पथ के साथी

Monday, June 8, 2020

1003


1-वह कागज़
डॉ. शैलजा सक्सेना

जाने कितने कागज़ रँगकर
उस कागज़ तक मैं पहुँचूँगी
जिससे तेरी खुशबू आए।

सब कुछ लिखा, झूठ लग रहा
बिना साँस की देह -सरीखा
प्राण कोई अर्थों के भर दे
ऐसा गीत कहाँ गाया है?
गला रुद्ध हो, स्वर भीगा हो
शब्दों के पाँवों विछोह की
पायल भी इतनी भारी हो,
फिर मन के व्याकुल  पनघट से
वापस नहीं कभी जा पाए।

जाने कितने कागज़ रँगकर
उस कागज़ तक मैं पहुँचूँगी
जिससे तेरी खुशबू आए॥

तुझ को गाया तो मैंने है,
पर बिन देखे झूठा गाया
अंदाज़ों के शंख बजाए
सच क्या वह स्वर, तुझ तक आया?
तर्कों, व्याख्याओं की गठरी
मंदिर-मस्जिद खूब पसारी
पर झोली में सिक्का सच का
एक कभी ना मैंने पाया।
अब तो कुछ धन, जन यह पाए।
जाने कितने कागज़ रंगकर
उस कागज़ तक मैं पहुँचूँगी
जिससे तेरी खुशबू आए॥
 -0-
2-प्यार के चहबच्चे-
डॉ.शैलजा सक्सेना


रात भर फेंकता रहा आकाश
रुई की पौनियाँ,
हवा का चरखा
कातता
तार -तार!

सवेरे ने देखा
सफेद चादरों से ढकी
धरती,
रो रही है बिलखकर..

सूरज की बिन्दियाँ
जाने कहाँ गिरा आईं .....

फिर एक नया दिन....किरणें आई,
सफेद चादर
तार-तार,

आसमान
चुप,

सूरज की बिन्दिया ने
मनुहार से देखा

धरती
के सीने पर
बह निकले
प्यार के कई चहबच्चे
-0-

Sunday, June 7, 2020

1002


1- कृष्णा वर्मा
वक़्त


ग़ज़ब का हुनरमंद है वक़्त
लम्हा-लम्हा
ख़ारिज़ करता है तुम्हें तुम से
मजाल है जो होने दे कभी
देह को इसका अहसास।
बूँद-बूँद रिसती जाती है उम्र
तुम्हारी होंद से
उस पर कमाल कि
कोई नामोनिशान नहीं टीस का।
आशाओं की सुरीली सरगम में
कब बज उठे अशंकाओं  के
बेसुरे तार
यह तो जाने वही कारसाज़।
वाह रे नागर
कभी सांत्वनाओं की थपकी देके
कर देता है उत्सवी जीवन
और कभी
ज़मीन ही निकाल लेता है
पग तल से।
जिंदगी फिर भी झूलती रहती है
पैंडुलम सी
उम्मीदों और दिलासों के बीच।
अनजाने में जीती
पल-पल हलाल होती ज़िंदगी
कब रख पाती है 
उम्र का हिसाब।

-0-
2- सत्या शर्मा 'कीर्ति'
 प्यार मुझे तुम करना ऐसे

मूँगफली के दानों हो जैसे
काजू अख़रोट भरे हो वैसे
अमरूद-सा भी स्वाद मिला हो
प्यार मुझसे तुम करना ऐसे ।।

थोड़ा बादल भी  छाया हो
रिमझिम पानी भी बरसा हो
सोंधी मिट्टी की खुशबू हो जैसे
प्यार मुझसे तुम करना ऐसे ।।

भाव मनाने के न आते मुझको
रूठना भी नहीं भाता तुझको
दौड़ते - भागते रहें संग दोनों
प्यार मुझे तुम करना ऐसे।।
-0-

Saturday, June 6, 2020

1001



डॉ.सुधा गुप्ता    

1-सिसकी

बहुत देर रो-रोकर सिसकी
हलकान हो-होकर
सो जाए कोई बच्चा काँधे लगकर
तो
नींद में जैसे बार-बार
उसे सिसकी आती है
ऐसे
मुझे तेरी याद आती है
बहुत देर रो-रोकर
हलकान हो-होकर ।
-0-
2-प्यास

 एक दिन भी
अपनी मर्ज़ी का न जिया
एक मैं ही रही प्यासी
और सबने
भर-भर प्याला
छककर पिया।

होगा किसी मुट्ठी में चाँद
किसी में सूरज,
मैंने तो
साँस-साँस
बस
ज़िन्दगी का कर्ज़
चुकता किया।
एक दिन भी
अपनी मर्ज़ी का न जिया।
-0-
3-लड़ाई

शीशे पर
आती है गौरैया
बार-बार
मारती है चोंच
एक बार-दस बार-सौ बार
हज़ार बार ।
ख़ुद पर करती प्रहार-
ख़ुद से होती घायल गौरैया

अक्सर हमारी सारी ज़िन्दगी
खुद से लड़ते , चोट खाते बीतती है।
-0-

4-अँधेरी सुरंग

कितने दिन हुए
तुमसे
बिछुड़े
कितने हफ़्ते-महीने -बरस ?
सोचती हूँ
पर कुछ याद नहीं आता ।

एक अँधेरी सुरंग से गुज़र रही हूँ
जाने कब से !
गुज़रूँगी
जाने कब तक !!

