दस दिनों में बप्पा का डिजिटल कायाकल्प / —जैस्मिन जोविअल
कहते हैं, भगवान जब आते हैं तो अपने साथ खुशियाँ लेकर आते
हैं।
लेकिन आजकल भगवान भी
शायद सोचते होंगे— ‘‘भाई, किस ज़माने में आ गए!’’
गणपति बप्पा के ये दस
दिन वैसे भी बड़े निराले होते हैं। घर में रौनक, गली में चहल-पहल, ढोल की आवाज़, आरती की गूँज, फूलों की ख़ुशबू और हर तरफ़ एक ही नाम— ‘‘गणपति बप्पा मोरया! ’’
मेरी एक सहेली हर साल
बड़े प्यार से गणपति बप्पा को अपने घर लाती है और मुझे भी बुलाती है; लेकिन पता नहीं क्यों, हर साल मेरा और बप्पा का मिलन किसी न किसी काम
के कारण टलता रहा। कभी स्कूल, कभी काम, कभी कोई और ज़िम्मेदारी; लेकिन इस बार आखिरकार मौका मिल ही गया।
मैं पहुँची, तो लगा जैसे घर नहीं, भक्ति का पूरा स्टूडियो सजा हुआ है।
बप्पा की मूर्ति इतनी
सुंदर सजी थी कि कुछ पल के लिए मन सचमुच शांत हो गया। फूल, रोशनी, सजावट, अगरबत्ती की ख़ुशबू और सामने विराजमान बप्पा।
मैंने सोचा—चलो, आज थोड़ी देर दुनिया की भागदौड़ से छुट्टी। न
मोबाइल, न काम, न कोई टेंशन... बस बप्पा।
बप्पा को निहारते-निहारते कब आँख लग गई, पता ही नहीं चला।
और फिर जो देखा...
मैं किसी दूसरी ही दुनिया
में पहुँच गई। आँख खुली तो सामने का दृश्य देखकर मैं कुछ पल के लिए समझ ही नहीं
पाई कि सपना देख रही हूँ या कलियुग का कोई नया अपडेट इंस्टॉल हो चुका है!
सामने गणपति बप्पा
विराजमान थे...; लेकिन भक्तों की ओर नहीं। आईपैड
की ओर! बप्पा बड़े ध्यान से आइपैड में कुछ कर रहे थे।
मैंने इधर-उधर देखा- लोग परेशान!
कोई फूल लेकर बप्पा को
ढूँढ रहा था, कोई आरती की थाली लेकर
इधर-उधर घूम रहा था।
एक भक्त दूसरे से पूछ
रहा था— ‘‘अरे भाई, बप्पा कहाँ गए?’’
दूसरा बोला— ‘‘यहीं तो बैठे थे!’’
तीसरा बोला— ‘‘मूर्ति तो यहीं है... लेकिन बप्पा दिखाई नहीं दे
रहे!’’
उधर घंटियाँ बज रही
थीं।
इधर लोग बप्पा को
आवाज़ लगा रहे थे।
काफी देर बीत गई।
मनुष्य बेचारे परेशान
होकर रूठने लगे— ‘‘हम इतनी देर से पूजा
कर रहे हैं और बप्पा दर्शन ही नहीं दे रहे!’’
लेकिन हमारे बप्पा? पूरी तन्मयता से आइपैड में व्यस्त!
उनका वाहन, हमारा प्यारा मूषक, बेचारा घबराकर इधर-उधर दौड़ रहा था।
आखिर उसने हिम्मत करके
पूछा— ‘‘भगवान!’’
बप्पा ने कोई जवाब
नहीं दिया।
मूषक ने फिर कहा— ‘‘बप्पा!’’
फिर भी कोई जवाब नहीं।
आखिर उसने आइपैड के
सामने अपना छोटा-सा मुँह लाकर कहा— ‘‘भगवान! मनुष्य आपको हर जगह ढूँढ़ रहे हैं और आप
यहाँ आइपैड पर बैठे हैं। सब ठीक तो है?’’
बप्पा ने बिना नज़र
उठाए कहा— ‘‘हाँ, मूषक जी, सब ठीक है।’’
‘‘तो फिर ये आइपैड पर क्या चल रहा है?’’
