पथ के साथी

Friday, August 21, 2009

शिक्षकों के लिए ई-मंच - टीचर्स आफ इंडिया

शिक्षकों के लिए ई-मंच - टीचर्स आफ इंडिया 
यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि शिक्षक हमारी शिक्षा व्‍यवस्‍था के हृदय हैं। शिक्षा को अगर बेहतर बनाना है तो शिक्षण विधियों के साथ-साथ शिक्षकों को भी इस हेतु पेशेवर रूप से सक्षम तथा बौद्धिक रूप से सम्‍पन्‍न बनाए जाने की जरूरत है।

राष्‍ट्रीय पाठ्यचर्या 2005 में भी शिक्षक की भूमिका पर विशेष रूप से चर्चा की गई है। इसमें कहा गया है कि शिक्षक बहुमुखी संदर्भों में काम करते हैं। शिक्षक को शिक्षा के संदर्भों,विद्यार्थियों की अलग-अलग पृष्‍ठभूमियों,वृहत राष्‍ट्रीय और खगोलीय संदर्भों,समानता,सामाजिक न्‍याय, लिंग समानता आदि के उत्‍कृष्‍ठता लक्ष्‍यों और राष्‍ट्रीय चिंताओं के प्रति ज्‍यादा संवेदनशील और जवाबदेह होना चाहिए। इन अपेक्षाओं पर खरा उतरने के लिए आवश्‍यक है कि शिक्षक-शिक्षा में ऐसे तत्‍वों का समावेश हो जो उन्‍हें इसके लिए सक्षम बना सके।

इसके लिए हर स्‍तर पर तरह-तरह के प्रयास करने होंगे। टीचर्स आफ इंडिया पोर्टल ऐसा ही एक प्रयास है। गुणवत्‍ता पूर्ण शिक्षा की प्राप्ति के लिए कार्यरत अज़ीम प्रेमजी फाउंडेशन (एपीएफ) ने इसकी शुरुआत की है। महामहिम राष्‍ट्रपति महोदया श्रीमती प्रतिभा पाटिल ने वर्ष 2008 में शिक्षक दिवस इसका शुभांरभ किया था। यह हिन्‍दी,कन्‍नड़, तमिल,तेलुगू ,मराठी,उडि़या, गुजराती ‍तथा अंग्रेजी में है। जल्‍द ही मलयालम,पंजाबी,बंगाली और उर्दू में भी शुरू करने की योजना है। पोर्टल राष्‍ट्रीय ज्ञान आयोग द्वारा समर्थित है। इसे आप www.teachersofindia.org पर जाकर देख सकते हैं। यह सुविधा नि:शुल्‍क है।

क्‍या है पोर्टल में !

इस पोर्टल में क्‍या है इसकी एक झलक यहाँ प्रस्‍तुत है। Teachers of India.org शिक्षकों के लिए एक ऐसी जगह है जहाँ वे अपनी पेशेवर क्षमताओं को बढ़ा सकते हैं। पोर्टल शिक्षकों के लिए-

1. एक ऐसा मंच है, जहां वे विभिन्‍न विषयों, भाषाओं और राज्‍यों के शिक्षकों से संवाद कर सकते हैं।

2. ऐसे मौके उपलब्‍ध कराता है, जिससे वे देश भर के शिक्षकों के साथ विभिन्‍न शैक्षणिक विधियों और उनके विभिन्‍न पहुलओं पर अपने विचारों, अनुभवों का आदान-प्रदान कर सकते हैं।

3. शैक्षिक नवाचार,शिक्षा से सम्बंधित जानकारियों और स्रोतों को दुनिया भर से विभिन्‍न भारतीय भाषाओं में उन तक लाता है।

