पथ के साथी

Saturday, October 2, 2021

1138-पुल-

 भीकम सिंह

1-पुल-सा- मैं 

 

उद्धत लहरों से 

टकराता

किनारों से 

बतियाता 

बाँहें लचीली

कँधे मजबूत करे 

नदी की धारा में 

खड़ा है पुल  ।

 

ठीक वैसे ही 

मौन

कुछ अनजान 

विश्वासों से रीता 

पसीने से भीगा 

जीवन- धारा में 

जिम्मेदारी लेकर 

खड़ा हूँ मैं   ।

 

पुल का उतार

पुल का चढ़ाव 

पुल का पार

पुल का आर

पुल का कम्पन 

पुल की टूटन 

यकीन मानों 

मेरी ही हैं ये क्रियाएँ  ।

-0-

2-मैने सीखा भूगोल

 

मेरे पिता

छोटे- से किसान

चाचा-चरवाहा

और ताऊ-बुद्धू

एक ही गली में रहते

एक ही अहाते के पीछे

अपने-अपने

गम-पीते

सपने-जीते

आपसी मसलों को

कभी मुट्ठियाँ बाँधे

कभी मुट्ठियाँ खोले

करते रहते घोल-मोल

उनसे ही सीखा मैने भूगोल ।

 

सबसे पहले चाचा निकलता

घर से मेरे

सवेरे-सवेरे

मैली धोती

फटा कुर्ता

नंगे पैर

कृश काया लिये

भैंस , कटरों का शोर

भर जाता गली में

गीत की तरह

चाचा गुनते

कटरों और भैंसों का रँभाना

और बुनते दिन का गोल

उनसे ही सीखा मैने भूगोल  ।

 

कि संसाधन होना

अलग बात

और संसाधन जीना

अलग बात

पैरों को पत्थर करने

की कला

जंगलों में

नंगा रहने की मजबूरी

और उसका राज़

नि:संदेह

बहकाने के मंतर

गीदड़ और भेड़ियों में अन्तर

उजड़ते चारागाहों का झोल

उनसे ही सीखा मैने भूगोल  ।

 

सुबह-अँधेरे

पिता मेरे

आधे-नंगे

भले-चंगे

छह फीट लम्बे

रखते संयम

तय थे नियम

पहले बैल खोलते

फिर जुआ तोलते

फिर

फौलादी उँगलियों से

उठाते थे हल

तो, लुंगी कर लेते थे गोल

उनसे ही सीखा मैने भूगोल  ।

 

एक बैल

और बधिया से

कभी फावड़े

कभी हँसिया से

जोत आते थे खेत

पर हाथ लगती थी

रेत

फक़त रेत

तब-तब

वजह जानते

और मानते

ताकत का जादू

धैर्य रखने का मोल

उनसे ही सीखा मैने भूगोल  ।

 

सफेद कुर्ता

फैंटेदार धोती

एक छोर धोती का

हाथ में थामें

आँखों पर

मोटे फ्रेम का

चश्मा बाँधे

ठक-ठक चाल को

धीमे -धीमे चलता

फिर ताऊ निकलता

गौरवर्णी

मध्यम कद

और चेहरा गोल - मटोल

उनसे ही सीखा मैने भूगोल  ।

 

परिवार उन्हें

सहिष्णु बताता आया

एकता का दर्शन

उन्होंने ही कराया

एक रहने की खातिर

वे करते रहते

गुना-भाग जोड़

पर थी एक मरोड़

उम्रभर

उसी को पाला-पोसा

उनका

उठा-उठाकर गोसा

चिलम भरे था पतरौल

उनसे ही सीखा मैने भूगोल  ।

-0-

3- आजकल

 

 

 

आजकल रातें 

लम्बी होने लगी हैं

दीये जल्दी 

सो जाते हैं  ।

 

चाँदनी खिली 

रहती है देर तक

जुगनू सारे 

वहाँ व्यस्त हो जाते हैं ।

 