बप्पा बोले— ‘‘एआई का कमाल है। मैं भी सीख रहा हूँ।’’
मूषक की आँखें गोल- ‘‘एआई?’’
‘‘हाँ! आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस!’’
‘‘लेकिन भगवान... आपको इसकी क्या ज़रूरत?’’
बप्पा बोले— ‘‘बहुत ज़रूरत है। देख नहीं रहे? आजकल मनुष्य बिना एआई के एक शुभकामना संदेश तक
नहीं लिखते। तो मैंने सोचा, मैं क्यों पीछे रहूँ?’’
मूषक चुप।
बप्पा ने गर्व से
आइपैड उसकी ओर घुमाया— ‘‘देखो, मैंने अपनी फोटो एडिट की है।’’
मूषक ने फोटो देखी- ‘‘ये क्या कर दिया आपने?’’
बप्पा बोले— ‘‘थोड़ा ग्लो बढ़ाया है, कानों को थोड़ा शार्प किया है, बैकग्राउंड में हिमालय लगाया है और माथे पर
हल्का-सा सिनेमैटिक इफ़ेक्ट दिया है।’’
मूषक ने माथा पकड़
लिया, ‘‘भगवान! आप तो पहले ही सुंदर थे!’’
बप्पा बोले— ‘‘मूषक जी, ज़माना बदल गया है। आजकल सुंदर होना काफ़ी नहीं
है, सुंदर दिखना भी पड़ता
है... और वह भी फ़िल्टर के साथ!’’
मूषक ने बप्पा के
चरणों को चूमा और बोला— ‘‘भगवान, चलिए अब! सब घंटियाँ बजा-बजाकर आपको बुला रहे हैं।’’
बप्पा ने आइपैड नीचे
रखा और बोले— ‘‘मनुष्य भी कमाल के
हैं!’’
‘‘क्यों भगवान?’’
‘‘अरे, मुझसे शिकायत करते हैं कि मैं ध्यान नहीं देता। ख़ुद मंदिर
में आते हैं, पूजा शुरू करते हैं...’’
‘‘फिर?’’
‘‘फिर आरती के बीच फ़ोन बजता है।’’
‘‘हाँ...’’
‘‘पहले जेब टटोलते हैं।’’
‘‘फिर?’’
‘‘फिर स्क्रीन देखते हैं।’’
‘‘फिर?’’
‘‘फिर कहते हैं—बस एक मिनट।’’
बप्पा मुस्कुराए।
‘‘और वह एक मिनट कब आधा
घंटा हो जाता है, उन्हें ख़ुद पता नहीं
चलता।’’
मूषक ने धीरे से कहा— ‘‘बात तो सही है।’’
बप्पा बोले— ‘‘मंदिर में आते हैं भगवान के दर्शन करने और फिर
भगवान से ज़्यादा ध्यान इस बात पर रहता है कि आज मेरी फोटो किस एंगल से अच्छी
आएगी।’’
मूषक ने सिर हिलाया।
बप्पा बोले— ‘‘कोई मेरी आरती की वीडियो बनाता है।’’
‘‘कोई फूल चढ़ाते हुए रील बनाता है।’’
‘‘कोई मोदक का बूमरैंग बनाता है।’’
‘‘और कुछ तो ऐसे हैं जो मुझे देखकर भी पहले कैमरा
देखते हैं!’’
मूषक हँस पड़ा, ‘‘तो भगवान, आप बदला ले रहे हैं?’’
बप्पा ने तुरंत गंभीर
चेहरा बनाया— ‘‘नहीं-नहीं... बदला नहीं ले रहा।’’
एक पल रुके। फिर बोले—
‘‘बस एआई का लेवल समझ रहा हूँ!’’
मैं यह सब सुन ही रही
थी कि तभी एक भक्त दौड़ता हुआ आया— ‘‘बप्पा! आप यहाँ हैं! हम आपको कब से ढूँढ रहे
हैं!’’
बप्पा ने आइपैड बंद
किया, ‘‘क्या हुआ?’’
भक्त बोला— ‘‘आपकी आरती होनी है।’’
बप्पा बोले— ‘‘अच्छा! आरती भी होनी है?’’
‘‘जी।’’
‘‘तो पहले एक काम करो।’’
‘‘क्या?’’