Teachers of India.org शिक्षकों को अपने मत अभिव्‍यक्‍त करने के लिए मंच भी देता है। शिक्षक अपने शैक्षणिक जीवन के किसी भी विषय पर अपने विचारों को पोर्टल पर रख सकते हैं। पोर्टल के लिए सामग्री भेज सकते हैं। यह सामग्री शिक्षण विधियों, स्‍कूल के अनुभवों, आजमाए गए शैक्षिक नवाचारों या नए विचारों के बारे में हो सकती है।

विभिन्न शैक्षिक विषयों, मुद्दों पर लेख, शिक्षानीतियों से सम्बंधित दस्‍तावेज,शैक्षणिक निर्देशिकाएँ, माडॅयूल्स आदि पोर्टल से सीधे या विभिन्न लिंक के माध्‍यम से प्राप्‍त किए जा सकते हैं।

शिक्षक विभिन्न स्‍तम्‍भों के माध्‍यम से पोर्टल पर भागीदारी कर सकते हैं।

माह के शिक्षक पोर्टल का एक विशेष फीचर है। इसमें हम ऐसे शिक्षकों को सामने ला रहे हैं,जिन्‍होंने अपने उल्लेखनीय शैक्षणिक काम की बदौलत न केवल स्‍कूल को नई दिशा दी है, वरन् समुदाय के बीच शिक्षक की छवि को सही मायने में स्‍थापित किया है। पोर्टल पर एक ऐसी डायरेक्‍टरी भी है जो शिक्षा के विभिन्‍न क्षेत्रों में काम कर रही संस्‍थाओं की जानकारी देती है।

आप सबसे अनुरोध है कि कम से कम एक बार इस पोर्टल पर जरूर आएँ। खासकर वे साथी जो शिक्षक हैं या फिर शिक्षा से किसी न किसी रूप में जुड़े हैं। अगर आपका अपना कोई ब्‍लाग है तो इस जानकारी को या टीचर्स आफ इंडिया के लिंक को उस पर देने का कष्‍ट करें।

इस पोर्टल के बारे में अधिक जानकारी के लिए आप मुझसे
पर संपर्क कर सकते हैं।


तो मुझे आपका इंतजार रहेगा। 

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Saturday, August 15, 2009

जागरूक भारत



रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'
  धर्मान्धता संक्रामक रोग है , मतान्धता विष है , जातिवाद पागलपन है , क्षेत्रीयतावाद राष्ट्र की जड़ों को खोखला करने वाला घुन है और भ्रष्टाचार इन सबका बाप है । स्वयं को श्रेष्ठ न होते हुए भी श्रेष्ट होने की भावना इन मरणान्तक व्याधियों को बढ़ावा देती है । ये सभी व्याधियाँ राष्ट्र को कमज़ोर करती हैं ।
  चुनाव के समय इनका असली प्रकोप देखा जा सकता है । अच्छे लोकतन्त्र के लिए ये सबसे बड़ा खतरा हैं । इनका सहारा लेकर जब तक वोट माँगने का सिलसिला बरकरार रहेगा ; तब तक ये राष्ट्र को कुतरते रहेंगे । इस अवसर पर जैसे भी जीत मिले ; उसी तरह के हथकण्डे अपनाए जाते हैं ।
  आर्थिक शक्तियाँ कुछ लोगों तक सीमित होती जा रही हैं ।भ्रष्टाचार शिष्टाचार का स्थान लेता जा रहा है । शिक्षा समर्पित लोगों के हाथ में न होकर व्यापारियों के हाथ में चली गई है ।यह ख़तरा देश का सबसे बड़ा ख़तरा है । भू माफिया की तरह शिक्षा माफिया का उदय इस सदी की सबसे बड़ी विडम्बना और अभिशाप हैं । भारत की बौद्धिक सम्पदा का एक बड़ा भाग उच्च शिक्षा से निकट भविष्य में वंचित होने वाला है । इसका कारण बनेंगी लूट का खेल खेलनेवाली धनपिपासु शिक्षा संस्थाएँ; जहाँ शिक्षा दिलाने की औक़ात भारत के ईमानदार 'ए' श्रेणी के अधिकारी के बूते से भी बाहर हो रही है । सामान्यजन किस खेत की मूली है ।
  एक वर्ग वह है जो सरकार की तमाम कल्याणकारी योजनाओं को अपनी तिकड़म से पलीता लगाने में माहिर है । वह सारी सुविधाओं को आवारा साँड की तरह चर जाता है । तटस्थ रहकर काम नहीं चल सकता । हमें समय रहते चेतना होगा; अन्यथा हम भी बराबर के कसूरवार होंगे । समृद्ध भारत के लिए हमें सबसे पहले जागरूक भारत बनाना होगा । सोया हुआ
उदासीन भारत सब प्रकार की कमज़ोरियों का कारण न बने ; हमें यह प्रयास करना होगा । हमें आन्तरिक षड़यन्त्रों पर काबू पाना होगा; तभी हम देश के बाहरी दुश्मनों का मुकाबला कर सकते हैं । हम यह बात गाँठ बाँध लें कि कोई देश किसी का सगा नहीं होता , सगा होता है उनका राष्ट्रीय हित । हम राष्ट्रीय हितों की बलि देकर सम्बन्ध बनाएँगे तो धोखा खाएँगे, जैसा अतीत में खाते रहे हैं ।
15 अगस्त 09


