पथ के साथी

Saturday, November 7, 2026

1541-ज्योति -पर्व

डॉ.सुरंगमा यादव

1-कवित्त / घनाक्षरी

वर्ष बिताके चौदह, लौटे रघुनंदन हैं,

 लखन से भ्राता संग और सीता माई हैं।

 अवध के भाग जागे, दुख के अँधेरे कटे,

 खुशियों की दीपावली, चारों ओर छाई है।

 आरती उतारें आके, मुदित कौशल्या माता,

 ग्लानि बड़ी कैकेयी के, मन में समाई है,

 दोष न तुम्हारा माता, विधि का विधान सब,

 हँसकर राम ने ये, बात समझाई है।

2.

जगमग दीपावली,मावस की छटा खिली,

पीत परिधान आज, यामिनी ने धारे हैं ।

चारों ओर दीप सजे, झिलमिल रूप करे,

नभ ने सितारे आज, धरा  पे उतारे हैं ।

ॠद्धि-सिद्धि साथ लेके ,आओ गणनायक जी,

स्वागत में सजे घर, आँगन तुम्हारे हैं।

शुभ-लाभ सब पाएँ, बरसाओ कृपा ऐसी,

पूर्ण मनोरथ करो,माता लक्ष्मी हमारे।

 

झूलना छंद

1

 झूमती हैं दिशा, प्रकाशित है निशा, पूर्ण अब प्रतीक्षा, हरषाइए।

 दीप मालिकाएँ, लेकर ललनाएँ, घर-द्वार सजाएँ, मुसकाइए।

 मनोरथ हमारे, भाग्य के सितारे, सिद्ध- सफल सारे,प्रभु आइए।

 लाभ संग शुभता, लक्ष्य की सुलभता, लक्ष्मी जी विभुता, बरसाइए।

 

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