‘‘मेरा नया पोस्ट डाल दो।’’
भक्त अवाक्।
‘‘कौन-सा पोस्ट?’’
बप्पा बोले— ‘‘'दस दिन हमारे साथ रहने के बाद असर कुछ ऐसा होता
है।'‘’
मूषक ने अपना सिर पकड़
लिया और मैं हँसते-हँसते जाग गई।
आँख खुली तो मैं फिर
उसी कमरे में थी।
गणपति बप्पा अपनी जगह
विराजमान थे।
आईपैड कहीं नहीं था।
मूषक भी शांत था।
आरती चल रही थी।
सब भक्त हाथ जोड़कर
खड़े थे।
मैंने बप्पा को देखा
और मन ही मन कहा— ‘‘बप्पा, सपना था या भविष्य की झलक?’’
क्योंकि सच कहूँ तो अब
ऐसा लगता है कि एआई से कोई बचा नहीं है।
हमने सोचा था एआई
हमारी नौकरी लेगा।
फिर पता चला एआई हमारी
तस्वीर बनाएगा।
फिर पता चला एआई हमारी
तस्वीर सुधारेगा।
फिर एआई हमारे लिए
कविता लिखेगा।
फिर भाषण लिखेगा।
फिर जन्मदिन की
शुभकामनाएँ लिखेगा।
अब तो डर यही है कि कल
को हम मंदिर जाएँ और पुजारी जी कहें— ‘‘आरती भी एआई से जनरेट करवा ली है, आप बस हाथ घुमाइए।’’
और भक्त पूछे— ‘‘पंडित जी, मंत्र?’’
‘‘वो भी एआई से।’’
‘‘प्रसाद?’’
‘‘उसका भी डिजिटल कूपन है।’’
बस एक दिन ऐसा न हो कि
बप्पा भी कह दें— ‘‘भक्तों, दर्शन के लिए क्यूआर कोड स्कैन कीजिए।’’
और हम सब लाइन में
खड़े होकर मोबाइल निकालें।
फिर कोई पीछे से बोले—
‘‘अरे भाई, नेटवर्क नहीं आ रहा!’’
और बप्पा अंदर से
मुस्कुराएँ— ‘‘अब समझे मेरा दर्द?’’
आखिर बप्पा भी तो दस
दिन हमारे साथ रहते हैं।
हमारी बातें सुनते
हैं।
हमारी आदतें देखते
हैं।
हमारी पूजा देखते हैं।
हमारा मोबाइल देखते
हैं।
हमारा सोशल मीडिया
देखते हैं।
और शायद सोचते होंगे— ‘‘ये मनुष्य मुझे प्रसाद चढ़ाने से पहले मेरी तस्वीर गूगल पर
क्यों खोज रहा है?’’
आज हम बप्पा से बुद्धि
माँगते हैं। सिद्धि माँगते हैं। समृद्धि माँगते हैं। शांति माँगते हैं।
लेकिन शायद बप्पा मन
ही मन कहते होंगे— ‘‘बेटा, पहले अपना स्क्रीन टाइम थोड़ा कम कर... बाक़ी सब मैं देख
लूँगा।’’
और सच तो यही है— गणपति
बप्पा हमारे घर दस दिन के लिए आते हैं।
हम उन्हें सजाते हैं, उनका स्वागत करते हैं, उनके सामने दीप जलाते हैं, मोदक चढ़ाते हैं; लेकिन इन दस दिनों में शायद बप्पा हमें भी
थोड़ा-सा देख रहे होते हैं।
देख रहे होते हैं कि
हम कितने बदल गए हैं।
पहले भगवान के सामने
आँखें बंद होती थीं... अब कैमरा ऑन होता है।
पहले मन से प्रार्थना
होती थी... अब कैप्शन तैयार होता है।
पहले आरती सुनी जाती
थी... अब रील बनती है।
पहले प्रसाद बाँटा
जाता था... अब स्टोरी लगती है।
और पहले बप्पा से कहते
थे— ‘‘अगले साल जल्दी आना।’’
अब शायद बप्पा भी
कहें— ‘‘मैं आ तो जाऊँगा बेटा... लेकिन इस बार अपना
आइपैड साथ लेकर आऊँगा। आख़िर मुझे भी तो ज़माने के साथ चलना है!’’