Wednesday, July 22, 2009

मैं उजाला हूँ


मैं उजाला हूँ
-रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'

मैं उजाला हूँ ,उजाला ही रहूँगा ।
अँधेरी गलियों में ज्योति-सा बहूँगा ।
चाँद मुझे गह लेंगे कुछ पल के लिए ,
पर मैं रोशनी की कहानी कहूँगा ॥
XXXXXX
पल जो भी मिले  हैं मुझे उपहार में ।
उनको लुटा दूँगा मैं सिर्फ़ प्यार में ।
 नफ़रत की फ़सलें उगाई हैं जिसने;
मिलेगा उसे क्या अब इस संसार में ॥

[22 जुलाई 2009]

Sunday, June 21, 2009

जीवन की कर्मभूमि



जीवन की कर्मभूमि
रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'



जीवन की इस कर्मभूमि में ,
ठीक नहीं है बैठे रहना ।
बहुत ज़रूरी है जीवन में
सबकी सुनना ,अपनी कहना ।
सुख जो पाए, हम मुस्काए,
आँसू आए ,उनको सहना ।
रुककर पानी सड़ जाता है,
नदी सरीखे निशदिन बहना
[21जून,2009 ]

Thursday, June 18, 2009

महत्त्वपूर्ण पत्रिकाएँ-1



महत्त्वपूर्ण पत्रिकाएँ
शब्दशिल्पियों के
आसपास
सम्पादक : राजुरकर राज
वार्षिक: 60 रुपये
सम्पर्क: एच-3,उद्धवदास मेहता परिसर
नेहरू नगर भोपाल -462003
चलित वार्ता : 09425007710
ई-मेल-shabdshilpi@yahoo.com
यह पत्रिका पूर्णतया साहित्यिक समाचारों के लिए समर्पित है । जून 09 के इस अंक में अगाथा संगमा के हिन्दी में शपथ –ग्रहण को महत्त्व प्रदान किया है ,जो सर्वथा उचित है ।पत्रिका का यह बारहवाँ वर्ष है ।साहित्यिक गतिविधियों के प्रति सजग रहनेवाले पाठकों को यह पत्रिका ज़रूर पढ़नी चाहिए ।

