आज की स्त्री/डॉ. कनक लता
आज की स्त्री
सब लौटाती है
नाप-तौलकर,
बल्कि बढ़ाकर।
समय के साथ,
कभी थोड़ा धीरे,
कभी शीघ्र,
मगर लौटाती है
सब कुछ।
पर स्त्री जात है न,
प्रवृत्ति में है -
सँजोना, सँवारना,
आकार देना।
सो आपका दिया सब सँजो लेती है,
इस्तेमाल भी करती है,
कभी प्रेम से,
तो कभी मर्यादा के लिए।
पर उतना ही या उससे भी अधिक निर्मित करती
है,
सृजित करती है,
सजाती है, सँवारती है, आकार देती है,
उस पर अपने प्रेम, घृणा, नफ़रत, प्रतिस्पर्धा
की मुहर लगाती है,
और लौटा देती है
आपको,
आपके समाज को।
आज की स्त्री
सब लौटाती है…
बहुत बढ़िया, वह स्त्री है उसे जो दिया जायेगा उसे दोगुना लुटा देगी चाहे सम्मान हो या सामान डॉ वंदना शर्मा नई दिल्ली
ReplyDeleteबहुत धन्यवाद आदरणीया...🙏😊
DeleteDh
ReplyDeleteधन्यवाद सहज साहित्य और काम्बोज भइया को भी बहुत धन्यवाद मेरी कविता को इस उत्कृष्ट पटल पर स्थान देने के लिए.. 🙏😊
ReplyDeleteचिंतनशील सृजन के लिए हार्दिक बधाई 💐 डॉ अंजुल चौहान
ReplyDeleteबहुत सुंदर अभिव्यक्ति। हार्दिक बधाई । सुदर्शन रत्नाकर
ReplyDeleteबहुत सुंदर अभिव्यक्ति। हार्दिक बधाई । सुदर्शन रत्नाकर
ReplyDeleteआपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" पर सोमवार 12 अक्टूबर 2026 को लिंक की गयी है....
ReplyDeletehttp://halchalwith5links.blogspot.in पर आप सादर आमंत्रित हैं, ज़रूर आइएगा... धन्यवाद!
!
अत्यंत सार्थक रचना। बधाई और शुभकामनाएं!
ReplyDeleteबहुत सटीक सार्थक एवं सारगर्भित सृजन ।
ReplyDeleteसही कहा है, वैसे हर कोई यही तो करता है!!
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