पथ के साथी

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Sunday, March 22, 2026

1499-जल-दिवस

 

1- पहाड़ी झील(हाइकु)

 डॉ. कुँवर दिनेश सिंह


1

एकाकी झील,

देवदारों-बांजों में

पहाड़ी झील!

2

आया न कोई

शैवाल ओढ़कर

झील है सोई।

3

बीता शिशिर

झील के तल पर

कंपन फिर!

4

बलूत रक्षी

रहस्यभरी झील

निधि किसकी?

5

वन सघन

असंख्य पत्तों ढका

झील का मन।

6

झील है सोई

कविमन खोजता

रूपक कोई।

7

खिली है धूप

स्वर्णमयी हो रहा

झील का रूप।

8

चाँदनी तले

झील का चेहरा भी

रंग बदले।

9

आया समीप

झील के तट पर

पक्षी की बीप!

10

हिम-परत

स्थितप्रज्ञ-सी झील

योग-निरत!

-0-

डॉ. कुँवर दिनेश सिंह

प्राचार्य, राजकीय महाविद्यालय, धामी (शिमला), हिमाचल प्रदेश।

ईमेल: hyphenjournal@gmail.com

मोबाइल: +91 94186 26090

 

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2-वाह रे नीर, अद्भुत है तू / डॉकनक लता 

 

वाह रे नीर अद्भुत है तू

पृथ्वी का अस्तित्व है तुझसे 

जीवन का आधार है तू

तेरी बूँद- बूँबूँ अनमोल रतन 

ईश्वर का उपहार है तू 

वाह रे नीर ,अद्भुत है तू 

 

धारा के साथ बहे, नदी कहलाए 

लहरों के साथ चले तो समुद्र है तू 

ठहरे तो सुरम्य झील बने 

हिम के रूप में कठोर भी है तू 

वाह रे नीर अद्भुत है तू 

 

सम्पूर्ण ब्रह्मांड कायम है तुझसे 

नियंत्रण रहित प्रलय भी है तू 

कुछ नहीं था तब भी तू था 

कुछ नहीं होगा तब भी है तू 

 वाह रे नीर अद्भुत है तू 

 

निर्मल तुझी से है सारा जहान 

शीतलता की पहचान है तू 

तूफ़ानों की प्रचण्ड शक्ति है तुझमें 

प्यासों के लिए वरदान है तू 

वाह रे नीर अद्भुत है तू

-0-

Thursday, January 1, 2026

1477-नया साल

 नया साल/ डॉ.सुरंगमा यादव

 

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 2-साल पुराना चला गया /डॉ. कनक लता

 

कुछ खट्टे, कुछ मीठे, कुछ कड़वे लम्हों को सँजोया गया

कभी ख़ुशनुमा हुई ज़िन्दगी, तो कभी पलकों को भिगोया गया

नव वर्ष को आमंत्रित करके, साल पुराना चला गया

 

कुछ ख़ास- सा मिला कभी, कुछ क़ीमती खोया भी गया

कुछ रंग उड़ चले तो कुछ और रंगों को उकेरा भी गया

खुशियों का आह्वान करके, साल पुराना चला गया

 

कभी दिव्य प्रकाश पसर गया, कभी घोर अँधेरा छा गया

कुछ सुरमई सरगम सजी, कभी बेसुरा स्वर गा गया

नवगीत, नव लय, नव ताल देकर, साल पुराना चला गया

 

कुछ पुष्प आस के खिले कभी, दलपुंज कभी कोई झ गया

पतझर सुखाया पात सारे, तो बहार फिर से खिला गया

सुख-दुख तो हैं जीवन के पहलू, साल पुराना सिखा गया

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Sunday, September 14, 2025

1470-हिन्दी -दिवस

डॉ. कनक लता मिश्रा



तुम स्रोत हो, तुम भाव हो

तुम शक्ति हो, तुम प्रभाव हो

हस्ती हमारी तुमसे है

 मेरा पथ हो तुम, तुम्हीं पड़ाव हो

अज्ञान का तम छँट गया,

घनघोर बादल हट गया

अंतः तमस् ज्योतित हुआ,

तुम वह अलौकिक प्रकाश हो

अतिशय तुम्हारे रूप हैं,

अतिशय तुम्हारी शैलियाँ

कभी गद्य में कभी पद्य में,

हर रंग में अठखेलियाँ

डूबी तुम्हारे ज्ञान रस,

तब पार उतरीं कश्तियाँ

उत्कृष्ट तुम, तुम दिव्य हो,

तुम ईश्वरीय नैवेद्य हो


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Tuesday, July 29, 2025

1476-4 कविताएँ-

कविताएँ-

1-मैं शिला पर रेख हूँ/ डॉ . सुरंगमा यादव

 

दीप की मैं लौ नहीं हूँ,

 जो हवा दम-खम दिखाए

 मैं लहर भी नहीं कोई

 छू किनारा लौट जाए

 और गोताखोर भी मैं वो नहीं जो

 हाथ खाली लौट आए

 मैं नहीं वो स्वाति- बिन्दु

विषधरों का विष बढ़ाए

काँच का टुकड़ा नहीं मैं

जो शिला से टूट जाए

 मैं शिला पर रेख हूँ

 आँधियों के बाद खिलती धूप हूँ

 वक्त मेरे रथ का पहिया

 सारथी भी मैं,

 मैं ही सवार हूँ।

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2- चाँद तुम कब आओगे / डॉ. कनक लता

व्याकुल हुई सी एक नदी ने

एक दिन पुकारा चाँ को 

चाँद तु तुम कब आओगे?