भारतीय वाङ्मय [मासिक]
संस्थापक एवं पूर्व प्रधान सम्पादक
स्व पुरोषत्तमदास मोदी
सम्पादक: परागकुमार मोदी
वार्षिक शुल्क : 50 रुपये
विश्वविद्यालय प्रकाशन ,विशालाक्षी भवन पो बा 1149
चौक वाराणसी -221001[उ प्र]
पिछले दस वर्षों से निरन्तर प्रकाशित हिन्दी तथा
-->अहिन्दीभाषी क्षेत्रों के साहित्यिक-सांस्कृतिक समाचारों की मासिक पत्रिका है ।मई अंक मेंअस्तमित युग-प्रभाकर…’विष्णु प्रभाकर पर विशिष्ट लेख ,’यन्त्रअनुवाद की समस्या और सम्भावना’-श्रीनारायण समीर ,’बालपुस्तकालय : किताबों से बनी एक कहानी’-सुरेखा पाणंदीकर ,डॉशुकदेव सिंह की पुस्तक ‘भोजपुरी और हिन्दी’( भोजपुरी व्याकरण कीपहली पुस्तक) का एक अंश –‘सीतला मईआ’, ‘हिन्दी को भी चाहिएएक जामवन्त’-पंकज श्रीवास्तव, ‘पोथी ही न पढ़ाएँ ,जीवन मूल्यसिखाएं’-पुष्पेश पंत- महत्त्वपूर्ण हैं ।विभिन्न साहित्यिक समाचारों एवंगतिविधियों का लेखा-जोखा इस लघु पत्रिका के बड़े काम का आईना है ।
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Monday, June 15, 2009

महत्त्वपूर्ण पत्रिकाएँ





जीवन-मूल्य संरक्षक न्यूज़ मासिक
सम्पादक -डॉ एन के शर्मा
सम्पादन सहयोग-नरेन्द्र कुमार
एक अंक –दस रुपये, वार्षिक -100रुपये
सम्पादकीय कार्यालय
ए-5 बी/7 एस एफ़ एस फ़्लैट्स
पश्चिम विहार, नई दिल्ली -63
-इस पत्रिका के अप्रैल अंक में ‘दिल्ली की लौ : बहन सत्यवती’: ब्रजमोहन, ‘भुखमरी की सवारी बनती मोटरगाड़ी’: पंकज बिष्ट बुज़ुर्गों के लिए अभी बेहतर हैं गाँव:राजकुमार दिवाकर महत्त्वपूर्ण लेख हैं । बिष्ट जी का लेख तो आँखें खोलनेवाला और चौंकानेवाला है । शहीद अवतार सिंह ‘पाश’ की कविता –‘तीसरा महायुद्ध’ बहुत गहरे प्रश्न छोड़ती है । मई अंक में अछूत का सवाल : शहीद भगत सिंह, दो दुनियाओं के बीच स्त्री : मजीद अहमद के लेख, हर्षवर्धन आर्य का विष्णु प्रभाकर पर संस्मरण : और पंछी उड़ गया,अमर गोस्वामी की लघुकथा :प्याऊ ,गोरख पाण्डेय और सुधा अर्पिता की कविताएँ ध्यान आकर्षित करती हैं । सम्पादकीय – ‘जूता फेंकना :जनतांत्रिक मूल्यों का अपमान’ सोचने पर बाध्य करता है कि हमारी भेड़ चाल और दिमागी दिवालियापन हमें कहाँ ले जाकर छोड़ेंगे !मूल्यों का यह ह्रास चिन्तित करनेवाला है । पत्रिका में सम्पादकीय परिश्रम इसे बेहतर बनाए हुए है ।
-0-
आरोह-अवरोह
सम्पादक : डॉ शंकर प्रसाद
साहित्य परामर्शी : डॉ सतीशराज पुष्करणा
आरोह-अवरोह का मई -2009 छठा अंक है । यह अंक ‘श्रम को समर्पित विशेषांक’ के रूप में आया है । इस अंक में ‘बाल श्रम प्रथा के उन्मूलन की दशा और दिशा :डॉ कुमार विमल , ‘बिहार से पलायन’: श्रीकान्त,भूमण्डलीकरण और स्त्री :अनामिका के लेख ध्यान आकर्षित करते हैं ।डॉ बालेन्दु शेखर तिवारी का व्यंग्य , डॉ पुष्करणा और डॉ मिथिलेश कुमारी की लघुकथाएँ, पुस्तक समीक्षाएँ और सम्पादकीय महत्त्वपूर्ण हैं । डॉ यशोधरा राठौर के पाँच गीत जीवन के विभिन्न रंग उकेरने में सक्षम हैं ।