कहीं
रोशनी की एऽऽऽक लकीर नहीं !
-0-
(एक क़ाफ़िला : नन्ही नौकाओं का ( काव्य-संग्रह,मई 1983)

Friday, June 5, 2020

1000


रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'
1-हरियाली के गीत
(30-05-1999 -आकाशवाणी-अम्बिकापुर-06-06-99, कलमकौशल–जून-2001)

हरियाली के गीत
छाया; रोहित काम्बोज
मत काटो तुम ये पेड़
हैं ये लज्जावसन
इस माँ वसुन्धरा के ।
इस संहार के बाद
अशोक की तरह
सचमुच तुम बहुत पछताओगे ;
बोलो फिर किसकी गोद में
सिर छिपाओगे ?
शीतल छाया
फिर कहाँ से पाओगे ?
कहाँ से पाओगे  फिर फल?
कहाँ से मिलेगा ?
सस्य श्यामला को
सींचने वाला जल ?
रेगिस्तानों में
 तब्दील हो जाएँगे खेत
बरसेंगे कहाँ से
उमड़-घुमड़कर बादल ?
थके हुए मुसाफ़िर
पाएँगे कहाँ से
श्रमहारी छाया ?
पेड़ों की हत्या करने से
हरियाली के दुश्मनों को
कब सुख मिल पाया ?
यदि चाहते हो –
आसमान से कम बरसे आग
अधिक बरसें बादल ,
खेत न बनें मरुस्थल,
ढकना होगा वसुधा का तन
तभी कम होगी
गाँव –नगर की तपन ।
उगाने होंगे अनगिन पेड़
बचाने होंगे
दिन- रात कटते हरे- भरे वन ।
तभी हर डाल फूलों से महकेगी
फलों से लदकर
नववधू की गर्दन की तरह
झुक जाएगी
नदियाँ खेतों को सींचेंगी
सोना बरसाएँगी
दाना चुगन की होड़ में
चिरैया चहकेगी
अम्बर में उड़कर
 हरियाली के गीत गाएगी
-0-
2-आग
(20/10/1990- आकाशवाणी अम्बिकापुर-31-7-1998)

मत जलाओ
इस शाखा को
हम बैठगे भला कहाँ पर
जब लौटेंगे रोज़ सफ़र से
नीड़ कहाँ पर होगा अपना
झूलेगा फिर
सुबह-शाम को
कलरव कैसे
जले ठूँठ पर ।
          कैसे खेलेंगे
          आँख मिचौनी
          नन्हे बच्चे
अपत डार पर
         
छाया; रोहित काम्बोज
गीत नहीं
          गाएँगे जब हम
          कैसे होगी संझा -बाती
          और करेगा कौन आरती
धूप जलाकर,
बजाकर
जब
हम साधेंगे चुप्पी
कौन जाएगा
नदी नहाने
कौन पुकारेगा
सूरज को
भरे गले से
भीगे स्वर में
जागेंगी फिर
कहाँ ॠचाएँ
हर अन्तर में ।
मत जलाओ
इस शाखा को
क्योंकि,
क्या बचेगा
इसके यूँ जल जाने पर-
न नीड़
न आँख-मिचौली
न आरती
न यह सूरज
और न गीली ॠचाएँ।
-0-

3- परहेज़
प्रीति अग्रवाल

परहेज़ तो पहले भी
करते थे लोग
कभी जात के नाम पर
कभी प्रांत के नाम पर
कभी रूप रंग, तो कभी
धन-मान के नाम पर!

सोचती हूँ-
जो हुआ, अच्छा तो नहीं हुआ,
पर भेद-भाव मिटे
सब बराबर हो गए
परहेज़ सार्वजनिक
कानूनन हो गया!!
-0-


Wednesday, June 3, 2020

999-ग़ज़ल



 परमजीत कौर 'रीत'

कहीं आँखों का सागर बोलता है
जुबाँ चुप हो तो पैकर बोलता है

वो दिखता है जो अंदर बोलता है
है जो सीपी में, गौहर बोलता है

सदाएँ  पुरअसर हों और कशिश भी
तो फिर अंदर का पत्थर बोलता है

शराफ़त है कि अक्सर क़त्ल करके
'फ़लाँ क़ातिल है' खंज़र बोलता है

कहीं जाओ तो जल्दी लौट आना
ये हर बेटी से अब घर बोलता है

दिलों के ग्रंथ पढ़ना ‘रीत’ मुश्किल
वहाँ अक्षर पे अक्षर बोलता है

-0-(आकाशवाणी सूरतगढ़ के 'महिला -जगत' कार्यक्रम की काव्य गोष्ठी में 15 अगस्त 2018 को प्रसारित )

Tuesday, June 2, 2020

998

रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'


