पथ के साथी

Monday, May 9, 2011

नील कुवलय -से नयन



नील कुवलय -से नयन
-रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'

नील कुवलय -से
तुम्हारे
ये अधमुँदे नयन
कितने पावन
बुनते सपन  ।
डूबे मदिर
कल्पना के रंग में
और गहरी झील -सा
अपना यह मन ।
भोर की स्वर्ण किरने
लगी मुख चूमने,
आज फिर भी
ये नयन हैं अनमने
लहर -सुधियाँ
कई जन्मों से जुड़ी
रूप का कर रही
अनवरत आचमन ।

 फिर जनम
मिला हमें
तो फिर मिलेंगे ,
अधखिले ये कमल
फिर-फिर खिलेंगे
भूल नहीं पाया
अभी तक
उर यह आकुल
मृदु  स्पर्श
तरल स्मित की चितवन।

Friday, May 6, 2011

भाव-धारा


                         
1
बिना कहे जो सब कुछ कह जाते हैं

बिना दोष जो सब कुछ सह जाते हैं ।
दूर  हैं पर दिल के क़रीब रहते हैं
उनको हम अपना नसीब कहते हैं ।
-मुमताज-टी एएच खान
2

सपना ही सही ,सजाए रखिए  
ज़िन्दगी का भ्रम, बनाए रखिए   
हसरतें हज़ार हैं, ज़िन्दगी है 
                              कुछ तो उम्मीद , बचाए रखिए ।                                                 -रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

Sunday, May 1, 2011

ताँका गीत


 रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

थके न काँधे
कभी बोझ से किसी
दूर आ गया ,
तुम्हारे आँसुओं में
डूबा पाहन -मन । 1

पारदर्शी है-
तुम्हारा आचरण,
शुभ चिन्तन,
लोग देते ठोकरें
कितने हैं निर्मम ! 2

रोया नहीं मैं
कि पथ में शूल हैं,
नहीं झिझका
कि नभ में धूल है
या है कोई चुभन ।3

हों नैन गीले
टिका लो  माथा यह
काँधे पे मेरे
प्रतिकूल है जग
मैं करूँगा सहन ।4

उसी ताप से-
पिंघल ,मैं जी लूँगा
खारे ही सही
भर ओक पी लूँगा
करके आचमन ।5

पास होते जो
तुम ,सब जानते
पहचानते
मैं भी रोया ,मानते
प्यार,अपनापन ।6

प्राण हो मेरे
अब न रोना कभी
आँसू तुम्हारे
हैं सागर पे भारी
घुमड़ते ये घन ।7

बहा जो नीर
कह गया था पीर
मैं था अधीर
बींध गया था मन
अधरों का कम्पन ।8

लो पोंछ  आँखें
गर्म जल में जग
जाएगा जल
ऐसा चढ़ेगा ज्वार
डोलें धरा -गगन ।9

मोती ये तेरे
इनको खोना नहीं
यूँ रोना नहीं
लोग चाहते नहीं-
खिले कोई चमन ।10
 -0-

Wednesday, April 27, 2011

ताँका


रामेश्वर काम्बोज ’हिमांशु’
ताँका  जापानी काव्य की कई सौ साल पुरानी काव्य शैली है । इस शैली को नौवीं शताब्दी से बारहवीं शताब्दी  के दौरान काफी प्रसिद्धि मिली। उस समय इसके विषय धार्मिक या दरबारी  हुआ करते थे । हाइकु का उद्भव इसी से हुआ । इसकी संरचना 5+7+5+7+7=31वर्णों की होती है।एक कवि प्रथम 5+7+5=17 भाग की रचना करता था तो दूसरा कवि दूसरे भाग  7+7 की  पूर्त्ति के साथ शृंखला को पूरी करता था । फिर पूर्ववर्ती 7+7 को आधार बनाकर  अगली शृंखला में 5+7+5 यह क्रम चलता;फिर इसके आधार पर अगली शृंखला 7+7 की रचना होती थी । । इस काव्य शृंखला को रेंगा कहा जाता था । इस प्रकार की  शृंखला सूत्रबद्धता के कारण यह  संख्या 100 तक भी पहुँच जाती थी ।
1-बाँस का वन
बाँस का बन
चिर्-चिर् करता रहा
डूबता मन
ढक देते हैं शिला
सुग्रीव जैसे जन।
-0-
2-झील का जल
1
झील का जल
रातभर उन्मन
तट निर्जन
उगा  न आज चाँद
किनसे बातें करें!
2
हो गई भोर
सूरज पुजारी-सा
आया नहाने
झील है पुलकित
मिलन के बहाने
3
बोला कोकिल
तरु की डाल पर,
लाज तिरती
झुरमुटों के पाखी
चुहुलबाजी करें








4
हुए सिन्दूरी
लहरों के भी छोर
छलक गए
वे नयन निर्मल
झील के पल-पल
-0-



Thursday, April 21, 2011

है हमारी कामना !