Tuesday, June 9, 2009

अमलतास के झूमर:




।रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

धरती तपती लोहे जैसी
गरम थपेड़े लू भी मारे।
अमलतास तुम किसके बल पर
खिल -खिल करते बॉंह पसारे।

पीले फूलों के गजरे तुम
भरी दुपहरी में लटकाए।
चुप हैं राहें सन्नाटा है
फिर भी तुम हो आस लगाए।

Friday, May 15, 2009

पत्रिका:अप्रतिम वार्षिकी


अप्रतिम वार्षिकी
[जनवरी 2009]
सम्पादक : वीरेन्द्र कुमार सिंह
आवरण एवम सज्जा : नीता सिंह
सम्पर्क:पो बा न 3,
पो ओ गोमती नगर ,लखनऊ-226010
पृष्ठ ; 150 ,मूल्य ; तीस रुपये
साहित्य का अखाड़ा खूँदने वाले लोगों से हटकर साफ़-सुथरी पत्रिका निकालना एक चुनौती भरा कार्य है । श्री वीरेन्द्र कुमार सिंह जी ने इस चुनौती भरे कार्य को बखूबी अंज़ाम दिया है । ‘कुछ अपनी’सम्पादकीय में सम्पादक ने प्रचार की प्राणवायु के सहारे ज़िन्दा रहने वाले साहित्यकारों की ख़बर ली है । इस अंक में अप्रतिम द्वारा आयोजित-शैलेश मटियानी स्मृति अखिल भारतीय कहानी प्रतियोगिता’ में प्रथम ,द्वितीय ,तृतीय एवं सांत्वना पुरस्कार प्राप्त कहानीकारों ( सलिल सुधाकर ,अल्पना मिश्र ,तरुण भटनागर ,शमीउद्दीन और मीनाक्षी) के अतिरिक्त तीन अन्य कहानीकारों की कहानियाँ, 5 आलेख , 7 कविताएँ ,3 संस्मरण ,उपन्यास अंश ,7 गीतकारों के गीत-नवगीत,गज़ल ,व्यंग्य,परिचर्चा, नाट्य रूपान्तर साक्षात्कार ,पत्र,लघुकथा , पुनर्प्रकाशन पुस्तक अंश का समावेश किया है ।पत्रिका की पूरी सामग्री पठनीय एवं संग्रहणीय है ।

Monday, May 11, 2009

मणिमाला-3


मणिमाला-3
रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'
1-पूजा
       पूजा आडम्बर नहीं मन को  शुद्ध करने की प्रक्रिया है  जो अपने आपको शुद्ध प्रमाणित करने  की आवश्यकता समझते हैं , वे तरह –तरह के आडम्बरों में पड़ते हैं ।
2- लोभ-वृत्ति
       लोभ-वृत्ति मनुष्य के आत्मसम्मान को डँस लेती है।
3-विवेक
       उचित –अनुचित का विवेक करना , मनुष्य के मनुष्य होने की पहचान है । सेठ –साहूकार के पास गिरवी रखा धन प्राप्त हो सकता है; परन्तु गिरवी रखा विवेक नहीं ।
4-प्रकाश के उपासक
       अँधेरे में रहना , अँधेरे में रखना रोशनी के शत्रुओं की प्रवृत्ति रही है। प्रकाश के उपासक युगों-युगों से अँधेरे की हर पर्त उघाड़ने के लिए प्रयासरत रहे हैं ।
5-साधनों की पवित्रता
       कोई भी कार्य अपने साधनों से श्रेष्ठ माना जाता है। निकृष्ट साधनों से प्राप्त स्वर्ग भी त्याज्य है ।
6-कर्मशील
        मैं नरक में भी कई जन्मों तक रह सकता हूँ; यदि वहाँ काम से जी चुरानेवाले लोग न हों ।
7- अच्छी सलाह
       सर्प को अमृत रुचिकर नहीं लगता । दुष्ट को अच्छी सलाह कभी नहीं भाएगी ।
8-धर्म
       जो धर्म मनुष्य को मनुष्य नहीं समझता वह  मनुष्य से ऊपर नहीं है; राष्ट्र से ऊपर तो हो ही नहीं सकता ।
9-धर्म और कवच
              धर्म को कवच की आवश्यकता नहीं होती ।धर्म अपने आप में कवच है ।फ़तवों की बैसाखी पर आदमी ही ठीक से नहीं चल सकता ; धर्म कैसे चलेगा ।
[ 24 जनवरी, 2007]