गणपति बप्पा मोरया!
-0-


बहुत सुन्दर लिखा है, हार्दिक शुभकामनाएँ।
ReplyDeleteआप सभी का दिल से बहुत-बहुत धन्यवाद। ❤️
Deleteआपको मेरा लेख पसंद आया, यह जानकर सच में बहुत खुशी हुई।
आपका प्यार और प्रोत्साहन ही लिखने की प्रेरणा देता है।
— जैस्मिन 🌸
यह गणपति उत्सव पर एक चुटीली और आधुनिक व्यंग्य कथा है। लेखक ने बप्पा को आईपैड पर AI सीखते, फोटो एडिट करते और फिल्टर लगाते दिखाकर आज के दिखावे वाली भक्ति पर करारा कटाक्ष किया है।
ReplyDelete“पहले आँखें बंद होती थीं, अब कैमरा ऑन होता है” जैसे वाक्य गहरी चोट करते हैं। मूषक और बप्पा का संवाद हास्य के साथ सोचने पर मजबूर करता है कि आस्था अब साधना से ज्यादा स्टोरी और रील बन गई है। भाषा सरल, चुस्त और प्रवाहमयी है। डॉ वंदना शर्मा नई दिल्ली
बहुत-बहुत शुक्रिया ❤️
Deleteआपको मेरा लेख पसंद आया, यह मेरे लिए बहुत खुशी की बात है।
आपका प्यार और सराहना यूँ ही बनी रहे। 🌸
— जैस्मिन
वाह जैस्मिम मज़ा आ गया ! सटीक व्यंग ! बहुत बधाई ! - रीता प्रसाद
ReplyDeleteदिल से धन्यवाद ❤️
Deleteमेरी लिखी बातों को पढ़ना, पसंद करना और सराहना—मेरे लिए बहुत मायने रखता है।
आपका प्यार ही मेरी कलम की ताकत है। ✨
— जैस्मिन
Bahut acha prayaas, Aapne logon ki aaj ke jeewan ki sachai dikha di
ReplyDeleteदेशकाल परिस्थिति के अनुसार अच्छा व्यंग्य हैं.
ReplyDeleteदिल से धन्यवाद ❤️
Deleteमेरी लिखी बातों को पढ़ना, पसंद करना और सराहना—मेरे लिए बहुत मायने रखता है।
आपका प्यार ही मेरी कलम की ताकत है। ✨
— जैस्मिन
बहुत मजेदार चित्रण. भगवान यदि सचमुच हो तो अपना सिर पीट लेगा मनुष्यों के करतूत के कारण. बहुत बढ़िया कटाक्ष. हार्दिक बधाई.
ReplyDeleteआप सभी का दिल से बहुत-बहुत धन्यवाद। ❤️
Deleteआपको मेरा लेख पसंद आया, यह जानकर सच में बहुत खुशी हुई।
आपका प्यार और प्रोत्साहन ही लिखने की प्रेरणा देता है।
— जैस्मिन 🌸
बहुत रोचक,सशक्त कटाक्ष। बधाई
ReplyDeleteवाह! वाह !! बहुत बढ़िया ... हँसते हँसाते बहुत ही महत्त्वपूर्ण संदेश । हम सबको विचार करने की आवश्यकता है
ReplyDeleteमंजु मिश्रा
www.manukavya.wordpress.com
वाह!! बहुत खूब
ReplyDeleteवाह! क्या शानदार कटाक्ष है। नवीनता लिए समय के अनुकूल। चित्रण भी बहुत सुंदर किया है। हार्दिक बधाई जैस्मिन। सुदर्शन रत्नाकर
ReplyDeleteबहुत रोचक, सुंदर कटाक्ष!
ReplyDeleteमन मोह लिया इस रचना ने और आज के परिप्रेक्ष्य में एकदम सटीक। बस, इसमें विसर्जन का दर्द और समेट दिया जायें। आज के युग की मानसिकता। अपना काम निकल गया बप्पा से। उनका विसर्जन कर दिया। अब हमें क्या कि वे किस हालत में पानी के किनारे डूब- उतरा रहें है। बेहद रोचक तरीके से लिखा है। लेखक को साधुवाद
ReplyDeleteWell written Jas.... really enjoyed reading it!
ReplyDeleteKomal