पथ के साथी

Tuesday, February 7, 2023

1285-तुम्हारा ख़याल

 रश्मि विभा त्रिपाठी


रश्मि विभा त्रिपाठी

ख़याल 

माँ की उँगली थामे

मेले में घूमते 

छोटे बच्चे- सा है

हाथ छूटा

तो 

क्या मालूम 

कहाँ गुम हो जाएगा 

 

ख़याल

जड़ से सूखे

एक 

भरे- पूरे पेड़- सा है

जो 

दोबारा 

कभी नहीं हरियाएगा

 

ख़याल 

पहाड़ों की गोद से

उछलकर 

उतरी

नदी- सा है

जो मैदानों में जाकर

भूल बैठी

वापसी का रास्ता

 

ख़याल 

चाँद- सा है 

जिसका 

अमावस से

कुछ भी नहीं 

लेकिन 

कुछ न कुछ तो है वास्ता

 

ख़याल 

सफर पर निकले

मुसाफिर- सा

जिसे 

मंजिल का भी इम्कान नहीं

और 

घर लौटकर आना भी 

जिसके लिए 

आसान नहीं

 

ख़याल 

मौसम- सा है

जिसका 

कोई ऐतबार नहीं

कब बदल जाए

कौन- सी चाल चल जाए 

 

ख़याल वक्त- सा है

जो एकबारगी

गुज़र जाए 

तो 

पलटकर

फिर नहीं आए 

 

ख़याल उम्र- सा है

जो

दिन- ब- दिन

धीरे- धीरे 

ढलता ही चला जाए 

 

ख़याल मौत- सा है

जो दम तोड़ दे

तो फिर से 

साँस ना ले पाए

 

मेरे ख़याल में 

तुम 

रहते हो

इस तरह

जैसे

रहते हैं

आदमी के साथ- साथ साए

 

मेरी रूह में 

तुम्हारा खयाल

पल रहा है

हर हाल में

मेरा एहतमाम 

मुसलसल 

रहा है

कि

ये

कसकरके 

तुम्हारी उँगली 

पकड़े रहे

हरियाता रहे

हरहराता रहे

ये 

हमेशा रहे

चमकते चाँद- सा

जिसके दीदार से हो

हर दिन ईद

जिसे पूजकर

अखण्ड सुहाग की

मनौती पूरी हो

दमकती रहूँ 

मैं

जिसे बाहर की हवा 

लगने नहीं दूँ

कहीं घर से 

निकलने नहीं दूँ 

जो 

सदाबहार रहे

और 

मैं महकूँ

पूरे हों 

दिल के अरमान 

रहे- रहे

पल- पल जिसके संग चलूँ 

आँधी- तूफान में

हाथ में हाथ लेकर 

शहर की सड़क

मुहल्ले की गली

या घर के दालान में

 

तुम्हारे ख़याल की 

रवानी 

ज्यों- ज्यों बढ़ रही है

त्यों - त्यों 

अहसास पर 

जवानी 

चढ़ रही है

जो

अब तक

मुझे जिंदा रखे हुए है

और 

जिसे मैं 

अपने जीते- जी

कभी मरने नहीं दूँगी

चाहे कोई कुछ भी कहे।

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Thursday, February 2, 2023

1283-तीन कविताएँ

 अंतरा करवड़े

1-मोक्षद्वार

 

जमी पहाड़ियों के सामने वसंत का नाम लेने पर,

या बहती नदी के समक्ष झरने का राग छेड़ने पर,

कुछ बूँदें होती हैं, जो सर उठाकर देखती हैं!

यकीनन धूप आने पर पहली भाप उनसे ही उठती होगी..

