पथ के साथी

Sunday, March 12, 2023

1300-क्षणिकाएँ

 रश्मि विभा त्रिपाठी


1

वो मेरा ही सगा बनकर 

क्यों मुझे  डँसता है,

मैंने तो ये सुना था- 

हर दिल में खुदा बसता है!

2

होठों से टपके प्यार

हर दिल में भरा छलावा,

अब किसी को चाहने का मतलब है-

अपनी मौत का बुलावा!

3

उनकी बेरुखी की अदा से 

रेज़ा- रेज़ा बिखर गई,

वो जख़्म अपनों से मिला 

कि मैं प्यार से अब डर गई।

4

साँप को अपना समझकर

हमने बाहों में कस लिया,

अंजाम तो ये होना ही था,

उसने प्यार से डँस लिया।

5

पेश आया बदतमीजी से

अदब की आदत नहीं रही,

यक़ीनन उस शख़्स को

अब मुझसे मुहब्बत नहीं रही।

6

यों तो वक़्त माहिर है

हर मर्ज का इलाज करने में

मगर 

इक उम्र लगती है 

दिल के घाव भरने में।

7

तल्ख़ लहजे में तेरा 

यों मुझसे उलझ जाना,

मुमकिन नहीं अब उम्र भर 

रिश्ते का सुलझ जाना।

8

न वक्त खराब है

न लोग खराब हैं

हाँ!

पहले दूसरों के बारे में

सोचते थे

अब सबकी आँखों में

अपने- अपने ख़्वाब हैं।

9

माँग- माँगकर 

अपनेपन की भीख

मैं हारी

तब रिश्तों ने दी एक सीख

सुख में सबके संग खूब नाच

दुख में भूले से मत दीख।

10

ये प्यार सच्चा है या झूठा

अभी लेते रहो ये बात हलके में

खैर,

इसकी पुष्टि होगी किसी दिन

तहलके में।

11

बहुत मिले अपने

सबने दिखाए संवेदना के सपने

पर समय ने एक दिन ली 

जब मेरी परीक्षा कड़ी

तब गौर से देखा

सबको अपनी- अपनी पड़ी  

मानवता किसी के लिए थी ही नहीं बड़ी।

12

नहीं देख सकते 

खाते हुए चैन की रोटी

मेरे कुछ रिश्तेदारों को अपच है

कोई किसी का नहीं, 

सुनती आई थी

पर अब मैं मानने लगी हूँ-

ये बिल्कुल सच है।

13

हमने यह पाया-

हरेक का होकर,

बीत रहा है पल

हर दिन अब रोकर।

14

किस पे एतबार करूँ, 

पल- पल रंग बदलते शख़्स, 

मुझे फिर से मुहब्बत नहीं करनी, 

ख़ुदा के लिए मुझे तू बख़्श।

16

दिल में मोम रखो,

पर भूसा न भरो अक्ल में

भेड़िए घूमते- फिरते हैं 

अब इंसान की शक्ल में।

17

ये जिस तरह मुसलसल 

मुझे आ रही है हिचकी,

परदेस में मेरी याद में 

तुम्हीं ने ली होगी सिसकी।

18

चार किताबें पढ़करके

मत सिखालाओ होशियारी,

मुझको इतना पता है-

एक तरफ है प्यार,

एक तरफ दुनियादारी।

19

मुहब्बतों के फूल 

कहाँ हैं 

दिलों की शाख पर

आजकल 

जज़्बात सबने 

रख दिए हैं ताख पर।

20

प्यार के फूल 

सिर्फ महकाते हैं,

आप किस दम पे 

मुझे बहकाते हैं?

21

वो कौन थे, कहाँ के थे 

जो एक- दूसरे के लिए रखे रहते थे 

अपनी जान हथेली पर,

इस बज्म में तो अब 

सबके सब नजर टिकाए हैं

धन- दौलत, हवेली पर।

22

किसी का प्यार 

दे जाए सुकूँ 

कभी तो पल को 

आँख झपके

खुलती है बात धोखे की

सुनूँ किस्से झड़प के

रह जाता है दिल तड़पके!

23

जरा- सा दिल भर आया, 

दो आँसू आँख से क्या टपके,

अपनी- अपनी ताक में 

लोग मेरी ओर लपके।

24

चाँद आसमाँ का 

मेरी छत पे उतर आया,

उसकी यादों का 

मैंने एक चिराग क्या जलाया!

25

तुम इस तरह मिले 

और यों जुदा हो गए, 

उस पल के बाद से 

मेरे लिए खुदा हो गए।

26

मेरी रातों में

चाँद

मेरे कमरे में निकलता है

तुम्हारी याद का

इक कतरा

जब

मेरे सीने में पिघलता है।

-0-

Wednesday, March 8, 2023

1299-क्यों न मैं पेड़ हो जाऊँ

 रश्मि विभा त्रिपाठी



1

कुछ ऐसा ही है

तुम्हारे प्यार और हमदर्दी में

जैसे

किसी गरीब को मिल जाए कम्बल

कड़ाके की सर्दी में।

2

हँसी का चटख रंग गाल पर

पोतके स्याही बवाल पर

तुमने सजा दिया

जीवन का कैनवास

लेकरके

इन्द्रधनुषी प्यार

तुम धन्य हो मेरे शिल्पकार!