सिरफिरे अँधेरे 

आवाज़ देते रहते हैं 

जब तक तारे 

बुझ नहीं जाते हैं  ।

-0-

Sunday, September 26, 2021

1136- जब मैं तुम्हारी उँगली थामूँ

 जब मैं तुम्हारी उँगली थामूँ

         सुशीला शील राणा

 


जीवन सागर में

कभी थिर पानी

तो कभी 

भयंकर झंझावातों में

तुम्हें रखा बचाए

सदा छाती से लगाए

कि नहीं झुलसाए तुम्हें

ज़रा भी तपती धूप

जलती लू की आँच 

 

जब कभी

विपदाओं के तूफ़ानों में

डगमगाई परिवार की नैया

भींच लिया है तुम्हें

मेरी मज़बूत बाँहों ने

अपने सुरक्षा घेरे में

 

जीवन सागर के 

अनंत विस्तार में

जब भी रखे हैं तुमने

बाहर अपने कदम

मेरी निगाहों के 

सी सी टी वी कैमरे

करते रहे हैं तुम्हारा पीछा

कि कोई वहशी नज़र

कर न ले तुम्हारा शिकार

 

 

मुझे

ख़ुद से ज्यादा

रही है तुम्हारी फ़िक्र

ज़िंदगी भर

 

 

जीवन सागर के

तट पर पहुँचते-पहुँचते

कई बार गिरी-उठी

टूटी-जुड़ी

लहूलुहान हुई

थक के चूर हुई

 

 

जीवन की

गोधूलि बेला में

लड़खड़ाते भरोसे 

डगमगाते कदमों के साथ

जब मैं तुम्हारी उँगली थामूँ

तो मेरी आत्मजा

तुम हो जाना 'मैं'

थाम लेना मेरा हाथ

बुढ़ापे को दे देना

जवानी का सहारा

 

लौट जाऊँगी मैं

तुम्हारे बचपन में

तुम-सी होकर

तुम हो जाना मुझ-सी

और इस तरह

लौट आएँगे फिर

हम दोनों की ज़िंदगियों के

सबसे ख़ूबसूरत दिन

Saturday, September 25, 2021

1135-कविताएँ

1-नंदा पाण्डेय

1-महामिलन

 


आज फिर नदी

अपने अस्तित्व को

विलीन करने की

सोच रही है

वह चल पड़ी फिर

समुद्र की ओर

समुद्र लंबे समय से

नदी की प्रतीक्षा में था

और तड़प रहा था

इस मिलन के लिए

 

बिना इस मिलन के

वह क्षीण हो रहा था

सोच में था समुद्र कि

क्या उसका विशाल अस्तित्व

यूँ ही समाप्त हो जाएगा

विरह की ज्वाला में

उसने दोनों बाहों को

फैलाकर दिया

आमंत्रण मिलन-भाव से

 

नदी भी तो

इसी मिलन के लिए

निकली थी

पर्वत- शिखर से

उसने अपना

अंतिम समर्पण

समुद्र की बाहों में कर दिया

दोनों कुछ देर

साथ रहे

फिर एक ही जल हो

बह चले

यही तो 'महामिलन' था

उन दोनों का

-0-

2-नदी

 

बड़ी सहजता से

एक अटूट विश्वास

के साथ

सारे बंधन को उतारकर

सौंपकर अपना

सब कुछ...

 

अपनी नियति

अपना द्वंद्व

अपनी आशा

अपनी निराशा

अपनी व्यथा

अपना मान

अपना अभिमान

अपना भविष्य

और अपना वर्तमान

 

भागते हुए

आ लिपटती थी

जैसे वर्षों के बिछड़े

अपनी सुध-बुध भूल

एक दूसरे में समा जाने को

हो गए हों आतुर

उनके इस आंतरिक और हार्दिक

मिलन पर तो जैसे

प्रकृति भी मुग्ध

हो जाती थी

उसकी सुगंध से

मिलता था उसको

एक पार्थिव आनंद

होता था अहसास

खुद के जिंदा होने का

 

कहीं दूर बह जाने से

कुछ नया ज़रूर मिलता,

पर जीवन का अर्थ और

भीतरी तलाश की तुष्टि

जहाँ निर्वाक् होकर

जीना चाहती थी

अपनी उदासी के

हर क्षण को,

शायद यह किनारा ही था

वैसे मिट्टी की खुशबू

आज भी पसंद है उसको!

