पथ के साथी
Wednesday, May 13, 2015
Sunday, May 10, 2015
पानी तो बहता है
1
पानी तो बहता है ,
उसका अपना है अधिकार
बिना जल के मछली तड़पे ।
माँ का दिन
केवल एक दिन ,
जो बुनती है अपने बच्चों के सपने ।
क्या है यह माँ?
ईश्वर का अवतार,
प्यार का सिन्धु ,
वात्सल्य की प्रतिमा ,
अमृत की सरिता ,
अवतारों का अवतार ।
इंसानियत की कसौटी ,
धरा पर एक अनमोल रत्न ।
आँखों में अश्रु भरे
अपनी पीड़ा को छुपाए ,
रक्षा कवच पहने एक सिंहिनी ।
केवल पश्चिम में
उसके लिए एक एक दिन ,
जबकि उसका का हर पल
अपनी औलाद के सुख के लिए।
इतनी कंजूसी उस माँ के लिए ,
जिसका जीवन उसका परिवार ।
कैसे बदले यह नयी सोच ,
नया विचार ,
धिक्कार –धिक्कार !!
2
जीवन की व्यथा
बन गयी एक कथा
संघर्षों का बोझ
अब कैसे उठा पाऊँ?
3
मार्ग अनेकों
कोई दुर्गम , कोई पथरीला
क्लांत पथिक
कौन उसे सीधी राह दिखाए ।
4
मित्र मिले बचपन में
एक साथ पढ़े और खेले,
बड़े हुए तो बिछुड़ गए
अब कैसे उनसे मिल पाएँ।
5
आयी वसंत ऋतु
विटप, तडाग, लतिकाएँ
कोयलिया आम्र-फुनगी पर बैठी
गीत सुनाए ।
6
प्रीतम गये परदेस
भूलि गए मोको ,
बदरवा गर्जत
उनकी बहुतै याद सताए ।
पानी और मछली का प्यार
कैसा है एकतरफा वलिदान,
पानी को नहीं होता कोई गम ,
चाहे कभी भी मछली तोड़ दे दम।
Saturday, May 9, 2015
मान-सम्मान
अनिता ललित को उनकी 2014 में प्रकाशित काव्य-कृति 'बूँद-बूँद लम्हें' पर लोपामुद्रा सम्मान प्रदान किया
गया । सभी साथियों की ओर से आपको हार्दिक बधाई !
Thursday, May 7, 2015
अनोखा ऐसा रिश्ता
अनोखा ऐसा रिश्ता
डॉ०भावना
कुँअर
![]() |
| छाया:ऐश्वर्या कुँअर |
हर सुबह
ये लॉरीकीट जोड़ा
आवाज़ देता
मैं दौड़ी-दौड़ी जाती।
क्या-क्या कहता
समझ नहीं आता।
वह मेरे यूँ
चक्कर जो लगाता
मैं झट जाती
हाथों में दाने भर
यूँ ही आ जाती।
पलक झपकते
हाथों पे आ बैठते,
मुझे देखते
हौले-हौले चुगते,
न तो डरते
न ही मुझे डराते।
कैसा ये रिश्ता!
अटूट औ स्नेहिल।
सब अलग-
भाषा,जाति,रूप औ
रंग, फिर भी
समझते हैं हम
एक दूजे की,
सभी भावनाओं को
जरूरतों को,
ये कितना गहरा
सूझ-बूझ औ
प्यार से लबालब
अनोखा रिश्ता!
भाषा,जाति औ रूप
एक है होता
फिर भी जाने क्यों न
मिलता ऐसा
इंसानों के बीच ये
अनोखा प्यारा रिश्ता।
ये लॉरीकीट जोड़ा
आवाज़ देता
मैं दौड़ी-दौड़ी जाती।
क्या-क्या कहता
समझ नहीं आता।
वह मेरे यूँ
चक्कर जो लगाता
मैं झट जाती
हाथों में दाने भर
यूँ ही आ जाती।
पलक झपकते
हाथों पे आ बैठते,
मुझे देखते
हौले-हौले चुगते,
न तो डरते
न ही मुझे डराते।
कैसा ये रिश्ता!
अटूट औ स्नेहिल।
सब अलग-
भाषा,जाति,रूप औ
रंग, फिर भी
समझते हैं हम
एक दूजे की,
सभी भावनाओं को
जरूरतों को,
ये कितना गहरा
सूझ-बूझ औ
प्यार से लबालब
अनोखा रिश्ता!
भाषा,जाति औ रूप
एक है होता
फिर भी जाने क्यों न
मिलता ऐसा
इंसानों के बीच ये
अनोखा प्यारा रिश्ता।
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