वे ही पसारती होंगी नभ के सामने भरा पूरा मन,

और स्वरूप बदलकर भी जारी रहती है उनकी यात्रा

फिर बादल बनकर आकाश पर टँगी-सी

गीलेपन को दूधिया बनाकर आसमानी सैलाब बन

टेर सुनती है उसी प्रवाह की, जमे ठहराव की

कोई मुक्ति- सा क्षण आता होगा जब बरसती हैं

बादल से टूटकर फिर बूँद का रूप धर गिरती है

नदी को फिर अपने आँसुओं से ही सँवारती हैं

फिर वे ही आगे बढ़कर जमाव बिंदु के आमंत्रण पर

सख्त भी होना कबूल करती हैं हिमकणों में

चौरासी नही बस ये बहती उड़ती जमती योनियाँ हैं

वसंत की पुकार पर फिर, मोक्षद्वार जाने को तत्पर

फर्क है बस एक, ये कभी गीलापन छोड़ती नहीं है

बर्फ बादल के बीच भी बूँदें नदी से मुख मोड़ती नहीं हैं 

 

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2-विसर्जक

 

एक वृक्ष रचता है महाकाव्य अपने जीवन में

हवा की थपकियों में निबद्ध उसकी सुरीली रागिनी

पत्तों की कलम में होता है, ओस की स्याही का जोश

हर मौसम के अपने अध्याय हैं, मिट्टी से पगे

बाँकपन से अँगड़ाई लेती डालियों के ताल पर

फूलों का सुरभित काव्यगीत साकार कर

फिर श्रम सार्थक परिपक्व सा निश्चिंत हो

फलों में विरासत के शब्द बीज बोता हुआ

एक वृक्ष प्रथम सृजनकर्ता है, जीवन का

उसकी हरीतिमा में फलित है काव्य सार

जो प्रयत्न से प्राप्त फलों को भी फिर

विलग कर डालियों से, जोगिया हो जाता है

बस फल ही नहीं फिर पतझर में पत्ते भी

और वृक्ष संन्यासी- सा लीलाधर बनकर

एक वर्ष में एक जीवन का मर्म समझाकर

छोड़ देता है स्वयं को प्रकृति के चिरंतन प्रवाह में

मिट्टी से मिट्टी की यात्रा के जुड़ाव बिखराव में

हर वृक्ष के महाकाव्य का नाम जीवन है

हर वृक्ष के वसंत का नाम पावन है

हर वृक्ष मानव से परे की भाषा का सर्जक है

और वृक्ष ही है जो स्वयं अपना विसर्जक है

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3-वासंती पंचामृत

 

चेरी ब्लॉसम पर लदे गुलाबी सफेद उमंग के गुब्बारे

चढ़ती बेल पर मुस्काते मधुमालती के मुखड़ों से अलग कहां

दोनों में से ही झांकती है कौतूहल- भरी ललक

दुनिया देखने की, साँस भर जीने की, महकने की

आसमानी छतरी के नीचे, शहद में डूबी ये खुशियाँ

कितने शिशुओं की किलकारियों- सी गूँजती है

अपनी सर्जक शाख की गोद में पोटली- सी

फिर उमगती नन्हे भ्रमर के आगमन से आतुर

इनका क्षणार्ध वसंत कैसा प्रमुदित प्राकृतिक- सा

चटख सूरज को भी देखकर सीधी आँख से

जीवन सार्थक कर खिर जाती हैं, बीते पड़ावों सी

कोई शोक गीत नहीं बजता, रुदन न आँसू कहीं

बस वसंत अपनी कविता लिखता है डालों पर

और ये लाल गुलाबी खुशियां उसकी रागिनी बन

रंग, रुप, रस, गंध स्वर का बना पंचामृत

सार्थक कर देती है, एक जीवन का होना

पूर्ण कर देती है, एक वसंत का जीना

 