-0-

3-कुछ कहना चाहती थी

 

कुछ कहना चाहती थी वो

पर न जाने क्यों

'कुछ' कहने की कोशिश में

'बहुत-कुछ' छूट जाता था, उसका

 

हर रोज करीने से सजाने बैठती

उन यादों से भरी टोकरी को

जिसमें भरे पड़े थे

उसके बीते लम्हों के

कुछ रंग-बिरंगे अहसास,

कुछ यादें,कुछ वादे

और भी बहुत कुछ...

 

गूँथने बैठ जाती वो

उन लम्हों को

जिसे उन दोनों ने

जीभरके जिया था...

वो जानती है अब

इसका कोई मतलब नहीं

फिर भी गुज़रती है

हर दिन उन लम्हों के

बिल्कुल पास से...

इस उम्मीद में कि शायद कोई

नन्हा सब्ज निकलेगा फिर से

पर सूखे दरख़्त भी कभी हरे हुए हैं भला

 

यादों की मियाद भी तय होती है शायद

ये वो जानती है

यादें कुछ भी नहीं बस बेमतलब का

शृंगार ही तो है मन का

जब जी चाहे कर लो

जब जी चाहे उतार दो

 

पर!

कैसे कह दे कि

कोई रिश्ता नहीं है उससे

जिस अपनेपन

और भावना की डोर को पकड़कर

उसकी गहराई से बेखबर

सारी दूरियों को

पार कर लेना चाहती थी

जानती थी

डूबना वर्जित है

इसलिए न डूब सकी,

न बच पाई

 

आज अपने शब्दहीन एकांत में

रोक लेना चाहती है

उन्हीं लम्हों को

पूछती है-

मन में हलचल करती

उन जलतरंगों से कि

क्यों दोहराती है

बार-बार उसका नाम

क्यों बंद आँखों से करती है

प्रार्थना उसकी सलामती के लिए

 

क्या...?

लौटेगा वो फिर से उसकी ज़िदगी में

प्रार्थनाओं में कबूल हो गई

मिन्नत की तरह

पूछती है अपनी ही आत्मा से

बार-बार...हर बार...!

-0-

Wednesday, September 22, 2021

1133

 1-डॉ. सुरंगमा यादव
ख़्वाब अब कोई मचलता क्यों नहीं
मुश्किलों का हल निकलता क्यों नहीं
कोशिशों की रोशनी तो है मगर
ये अँधेरा फिर भी ढलता क्यों नहीं
मन की गलियों में बिखेरे खुशबुएँ
फूल ऐसा कोई खिलता क्यों नहीं
ठोंकता है जो अमीरी को सलाम
मुफ़लिसी पर वो पिघलता क्यों नहीं
बात बन जाए तो वाह-वाह हर  तरफ
सर कोई लेता विफलता क्यों नहीं
उम्र ढलती जा रही है हर घड़ी
ख्वाहिशों का जोर ढलता क्यों नहीं।
-0-
2-तुम्हारे जाने के बाद
अंजू खरबंदा
 
