पथ के साथी

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Monday, September 10, 2018

845-आयोजन -1


 8 सितम्बर 2018 को  1:30- 4:30 अपराहन में हिन्दी प्रचारिणी सभा  और हिन्दी चेतना की और से एक
 संगोष्ठी  का आयोजन मार्खम नगर की  मिलिक्न्स मिल्स लाइब्रेरी में  किया गया । इस अवसर पर मार्खम क्षेत्र
के सांसद  श्री बॉब सरोया जी द्वारा चार पुस्तकों और दो पत्रिकाओं के विशेषांकों का विमोचन भी किया गया । ये पुस्तकें थीं-लघुकथा का वर्त्तमान परिदृश्य (हिमांशु ),जरा रोशनी मैं लाऊँ ( डॉ.भावना कुँअर ) ,
घुँघरी (डॉ. कविता भट्ट ), तुम सर्दी की धूप ( हिमांशु ), और पत्रिकाएँ - हिन्दी चेतना ( यशपाल विशेषांक मुख्य सम्पादक

श्याम त्रिपाठी  और सहयोगी सम्पादक-डॉ.भावना कुँअर ,डॉ.ज्योत्स्ना  शर्मा व डॉ.कविता भट्ट   ) , सरस्वती सुमन -क्षणिका विशेषांक ( मुख्य सम्पादक डॉ. आनन्दसुमन सिंह , अतिथि सम्पादक हरकीरत हीर व हिमांशु )।
चारों पुस्तकों को सभा ने भवन में  पोस्टर के रूप  में प्रदर्शित भी किया था । इस   कार्यक्रम  के आयोजन पर
 ओंटेरियो  प्रांत के प्रमुख मंत्री ( मुख्य मंत्री ) आदरणीय डग फोर्ड  और वयोवृद्ध  राजनेता  आदरणीय रेमण्ड चो के शुभकामना संदेश भी पढ़े गए ।

             सर्व प्रथम श्री  श्याम त्रिपाठी जी ने   चारों पुस्तकों  पर अपने विचार प्रस्तुत किए । तत्पश्चात् कृष्णा वर्मा
जी ने चारों पुस्तकों पर अपनी गंभीर  विवेचना  प्रस्तुत की , जिसे यथाशीघ्र  यहाँ  दिया जाएगा । इसके बाद  हाइकु पर विशेष चर्चा के अंतर्गत  मैंने   विविध पक्षों पर विस्तार से बताया गया । अंतःप्रकृति हो या बाह्य प्रकृति ,उसे हाइकु में बाँधना श्रमसाध्य नहीं, बल्कि भावसाध्य है। सूक्ष्म अति सूक्ष्म भाव को यदि  तदनुरूप भाषा में बाँधना है , तो यह तभी सम्भव है   ,जब हाइकुकार के पास  रचनात्मक तन्मयता हो   विषय को सरल और व्यावहारिक बनाने के लिए कुछ उदाहरण भी दी गए । सम्मान  और काव्य-पाठ  के साथ  कार्यक्रम सम्पन्न  हुआ ।
1-डॉ.सुधा गुप्ता
 1-काठ के घोड़े, / चलता तन कर /माटी-सवार ।-
2- चाँदी की नाव / सोने के डाँड लगे / रेत में धँसी ।-3- चिनार पत्ते / कहाँ पाई ये आग/ बता तो भला।-  4-दु:ख ने माँजा / आँसुओं ने धो डाला  / मन उजला।-5-काजल आँज / नभ-शिशु की आँखों /हँसी बीजुरी
-०-
-2-रामेश्वर काम्बोज –
1-सिन्धु हो तुम / मैं तेरी ही तरंग, / जाऊँगी कहाँ ?-2- लिपटी लता / लाख आएँ आँधियाँ /तरु के संग।    3--घना अँधेरा / सिर्फ़ एक रौशनी / नाम तुम्हारा।
3- डॉ.कुँवर दिनेश
1-नदी में बाढ़ / नेता-अधिकारी की /मैत्री प्रगाढ़। 2-प्रात: मंदिर / तनाव दिन भर/सायं मन्दिर
4-डॉ.भावना कुँअर
1- फूल -गगरी /टूटकर बिखरी /गन्ध छितरी। 2-घाटियाँ बोलीं-/वादियों में किसने /मिसरी घोली?
3-चिड़िया रानी / खोज़ती फिरती है /दो बूँद पानी।
5-डॉ.ज्योत्स्ना शर्मा
1-काटें न वृक्ष / व्याकुल नदी-नद / धरा कम्पिता । 2-पीर नदी की- / कैसे प्यास बुझाऊँ   /तप्त सदी की  !
6-डॉ.कविता भट्ट
1-किसको कोसें ?/हर शिला के नीचे / भुजंग बसे ।-2-डाकिया आँखें / मन के खत भेजें / प्रिय न पढ़े।
4-मैं ही बाँचूँगी / पीर-अक्षर पिय, /  जो तेरे हिय।