मणिमाला-1


मणिमाला-1

रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'
1-बड़ा काम
        जो किसी काम को छोटा समझकर उसे करना नहीं चाहता,वह  ज़िन्दगी में कभी बड़ा काम नहीं कर सकता ।
2-सदाचारी
       सदाचारी व्यक्ति अपने  कार्यों से बड़े बनते हैं। दुराचारी व्यक्ति दूसरों के काम में बाधाएँ उत्पन्न करके बड़प्पन बटोरना चाहते हैं ;लेकिन एक  न एक दिन उनकी कलई खुल जाती है ।
3-विश्वासघात
       मित्रों से विश्वासघात करनेवाला व्यक्ति खुद से भी विश्वासघात करता है ।
4-कपट-भावना
       धूर्त्त व्यक्ति अपनी मीठी-मीठी बातों का सहारा रोज़-रोज़ नहीं ले सकता ।   उसकी कपट-भावना  कभी न कभी प्रकट हो ही जाती है ।
5-शिक्षक
       जिस शिक्षक के मन में जाति-पाँति  और ऊँच-नीच का कूड़ा-कचरा भरा होता है, वह कभी विद्यार्थियों के हृदय को नहीं जीत सकता है ।
6-चापलूस
       चापलूस  व्यक्ति अपना स्वार्थ सिद्ध हो जाने पर अजनबी जैसा व्यवहार करने लगता है ।
7-चुगलखोर
              चुगलखोर पर कभी विश्वास मत करो ।उसके लिए न कोई अपना है और न पराया ।उसकी जीभ को तो विष-वमन करने में ही आनन्द मिलता है ।
8-ईर्ष्या
      ईर्ष्या का प्रारम्भ दुर्बलता  से होता है । मानसिक रूप से पंगु व्यक्ति ईर्ष्या में रात –दिन जलकर अपने विवेक की भी हत्या कर देते हैं ।
[10 -8-1986]