प्यार क्या होता है
तुम्हारे जाने के बाद जाना !
जब तक तुम थीं
मैंने तुम्हें कहाँ पहचाना!
सुबह से शाम तक
रसोई और संयुक्त परिवार की
जिम्मेदारियों के बीच
उलझी तुम !
बच्चों की परवरिश
सास -ससुर की सेवा- टहल
आए- गए की आवभगत
दिन भर की भाग दौड़
और रात होते- होते
टूटी- बिखरी -सी तुम !
किसी शादी ब्याह के अवसर पर ही
तुम्हें अवसर मिलता सजने संवरने का
उस दिन
कितना खिला होता रूप तुम्हारा!
तुम्हारी ओर तकती मेरी नज़रों को देख
तुम मुस्कुराकर मेरी ओर देखती
और मैं अचकचाकर नज़र घुमा लेता!
काश!
कह दिया होता तुम्हें निःसंकोच -
आज तुम परी- सी लग रही हो
खिल रहा है ये रंग तुम पर!
तुम्हारा गजरा महक- महककर
मुझे खींचता अपनी ओर
और मैं पति होने का दंभ भरता
तुम्हें देखकर भी अनदेखा कर देता
तुम्हारे गालों पर ढुलके आँसू भी
कोई मायने न रखते मेरे लिए!
अब
तुम्हारे जाने के बाद
बन्द सन्दूक में क़ैद
तुम्हारी रेशमी साड़ी
खोल कर देखता हूँ अक्सर
दिखता है तुम्हारा अक्स इसमें !
तुम्हारी कुछ बिन्दियाँ भी
सँभाल रखी हैं
और मुरझाए गजरों के कुछ फूल भी!
तुम्हारे जाने के बाद जाना
प्यार... क्या होता है!
तुम्हारे जाने के बाद जाना
कि मैं तुमसे कितना प्यार करता था
तुम्हारे जाने के बाद जाना
कि जीते जी तुम्हारी कद्र न करके
मैं अपने लिये काँटे बो रहा हूँ
तुम्हारे जाने के बाद जाना
कि तुम्हारे बिना जीना
कितना मुश्किल है मेरे लिए!
-0-
3-बीज कौन-सा रोपा था?
रश्मि विभा त्रिपाठी
 
प्रीति ही न अँखुआई
रिश्ते होते गए
बोनसाई
न खुश्बू गुलाब-सी
न पीपल—सी
जड़ जमाई
आओ!
फिर से
मन-माटी में
प्रिय हम नेह बोएँ
मिल कर इसे सँजोएँ
बचाएँ स्वार्थ की धूप से
यह प्यारा पौधा
अपना रंग-रूप न खोए
खुद में समोए
वट-वृक्ष—सा आकार
सदाबहार
सुख-साफल्य सार
हरसिंगार
होंगे
शुचि भाव से बाँधे
वे मान-मनौती-धागे
हर अनिष्ट को टाल,
जो हमें रहेंगे सर्वदा साधे!
-0-
4- निधि भार्गव मानवी
बनूँ  तितली  बनूँ बदली हवा सँग उड़ती जाऊँ  मैं
जलाकर  दीप  राहों  में  शमा  सी  जगमगाऊँ  मैं
हराएँगी  भला  कैसे  ग़मों  की  आँधियाँ   मुझको
भरा  है  हौसलों  में  दम  कभी  न  डगमगाऊँ   मैं
-0-


Friday, September 17, 2021

1132

 

1-अश्रु -भीकम सिंह 

 


नैनों में घिरे

घटा-से 

कभी 

पलकों से झरें ।

उर से 

उलझे हैं 

अभी 

क्या करें, क्या ना करें  ।

अधरों 

तक आ जाते हैं 

ये अश्रु 

और कहाँ मरें ।

-0-

2-घनाक्षरी छंद

- निधि भार्गव मानवी


 नैनन बसाय तोहे, रख लूँ आ बालमा  मैं,


हँसता  गाता  खेलता
, प्रीत का संसार  दूँ

माँग में सजा के प्रीत, लिख डालूँ नयी रीत

मन  भावनी  ऋतु  से, जीवन  सँवार  दूँ

अँखियों को चार कर, नेह की मिठास भर

सारे   सुख   जगत  के, प्रियतम  वार   दूँ

चंदा मैं  चकोर तुम, आशाओं की भोर  तुम

अपनी  कोमल  बाँहों  का आ तोहे हार  दूँ

                               -0-