Sunday, May 13, 2018

821

मातृदिवस पर हार्दिक शुभकामनाओं के साथ दो रचनाएँ - 


      1
 माँ की खुशबू 

-डॉ. भावना कुँअर

आज एक अजीब -सी बेचैनी थी मन में...
जाने  क्यों  बार-बार
आज भटक रहा था मन
रह-रहकर माँ  क्यों  याद रही थी...
पिछले बरस ही तो आई थी  मेरे पास
दिनभर जाने क्या-क्या करती...
कभी खाली ही नहीं रहती...
जब मैं ऑफिस से आती
खुल जाता हमारी यादों का पिटारा...
और रात ढले हौले-हौले बन्द होता
घर का हर कोना महकता रहता...
माँ की खुशबू से
बॉलकनी में जाते वक्त माँ का हाथ हिलाना...
आने से पहले यूँ खड़े-खड़े इन्तज़ार करना...
आज मन दुखी है,माँ को याद करता है...
मैं बैठी हूँ सात संमदर पार
ढूँढती हूँ उस खुशबू को...
जो दब गई है कहीं धूल में
झाड़ती हूँ धूल
और रख लेती हूँ खुशबू को सहेजकर
रसोई में खोजती हूँ कुछ डिब्बों में...
खुशी से बाछें खिल जाती हैं...
माँ के हाथों से बने कचरी और पापड़ पाकर
चूल्हे पर जल्दी-जल्दी भूनती हूँ
तभी दिख जाती है माँ की पसन्द की चाय...
उन्हीं की तरह बनाती हूँ छोटे से भगोने में
खूब पका-पका कर
अब बैठ जाती हूँ, चाय की चुस्की लेती हूँ
कचरी पाप खाती हूँ
पर जाने  क्यों  होठों तक आते ही...
सील जाती है कचरी
और नमक भी जाने  क्यों  तेज -सा लगता है
कुछ सीली-सीली, कुछ गीली-गीली कचरी...
चाय की चुस्की या फिर दबी-दबी सिसकी...
सूनी बॉलकनी, सूना घर...
रसोई में बसी माँ के खाने की खुशबू आज भी है...
और आज भी है इन्तजार...
अलगनी पर टगें कपड़ों को...
तहाने का
आज भी शीशे पर चिपकी बिन्दी को...
है इन्तज़ार उन हाथों का
मेरी  नन्ही  चिरैया को है इन्तज़ार...
उन मीठी-मीठी बातों का
मैं सब यादों को समेटकर...
माँ से मिलने के दिन
लग जाती हूँ उँगलियों पर गिनने...
     2
     माँ
-शशि पाधा

जीवन की क्यारी में महकी 
मन चन्दन सुवास सी 
माँ ही देहरी माँ ही मंदिर 
माँ निष्ठा विश्वास सी|

माँ ही छाया, माँ ही माया 
माँ माथे की रेख में 
माँ ही गंगा, माँ ही काशी 
माँ वेदों के लेख में 
रोम रोम में सिरहन जैसी
बसती देह में श्वास सी|

सब प्रश्नों के उत्तर तुझ में 
सब उलझन की सुलझन तू 
संस्कारों की तू ही गठरी 
तू ही चिन्तन, मंथन तू 

माँ संझा की शीत चाँदनी 
ऊषा के उजास सी|

ज्ञान कोष का पहला अक्षर
सुर लहरी की तान तू   
घी मिश्री की चूरी तू ही
मेरी तो पहचान तू 
तू अँखियों की नील–झील में 
तू अधरों के हास सी |

तू तो हर पल संग ही रहती 
फिर क्यूँ तुमको याद करूँ 
मन दर्पण से तू ही झाँके
व्यर्थ ही विवाद करूँ 
    
तेरे जैसी लोग कहें पर  
मैं तेरा आभास सी

शशि पाधा