाते हैं । हंगामा और हड़ताल करने में ज़मीन -आसमान के कुलाबे मिला सकते हैं। घण्टों बेकार की बातों पर बहस कर सकते हैं ,कुतर्क की कीचड़ में गोता लगा सकते हैं ;लेकिन सड़क पर घायल पड़े आदमी को अस्पताल नहीं पहुँचा सकते ।ज्ञान को कैद करके कालकोठरी में डाल सकते हैं,उजाले के पैरों में बेड़ी पहना सकते हैं ;परन्तु उजाले को बेरोकटोक बाहर नही जाने देंगे ।इन बीमार सोच वाले लोगों ने भावी पीढ़ी का जीवन बहुत कठिन कर दिया है। निरन्तर नया सोचने वालों और करने वालों को कदम –कदम पर प्रतिरोध का सामना करना पड़ता है अपनी कुण्ठा को छात्रों पर लादना कायरता ही नहीं वरन् अपने सामाजिक दायित्वों की उपेक्षा है ।इसका कुप्रभाव निकट भविष्य में शिक्षा-जगत को प्रभावित किए बिना नही रहेगा ।
         बीमार सोच वाले लोग हमारे किशोरों को क्या देंगे ? हताशा निराशा और कुण्ठा के सिवाय शायद ही कुछ दे पाएँ । यदि हमें इनका भविष्य बचाना है तो सकारात्मक सोच को बढ़ावा देना पड़ेगा ।प्रयास करना होगा कि स्वस्थ मानसिकता वाले लोग ही शिक्षा के क्षेत्र में आएँ । युवा पीढ़ी के सामने सबसे बड़ा संकट आदर्श का है । शिक्षक अगर उनका आदर्श बनने में असमर्थ है तो फिर इस दायित्व को कौन सँभालेगा ? संभवत कोई नहीं ।आस्था और निर्माण की विचारधारा रखने वाले लोग भारत के भविष्य का निर्माण करने के लिए आगे आएँ
 ;तभी यह नई पीढ़ी सही दिशा में आगे बढ़ सकेगी । निदा फाज़ली के शब्दों में कहें तो यह समीचीन होगा -
‘घर से मस्ज़िद है बहुत दूर तो चलों यूँ कर लें
किसी रोते हुए बच्चे को हँसाया जाए ।’

Wednesday, October 3, 2018

848


डॉ.पूर्णिमा राय
 1
बोएँ शिक्षा -बीज सब ,पाएँगे फल चार।
उज्ज्वल मानवता बने,सपने हों साकार।।
2
साक्षर बनके कर रहे,भारत नाम महान।।
खान गुणों की है बने, ज्ञानी औ विद्वान।।
3
पावन भावों से भरी, ये रेशम की डोर।
भाई के बिन बहन की, कैसे हो नव भोर।।
4
रंग-बिरंगी ही चमक ,फैली चारों ओर।
बहन-प्रेम के सामने,चलता किसका जोर।।
5
सावन की बरसात में, रहना मत अब दूर।
सासों में तुम हो बसे ,तुम्हीं आँख के नूर।।
6
पुरवैया मोहक चले,ओ मेरे मनमीत।
नेह डोर ही बाँधती ,तेरी-मेरी प्रीत।।
7
प्रीत महक से खिल उठे,प्रतिपल  मेरी  साँस।
तृप्ति मिले जब रूह को,रहे न कोई प्यास।।
8
नतमस्तक होकर मिले,मात-पिता का प्यार।
दिल न दुखाना भूल से ,करना सद्व्यवहार।।
9
जो आशा मन में रहे,मिल जाए मन मीत।
कानों में रस घोलता,कोयल- सा संगीत।।
10
धीरे-धीरे पग बढ़े, अपनी मंजिल ओर।
मिले नहीं ठहराव से,खुशी भरी नव भोर।।    
-0-  डॉ.पूर्णिमा राय,
इमेल-drpurnima01.dpr@gmail.com
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