पथ के साथी

Sunday, October 11, 2026

1533

 

आज की स्त्री/डॉ. कनक लता 

 

आज की स्त्री

सब लौटाती है

नाप-तौलकर,

बल्कि बढ़ाकर।

समय के साथ,

कभी थोड़ा धीरे,

कभी शीघ्र,

मगर लौटाती है

सब कुछ।

पर स्त्री जात है न,

प्रवृत्ति में है -

सँजोना, सँवारना, आकार देना।

सो आपका दिया सब सँजो लेती है,

इस्तेमाल भी करती है,

कभी प्रेम से,

तो कभी मर्यादा के लिए।

पर उतना ही या उससे भी अधिक निर्मित करती है,

सृजित करती है,

सजाती है, सँवारती है, आकार देती है,

उस पर अपने प्रेम, घृणा, नफ़रत, प्रतिस्पर्धा की मुहर लगाती है,

और लौटा देती है

आपको,

आपके समाज को।

आज की स्त्री

सब लौटाती है…

4 comments:

  1. बहुत बढ़िया, वह स्त्री है उसे जो दिया जायेगा उसे दोगुना लुटा देगी चाहे सम्मान हो या सामान डॉ वंदना शर्मा नई दिल्ली

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    1. बहुत धन्यवाद आदरणीया...🙏😊

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  2. धन्यवाद सहज साहित्य और काम्बोज भइया को भी बहुत धन्यवाद मेरी कविता को इस उत्कृष्ट पटल पर स्थान देने के लिए.. 🙏😊

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