मणिमाला-2


मणिमाला-2
रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'
1-अनुभव की आँच
   ठोस व्यक्तित्व का स्वामी अनुभव की आँच में तपकर और सुदृढ़ हो जाता है ; परन्तु फुसफुस व्यक्तित्व वाले लोग अनुभव की आँच नहीं झेल पाते ;इसीलिए पिंघलकर अस्तित्वहीन  जाते हैं ।
2-अनु्भव का मापदण्ड
   अनु्भव का मापदण्ड  कार्यक्षमता है , समय का अन्तराल नहीं ।सजग व्यक्ति एक साल में जितना सीख लेता है ; उलझे विचारों वाला व्यक्ति बीस साल में भी उतना नहीं सीख पाता है ।
3-पलायनवादी व्यक्ति
   पलायनवादी व्यक्ति न दूसरों की बात समझ सकता है और न दूसरों को अपनी बात समझा सकता है। वह कमज़ोर लोगों के सामने गुर्राता है तो दृढ़ लोगों के सामने घिघियाता है ।
4- आत्मप्रशंसा
    जो अपनी प्रशंसा स्वयं करता है, उसे दस-बीस लोग मूर्ख न भी समझें तो क्या फ़र्क पड़ता है ।
5-स्वार्थ
   स्वार्थ का रेगिस्तान सम्बन्धों की तरलता को सुखाकर ही दम लेता है ।
6-शोभा
   जूते पैरों की शोभा बढ़ा सकते हैं, सिर की नहीं  ।सिर की शोभा वही बढ़ा सकता है ;जो सबका   चहेता होता है ।
7-अनुशासन
   अनुशासन आन्तरिक चेतना है। भय के कारण दिखाया गया अनुशासन केवल ढोंग है। व्यवस्था का अंकुश हटते ही भय से अनुशासित लोग कामचोर बनने में पीछे नहीं रहते ।
8-विचार-शक्ति
   जो स्वयं किसी बात का निर्णय नहीं ले सकते  , उनकी विचार-शक्ति  की अकाल मृत्यु हो  जाती है और उन्हें हमेशा किसी दूसरे के इशारों पर ही नाचना पड़ता है ।
9- कंगाल
   दूसरे के मुँह का कौर छीनकर खानेवाला व्यक्ति भले ही करोड़पति बन जाए ; परन्तु मन से वह कंगाल ही रहता है ।
10-ईमानदारी
   यदि किसी की ईमानदारी को परखना है तो उसे बेईमानी  करने का अवसर दीजिए । अवसर मिलने पर भी जो ईमानदार बना रहे ;वही सच्चा ईमानदार है ।
[ 4 जनवरी, 1987]

Friday, May 8, 2009

गुलमोहर की छॉंव में


गुलमोहर की छॉंव में
रामेश्वर काम्बोज हिमांशु
गर्म रेत पर चलकर आए
छाले पड़ गए पॉंव में
आओ पलभर पास में बैठो
गुलमोहर की छॉंव में ।
नयनों की मादकता देखो
गुलमोहर में छाई है
हरी पत्तियों की पलकों में
कलियॉं भी मुस्काईं हैं।
बाहें फैला बुला रहे हैं
हम सबको हर ठॉंव में।
चार बरस पहले जब इनको
रोप –रोप हरसाए थे
कभी दीमक से कभी शीत से
कुछ पौधे मुरझाए थे।
हर मौसम की मार झेल ये
बने बाराती गॉंव में।
सिर पर बॉंधे फूल मुरैठा
सज– धजकर ये आए हैं
मौसम के गर्म थपेड़ों में
जीभर कर मुस्काए हैं।
आओ हम इन सबसे पूछें
कैसे हॅंसे अभाव में।
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असभ्यनगर

समीक्षा

असभ्य नगर

असभ्य नगर श्री रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' की बासठ लघुकथाओं का संकलन है। लघुकथा को लेकर हिमांशु जी के पास भावनात्मक आवेग के साथ मूल्यपरक जीवनदृष्टि भी है। इन लघुकथाओं को पढते हुए हम हृदय की उन धडकनों के साक्षी बन जाते हैं जिन्हें हिमांशु जी ने अपनी लघुकथाओं की रक्तवाहिनी माना है।

वस्तुत: लघुकथा आयाम की दृष्टि से ही लघु होती है, प्रभाव की दृष्टि से लघुकथाएँ स्थायी चिह्न छोड जातीं हैं। लघुकथा का प्रारंभ और अंत दोनो ही रचना की मारक क्षमता को पैना बनाते हैं। लघुकथा यदि मन को विचलित कर दे, चेतना को झंकृत कर दे या विचार को उद्वेलित कर दे तो उसका सृजन सार्थक हो जाता है। लघुकथा में भावना का स्फोट तो होता ही है, शब्दों की मितव्ययिता लघुकथा की प्रहार क्षमता को लक्ष्य केंद्रित करती है। यहीं लघुकथा शब्दभेदी (अंतर्भेदी) बाण बन जाती है। लघुकथा में शब्द मंत्रों की शक्ति पा जाते हैं, क्योंकि वे चेतना निर्झर से स्वत: बहकर आते हैं। सायास कलात्मकता की सृष्टि कभी–कभी लघुकथा की आत्मा को इतने बोझिल आवरण पहना देती है कि भावना का संस्पर्श हो ही नहीं पाता। इस संकलन में हिमांशु जी की अधिकतर लघुकथाएँ इस व्यर्थ के बोझ से मुक्त हैं।