3

अहसास की बारिश में

कभी जो

भीग जाओगे,

मुहब्बत

किसको कहते हैं

तुम यकीनन सीख जाओगे।

4

ज़िस्म के सादा वरक़ पे कभी

शिद्दत- ए- अहसास का

नक़्शा न दिखेगा,

मुहब्बत पढ़ने का गर अक़ीदा है

तो खोलिए रूह की मुक़द्दस किताब को।

5

सबसे छुपाकरके

पलकों के परदे में

रखती हूँ,

कहीं देख न ले

दुनिया तुमको

मैं हर पल

एहतियात बरतती हूँ।

6

उम्र बेकारी में गुजार दूँ

और अधेड़ हो जाऊँ,

किसी को छाँव दूँ घनी

क्यों न मैं पेड़ हो जाऊँ।

7

ले- देके

यही एक असबाब

मेरे पास है,

तुम हो कहीं भी,

पर तुमको मेरा अहसास है।

8

लफ्जों की पगडंडियों पर

मुझको न तलाशना,

जज्बात की गली में

पूछ लेना तुम मेरा ठिकाना।

9

ख़्वाब की मानिंद

मेरी निगाह में पलते हो,

सफर ये खूबसूरत है,

तुम संग- संग राह में चलते हो।

10

मेरी वस्ल- ए- आरज़ू को

तुमने जो घड़ियाँ उधार दीं,

मैंने गम- ए- फिराक़ में

उनके दम पे सदियाँ गुजार दीं।

11

जला है

वक़्त की धूप में

कितना ही मुसलसल,

उस पेड़ ने मुझ पर

मगर

साया किया है हर पल।

12

तुम्हारे मेरे बीच का प्यार

नई सड़क नहीं

जो उद्घाटन के दूसरे दिन ही उखड़ी है!

तुम्हारा मेरा प्यार

अकेले आदमी के हाथ से चिपका हुआ

एक एन्ड्रायड मोबाइल

जिसके भीतर के डाटा की स्पीड तगड़ी है!!

13

हर रोज हादसे,

आँसू हैं,

मातम है, इद्दत है,

मैं अब तक जो

साँस ले पा रही हूँ-

ये तुम्हारे प्यार की शिद्दत है।

14

यों पूरा हुआ

तुम्हें पाने का मेरा अरमान

एक परिंदे को

ज्यों मिल गया आसमान।

-0-

Saturday, March 4, 2023

1298-क्षणिकाएँ

 -रश्मि विभा त्रिपाठी


1

वक्त ने खेला

ये कहकरके

मेरे साथ

खेल गंदा-

' देख!

अब तेरे ही अपने कसेंगे

तेरे गले में फंदा। '

2

अपना समझकर

खोला था जिसके आगे

दिल का हर राज

फिर

एक दिन वही

झपट पड़ा मुझपर

बनकरके बाज।


3

कर-करके

'मेरा-मेरा'

चले गए जो

उठाकर अपना डेरा

एक आदमी भी

नहीं पहुँचा

उनके घर

करने को फेरा।

4

बुरे वक्त की

बस

यही है

एक अच्छी बात,

इसी दौरान

पता चलती है

हरेक की औकात।

5

माना

मेरे संग रहा

वक्त का

बर्ताव

बेहद खराब,

फिर भी खुश हूँ

कि

इसने

खींच दिए

चेहरों से नकाब।

6

उधर

वक्त के खेल में

आदमी को

मिली

शिकस्त करारी,

इधर

डुगडुगी बजाते

उसीके अपने

बन बैठे मदारी।

7

पहले के लोग मानते थे-

घर में चार बर्तन हों

तो कभी-कभी खटकते हैं!

अब पल में

छोटी—सी बात पर

एक-दूसरे पर चलते मुकदमे

परिवार पूरी जिंदगी

अदालतों की चौखट पर

अपना सर पटकते हैं

बच्चे भटकते हैं।

8

बड़े-बूढ़ों का मत था

कि प्रेम में भेद

पाप है

इस नीति पर चलने का

मुझे तो पश्चाताप है

मेरा अपना

जो आज दुश्मन बना

उसके सामने दिल का शीशा रखना

कितना गलत था!

9

आजकल

बेहतर है, मत कहना

जाकर

किसी से

मन की बात

वरना

वही बैठ जाएगा

तुम्हारे रास्ते में लगाकर घात।

10

सच बताना-

मैंने तुम्हें और तुमने मुझे

अपना माना

अपराध है?

साधकर बैठा है जमाना

अपनी ओर निशाना।

11

वक्त

जब नहीं रहा

मेरे संग,

मैंने

अपनों को

देखा

बदलते रंग।

12

कभी आजमाना हो

तो

झूठमूठ की

करना

थोड़ी—सी खिटपिट

फिर देखना

रिश्ते

रिश्ते नहीं-

हैं गिरगिट।