पथ के साथी

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Saturday, July 29, 2023

1350-दो कविताएँ

 

1-ठूँठ !

- सुशीला शील राणा

 

तुम अकेले होकर भी

अकेले कहाँ हो ठूँठ

कितने ही लघु जीवों का

आश्रय हो 

जो श्रम से निढाल

तुमसे लिपट

मिटाते हैं 

दिन भर की थकान

तुम्हारे कोटर में

पाते हैं कुटीर का सुख

 

फिर एक उजली भोर

मीठी- सी थपकी देकर

जगाती है तुम्हें

तुममें बसते जीवन को

ठीक उसी तरह

जैसे बचपन में

जगाती है माँ

प्यार से माथे को चूम

 

सूर्य पितामह

बिना किसी भेदभाव 

देते हैं रोज़ धूप-रौशनी

चंदा मामा बाँटते हैं शीतल चाँदनी

जिसकी मखमली छुअन 

हरती है तुम्हारा ताप-सन्ताप

ठूँठ!

तुम अकेले कहाँ ?

  

तुम्हारी सूखी टहनियाँ, छाल 

बन जाती हैं ईंधन

जिसमें पकी रोटियाँ

बचाए रखती हैं

कई ज़िंदगियाँ

ठिठुरते पाले में

ठिठुरती झोंपड़ियों में

तुम्हारे बीन हुए

पत्ते, तिनके

बचा लेते हैं शीत में 

बर्फ़ होते अनमोल जीवन

 तुम्हारा त्याग अनमोल है ठूँठ

विरल है

मिटने से पहले

किसी फूस की छत की 

बल्ली बन

देते हो पिता- सा मज़बूत आधार

बचाते हो कड़ी धूप, लू से

अति वर्षा की मार से

सहते हो मूक

मौसमों की मार

बरसों बरस

 

अंत में

जब जलाए जाएँगे

तुम्हारे अवशेष

किसी अलाव, चूल्हे या तंदूर में

तो भोजन के साथ

बाँटेगा तुम्हारा स्नेह

ढेर सी आशीषें

जो निश्चित ही फलेंगी

और फलोगे तुम

उस स्नेह में

उन आशीषों में

 

तुम अकेले कहाँ

कितनी ही यादें हैं तुम्हारे साथ

कितनी ही यादों में हो तुम

कितनी ही ज़िंदगियों में

कितनी ही तरह से

अब भी विचरते हो

तुम सुखदायी, फलदायी

हे आश्रयदाता

कितनी ही दुआओं में हो तुम

तुम अकेले हो ही ठूँठ

तुम अकेले हो ही नहीं सकते

 -0-rdevsheel@gmail.com

 

-0-

2-जिंदगी/   आशमा कौल

  हर अगला पल

अनिश्चित है

इस मासूम जिंदगी का

इस पल को जी लो 

जैसे जीती है

ओस की बूँद

हर दिन को खिलाओ

जैसे खिलता है सूरजमुखी;

क्योंकि हर अगला पल

अनिश्चित है

इस मासूम जिंदगी का।

 

घबराना नहीं है

इस अनिश्चितता से

लौटकर आना है

जीवन की रणभूमि पर

बार-बार 

शूरवीरों की तरह

कार्यरत रहना है हर पल

माँ की तपस्या-सा;

क्योंकि हर अगला पल

अनिश्चितता है

इस मासूम जिंदगी की

 

हमें तो जीना है

आज जी भरके

सपनों के इन्द्रधनुष

रचने हैं गगन में

उम्मीदों के फूल

खिलाने हैं चमन में

हर पल को

पहुँचाना है अंजाम तक;

 

क्योंकि हर अगला पल

अनिश्चित है

इस मासूम जिंदगी का

 

इस पल को सजाना है

दुल्हन की तरह

आज को छिपाना है

पलकों की ओट में

मुट्ठी में कैद कर लो

जब तक कर सको इसे

चूम लो इसके लब 

जब यह मंजिल की शक्ल ले;

क्योंकि हर अगला पल

अनिश्चित है

इस मासूम जिंदगी का ।

          -0-(फरीदाबाद )

          9868109905

Saturday, May 7, 2022

1205-माँ की उँगलियाँ

आशमा कौल

 


इस उम्र में भी माँ

फेरती है बालों में

जब प्यार से उँगलियाँ

अचानक बरसों पुरानी

नींद लौट आती है

 

                 इन बरकती उँगलियों की

                 थिरकन से बनी रोटियाँ

                 जैसे जन्मों की भूख

                 मिट जाती है

 

न जाने इन उँगलियों में कैसा

अजब सा जादू है

यह ढलती उम्र को

बचपन बनाती हैं

 

 

                 पुरानी यादों के

                 झरोखे से

                 जादूगरी यह उँगलियाँ

                 सपनों में

                 परियाँ दिखाती है

 

बिखरे-उलझे जीवन से

संजीदगी दर-किनार कर

रोना सिखाती है

हमें हँसना सिखाती है

                 इन फनकार उँगलियों की

                  मधुर थाप

                 थकन रस्‍ते की दूर कर

                 मंजिल पर लाती है

 और चूम कर चेहरा हमारा

ले हथेलियों में

माँ हमें

दुनिया दिखाती है

 

इन उँगलियों पर

गिनकर जीवन का गणित

माँ हमें हर हाल में

जीवन का हल बताती है

                 गहन सोच की वीरानियों में

                 गुम होते हैं जब हम

                 यह उँगलियाँ प्यार से

                 कितना रिझाती है

 पोंछकर संदेह की गर्द

जिंदगी के आइने से

माँ की उँगलियाँ हमें

सबका असली चेहरा

दिखाती है

                 यह खुदगर्ज दुनिया

                 बिछाती है हमारे सामने

                 जब मुश्‍किलों की बिसात

                                    तब माँ, हर चक्रव्‍यूह को

भेदना सिखाती है।

-0-

कृषि मंत्रालय , भारत सरकार की सेवा निवृत्त अधिकारी