1-तूफ़ान सड़क पर

नामी या बेनाम सड़क पर
होते सारे  काम सड़क पर
जब देश लूटता राजा
कोई करे
कहाँ शिकायत, 
 कुर्सी पर कुछ बैठे दाग़ी
एकजुट हो
करें हिमायत ;
बेहयाई नहीं टूटती ,
रोज़ उठें तूफ़ान सड़क पर ।

दूरदर्शनी बने  हुए
इस दौर के
भोण्डे तुक्कड़,
सरस्वती के सब बेटे
हैं  घूमते
बनकर फक्कड़ ;
अपमान का गरल पी रहा
ग़ालिब का  दीवान सड़क पर ।

खेत छिने , खलिहान लुटे
बिका घर भी
कंगाल हुए ,
रोटी, कपड़ा, मन का चैन
लूटें बाज़ ,
बदहाल हुए ;
फ़सलों पर बन रहे भवन
किसान लहूलुहान सड़क पर ।

मैली चादर रिश्तों की
धुलती नहीं
सूखा पानी,
दम घुटकर विश्वास मरा
कसम-सूली
चढ़ी जवानी;
उम्र बीतने पर दिया है
प्यार का इम्तिहान सड़क पर । (8फ़रवरी, 2011)
-0-
2-बीच सड़क पर

जब-जब दानव
बीच सड़क पर
चलकर आएँगे।
किसी भले
मानुष के घर को
आग लगाएँगे।
अनगिन दाग़
लगे हैं इनके
काले दामन पर
लाख  देखना –
चाहें फिर भी
देख न पाएँगे।
कभी जाति
कभी मज़हब के
झण्डे फ़हराकर
  गुण्डे कौर
छीन भूखों का
खुद खा जाएँगे।
नफ़रत बोकर
नफ़रत की ही
फ़सलें काटेंगे
खुली हाट में
नफ़रत का ही-
ढेर लगाएँगे।
तुझे कसम है
हार न जाना
लंका नगरी में
खो गया
विश्वास कहाँ से
खोजके लाएँगे।
इंसानों के
दुश्मन तो 
हर घर में बैठे हैं
उनसे टक्कर
 लेनेवाले-
भी मिल जाएँगे।
-0-
3-इस शहर में

पत्थरों के
इस शहर में
मैं जब से आ गया हूँ ;
बहुत गहरी
चोट मन पर
और तन पर खा गया हूँ ।

अमराई को न
भूल पाया
न कोयल की ॠचाएँ ;
हृदय से
लिपटी हुई हैं
भोर की शीतल हवाएँ ।
बीता हुआ
हर एक पल
याद में मैं पा गया हूँ ।
शहर लिपटा
 है धुएँ में ,
भीड़ में
 सब हैं अकेले ;
स्वार्थ की है
धूप गहरी
कपट के हैं
क्रूर मेले ।
बैठकर
सुनसान घर में
दर्द मैं सहला गया हूँ  ।
-0-(04-06-96)
-0-

Sunday, May 31, 2020

997-अनुभूतियाँ


प्रीति अग्रवाल
1.
ख़ामोशी, ख़ामोश नहीं अब
मुझसे है बतियाती,
नए-पुराने, खट्टे-मीठे
किस्से खूब सुनाती!
2.
नई सहेली खूब मिली है
जिसका नाम तन्हाई,
कतराते हैं क्यों सब इससे
अब तक जान न पाई!
3.
तुम रूठे हो जबसे, क़यामत है आई
मेरी कविता भी रूठी, सूखी जाए है स्याही!
4.
टूटता तो दिल है, फिर जाने ये क्या है...
जो आँखों में चुभता है, लावा-सा बहता है...।
5.
ज़ख्म दिल के, तू दिल में ही रखना छिपा
बस कुरेदेगी दुनिया, .....वही जानती है।
6
अपने होंठों को, तो सी लूँगी, मगर....
इन धड़कनों का क्या, जो शोर मचाती हैं...।
7
जो रोकर, मुकद्दर बदलते अगर
हम दरिया बहाते, .....तुम सैलाब लाते।
8
क़तरा- क़तरा सही, हो रहा है यकीं
अपने होने का मक़सद, समझ आ रहा है।
9
सात घर छोड़े, वो डायन भली
ये आदमी की जात, तो सगों को न छोड़े!!
10
रोटी, कपड़ा.....और मकान
ज़िन्दगी फिर सिमट के, वहीं आ गई है।
11
रुक गया कारवाँ, तो कारवाँ न रहेगा
मुकद्दर में उसके, तो चलना लिखा है...।
12
ऐ ज़िन्दगी तू किसी, भुलावे में तो नहीं
बस थकी हूँ मैं, अभी टूटी नहीं!
13
खामोशी से पिए आँसू , वो नारी हुई
मीठी झील देखो, सागर-सी खारी हुई!
14
कौन ग़म, क्या खुशी, अब ये कैसे हो तय
आँख उसमें भी नम, आँख इसमें भी नम!
15
अब तुझसे भला, क्या क्या मैं माँगू
जो रोना भी चाहूँ, तो आँसू नहीं....।
16
व्यापार का है, अलग क़ायदा....
प्यार किश्तों और शर्तों में, दम तोड़ देगा!
-0-