रामेश्वर काम्बोज’हिमांशु’

है हमारी कामना
यही पावन भावना ।
दु:ख कभी न पास आएँ
अधर सदा मुसकुराएँ
खिल जाएँ सभी कलियाँ
महक उठे मन की गलियाँ
हृदय जब हो जाए दुर्बल
बन जाना तू ही सम्बल
       हाथ आकर थामना
है हमारी कामना ।
कौन अपना या पराया
मन कभी न जान पाया
यह मेरा वह भी मेरा
साँझ अपनी व सवेरा
बाँट दो दुख कम कर लो
सुख द्वारे पर यूँ धर लो
       सुखों से हो सामना
है हमारी कामना ।     
-0-

Sunday, April 17, 2011

तुम जो मिले


रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'
1

मधुर मुस्कान
सराबोर कर दे
मन व प्राण

2
तरल नैन
भीगे सरल बैन
लौटा दें चैन
3
रिश्तों की डोर-
भावना से लिपटी
उजली भोर
4
मिलें ज्यों कल
लगे पहचाने-से
भाव निर्मल
5
तुमने जोड़ा
पावन हृदय का
रस निचोड़ा
6
आज का दिन-
ईश्वर ने दिया ज्यों
स्वर्ग का राज
7
वर्षों का तप
हुआ आज सफल
तुम जो मिले
8
साँसों का सच
आँखों में झाँक रहा
बनके गंगा

Sunday, April 10, 2011

बची है आस-


रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’
1
तेरी दुआएँ
महसूसती मेरी
रक्त -शिराएँ
2
ओस की बूँद -
बरौनियों की नोक
उलझे आँसू
3
तुम्हारा मन
व्याकुल क्रौंच जैसा
करे क्रन्दन
4
बची है आस-
कभी न कभी तुम
आओगे पास
5


गए हो दूर

यादों का रात-दिन
जलता तूर1


6
तुम्हारी भेंट
रख ली सँजोकर
प्राण हों जैसे
7
सपना टूटा
हाथ जो गहा था
हमसे छूटा
8
सपने बाँटे-
जितने थे गुलाबी,
बचे हैं काँटे
9
फूल हैं झरे
सपने सब मरे
साँझ हो गई
-0-


1 -एक पर्वत जिस पर दिव्य प्रकाश देखकर हज़रत मूसा मूर्च्छित हो गए थे  ।






Thursday, April 7, 2011

जीत के आँसू ( टीम इण्डिया)


रोक न सके
सैलाब -से बहते
खुशी के आँसू                                 -रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'                                            

Saturday, April 2, 2011

मुक्तक



आज रिश्तों का हिसाब मत देखो
मैंने क्या लिखा ज़वाब मत देखो ।
हर वर्क पर है सिर्फ़  तेरा नाम ,
खोलकर दिल की क़िताब मत देखो॥
-0-
रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

Monday, March 28, 2011

जाएँगे हम


रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’
1
वश जो चले
चाहेगा कौन जीना
ज़हर पीना
2
जीवन-वन
भटकता ही रहा
चोटिल मन
3
सारे वसन्त
ले गया घर-द्वार
मिली दुत्कार
4
जाने नहीं ये
पाषाण का नगर
घाव हैं कहाँ?
5
अभागे हम
झुलसने पर भी
न भागे हम
6
मौत ने नहीं
अपनों ने सदा ही
मारा मुझको
7









अमृत-घट
जो पिलाने थे आए 
सभी लौटाए
8
ज़ुबान खोलें
जमा जितना विष
मन में घोलें
9
जाएँगे हम
ढूँढ़ो जो रोकर भी
लौटेंगे नहीं
10
ढूँढ़ा था घर
मिला था काँटों का
हमें बिस्तर
-0-