इस संकलन की कुछ लघुकथाएँ मर्म को छू जातीं हैं और कुछ लघुकथाएँ अपने संक्षिप्त कलेवर में भी किसी महागाथा का सार सोंप जातीं हैं। गंगास्नान की पारो सामाजिक कल्याण को गंगास्नान से अधिक महत्त्वपूर्ण मानकर परिवर्तित मानसिकता का संदेश देती है, वहीं शाप में बिल्लू की माँ शाप के रूप में स्वार्थ आहत होने पर उपजी कटुता को आदर्शों पर वरीयता देकर एक विद्रूप को उजागर कर जाती है। लघुकथा 'संस्कार' संकलन की एक ऐसी लघुकथा है जिसमें लघुकथा के समस्त गुण समाहित हैं। लघुकथा महात्मा और डाकू स्वर्ग–नरक की अवधारणा के माध्यम से वर्तमान न्याय व्यवस्था के कुरूप चेहरे पर लगे गंभीर मुखौटे को नोच लेने की एक ईमानदार कोशिश कही जा सकती है। वफादारी में कुत्ते के माध्यम से मनुष्य की कृतघ्नता को नकार के गहन स्वर दिए गए हैं। आरोप में जहाँ राजनीति की आपराधिक प्रवृत्तियों का अनावरण है, वहीं स्त्री–पुरुष में तथाकथित शिक्षित वर्ग के मन का कलुष संदेहग्रस्त बौद्धिकता के पहाड पर जमी ब‍र्फ़ की तरह एक बोझ भरा अवसाद छोड जाता हैं।

लघुकथा लौटते हुए में आधुनिक समाज में नारी–पुरुष समानता की तमाम लफ्फाजी के बाद भी पुरुष मानसिकता में बसे श्रेष्ठता के भाव को उजागर कर हिमांशु जी ने पति–पत्नी के संबंधों में संदेह के कारण आने वाले भूचाल और पारस्परिक विश्वास की आधारशिला को गहरी मार्मिकता के साथ उद्घाटित किया है। संकलन की अंतिम लघुकथा असभ्य नगर जो संकलन की शीर्षक कथा भी है, नागरी सभ्यता के बड़बोलेपन को जंगली कबूतर और उल्लू के बीच संवाद के माध्यम से अभिव्यक्त करती है। लघुकथा का अंतिम वाक्य '' मेरे भाई, जंगल हमेशा नगरों से अधिक सभ्य रहे हैं। तभी तो ऋषि–मुनि यहाँ आकर तपस्या करते थे।'' असभ्य नगर को एक तार्किक परिणिति तक पहुँचा देता है।

लघुकथा ऊँचाई, चट्टे बट्टे, मुखौटा और मसीहा मानवीय मन की भावुक तरलता तथा सामाजिक एवं राजनैतिक विसंगतियों को उजागर करने वाली अन्य उल्लेखनीय रचनाएँ हैं। असभ्य नगर की लघुकथाएं एक ओर मानवीय संवेदनाओं को स्वर देतीं हैं वहीं दूसरी ओर सामाजिक विद्रूपों को पूरे घिनौनेपन के साथ प्रदर्शित कर लेखक के दायित्व बोध की सजगता भी उद्घाटित करतीं हैं। हिमांशु जी की भावुक संवेदना और बेचैनी आशा जगाती है कि भविष्य में वे कुछ और मर्मस्पर्शी लघुकथा संकलन हिन्दी जगत को अवश्य देंगे।

––––– नवीन चतुर्वेदी

जी 1 सार्थक एनक्लेव

साउथ सिविल लाइंस

जबलपुर (म.प्र.)408001