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अंतरा करवड़े

हिंदी व मराठी लेखन, श्रव्य साहित्य, बहुभाषी अनुवाद व ध्वनि सेवाओं के क्षेत्र में कार्यरत। लघुकथा, कविता व ललित निबंध सहित अनेक पुस्तकों का प्रकाशन व उनपर तीस से भी अधिक पुरस्कार। मुख्य रुप से म.प्र. साहित्य अकादमी का ’शब्द साधिका’ सम्मान। विविध राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय साहित्यिक व अनुवाद कार्यशालाओं में चर्चाकार व शोध पत्र वाचन सहित भारत का प्रतिनिधित्व। साहित्य व तकनीक के संगम के अंतर्गत ’सुनो लघुकथा’ व ’मन कस्तूरी’ ऑथरेटर परिकल्पना पर ऑडियो पुस्तकें। आध्यात्मिक, बाल साहित्य व जीवनीपरक लेखन पर नियमित पॉडकास्ट। पाठ्यक्रम में रचनाएं शामिल। साहित्य के ध्वन्यात्मक स्वरूप व रेडियो लेखन का वृहद अनुभव। अंतर्राष्ट्रीय स्तर के साहित्य सम्मेलनों की परिकल्पना, प्रबंधन व सफल संचालन का वैविध्यपूर्ण अनुभव। लघुकथा सम्मेलन व महिला साहित्य सम्मेलनों के नियमित आयोजनों में प्रमुख भूमिका। अखिल भारतीय स्तर के मंचों पर विधागत व विषय विशेषज्ञ के रुप में नियमित उपस्थिति। अनेक अंतर्राष्ट्रीय संस्थानों से संबद्ध। वर्तमान में अनुवाद, लेखन व ध्वनि सेवा संस्थान ’अनुध्वनि’ का संचालन।

Wednesday, February 1, 2023

1282-क्षणिकाएँ

कृष्णा वर्मा

 1

सपने गुणा करते-करते 

घटा हो गए अपने

हासिल हुआ अहं।

2

नज़र जब

मंज़िल पर टिक जाए

तो मुक्त नहीं होते हैं पाँव

यात्रा से।

3

श्वेत रंग में जो होती वफ़ा

तो नमक भी होता

ज़ख़्मों की दवा।

4

ओढ़कर   

तुम्हारी प्रीत का

पशमीना

पा लेते हैं ऊष्मा

मेरे कँपकँपाते ख़्याल।

5

ग़ज़ल न होती तो

चंद शब्दों में 

कौन समेटता 

आग को।

6

भट्टी में पककर भी

रहता है ठंडा मिट्टी का घड़ा

जानता है

मिट्टी से बने को अंतत: 

मिट्टी ही होना है।


7

रिश्ते में मजबूती हो तो

बिना कहे ही

होते हैं महसूस।

8

अपनों के साथ जब

खड़े हो जाते हैं अपने

फिर चाहे हो मरुथल

हो जाते हैं हरे।

9

कौन बचा है प्रेम से

प्रेम पाने वाले

प्रेम में लिखते हैं कविताएँ

प्रेम से वंचित

लिखते हैं कविताओं में प्रेम।

10

पुण्य किसी का

दुश्मन नहीं और

पाप किसी का

सगा नहीं।

11


ज़रूरी नहीं

उपहार कोई वस्तु ही हो

इज़्ज़त और परवाह भी तो

किसी उपहार से कम नहीं।

12

समय न हराता है

न जिताता है

समय तो केवल

सिखाता है।

13

धोखा देने वाला क्या जाने

धोखा सहने वाला

स्वयं को ईश्वर के कितना

निकट महसूस करता हैं।

14

दिलों में रहने वाले लोग

अक्सर किस्मत की सूची में

नहीं लिखे होते।

15

किस काम की

शर्मसारों की शर्म

जो दूसरों की बेशर्मी देखकर

साधे रहते हैं चुप्पी।

16

दाने के मोह में

जाल में फसने वाले

तरस जाते हैं

उड़ानों के लिए।

17

मन ही मन

दोहराते हैं अब बीती बातें

बचा ही कौन अपना

जो सुनकर हुंकारा भरे।

18

संभल के लगाएँ

बुझी राख को हाथ

आख़िर इसके सीने में

पलती है आग।

19

आप और तुम में

बस इतना ही फ़र्क है

तुम के कांधे पर

हाथ रखकर

दिल खोलकर कर सकते हैं

दर्द बयानी।

20

बड़ी सयानी होती हैं

मुस्कुराहटें

लगा देती हैं लगाम

हमारी भावनाओं पर।

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