 

लंबी हैं अमावस की रातें 

कलकल में छुपी अगण्य बातें 

अवसाद के डेल्टा को पिघलाने 

चाँ तुम कब आओगे?

 

चारों ओर घुप्प अँधेरा है 

रोशनी का ना कहीं बसेरा है 

नहीं पा रही खुद की भी थाह  

चाँद तुम कब आओगे?

 

बदल गयी दिशाएँ मेरी

लयहीन हुईं लहरें मेरी 

लक्ष्य भी खो रहा सा है 

चाँद तुम कब आओगे

 

धूमिल हुआ मेरा रूप रंग 

अनावृत्ति होती मेरी हर तरंग 

धवल चाँदनी को बिखराने 

चाँद तुम कब आओगे 

 

विरह,एक अन्तर्निहित सुख 

मिलन की आस का सुख 

अवबोध तो है मुझे फिर भी 

चाँद तुम कब आओगे?

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3-हरियाली की चादर/ अनिता मंडा

 

  हरियाली की चादर ओढ़ 

धरती सुख की करवट सोई है

 

धीमी-धीमी बूँदाबादी से

भीगती है हरी ओढ़नी

उनींदी सी धरा

पलकें खोल फिर मूंद लेती है

 

हे ईश्वर!

सुख के पल थोड़े लंबे कर दो

दुःख तुम थोड़ा विश्राम कर लो

कि मन अब थक गया है

तुमसे निबाहते हुए।

 

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4- बरसाती नदी:(एक स्मृति-व्रत की गाथा)/डॉ.पूनम चौधरी

 

 

हर वर्ष

जब आकाश

अपनी थकी हुई पलकों पर

बादल की राख मलता है —

वह उतरती है...

 

नदी नहीं,

कोई विस्मृत स्मृति जैसे

धरती की जड़ों से फूटकर

फिर एक बार

अपने खोए हुए उच्चारण को

जल में ढालने चल पड़ती है

 

उसका बहाव —

न वेग है, न विलंब

वह एक प्राचीन संकल्प-सा

हर सावन

उसी रास्ते लौटती है

जहाँ मिट्टी अब भी

उसके नाम का ऋण लिये बैठी है

 

वह जल नहीं लाती

लाती है वह चुप्पी

जो रेत की दरारों में

बीज की तरह पली थी —

और अब

बूँद-बूँद

अर्थ बनने लगी है

 

वह बहती है

जैसे कोई पुराना अभिशाप

अपने आप को धोते हुए

मुक्ति की कोई भाषा रच रहा हो

 

हर मोड़ पर

वह एक नई असहमति लिखती है —

चट्टानों पर

उखड़े हुए पीपलों की जड़ों में

उस आखिरी कच्चे पुल की दरारों में

जहाँ से कोई लौटकर नहीं आता

 

कभी वह खेतों को छूती है

जैसे कोई प्रेयसी

लौट आई हो

उस देह की गंध तक

जिसे वह बरसों से भूल नहीं पाई

 

और फिर

उसी मिट्टी को

एक थकी हुई साँस की तरह

अपने साथ बहा ले जाती है

 

जैसे प्रेम, जब बँध नहीं पाता

तो बह जाता है —

चुपचाप, निःशब्द, निर्विवाद

 

उसके भीतर

बहते हैं गाँवों के वे नाम,

जिन्हें अब केवल

सूखे कुओं की साँसें पहचानती हैं —

या वे दहलीज़ें

जिन्होंने कभी अपने ऊपर

पाँवों की छाँव देखी थी

 

वह बहती है

तो लगता है

जैसे कोई देवी

अपना अकूत वैभव

लुटाकर

फिर अकेली लौटती है

अपने ही भीतर

 

और जब

सावन समर्पित कर स्वयं को

हो जाता है हल्का

तो नदी भी

किसी अज्ञात लहर की तरह

समाहित होने लगती है

भँवर में

 

न कोई शोक

न उत्सव —

बस तट पर रह जाते हैं

कुछ पुरानी चूड़ियाँ

कुछ टूटी हुई नावें

अधूरे घोंसले

और

पेड़ की जड़ों में उलझे रिश्ते

और

कुछ क्लान्त पगचिह्न

जिन्हें अगली बरसात

फिर वहाँ ले जाएगी

---

 

बरसाती नदी —

इतिहास है, स्मृतियों का

अनुष्ठान है व्यथाओं का

जल नहीं, ज्वर है —

जो हर वर्ष लौटता है

उतरने के लिए

संचित पीड़ा और कुंठा

बहा देने को

एक नई आकृति में

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Thursday, March 6, 2025

1452

 डॉ. कनक लता मिश्रा

1-  सरस्वती वंदना

 


माँ सरस्वती,  माँ शारदे,  माँ शारदे, माँ सरस्वती 

तू ज्ञान का वरदान दे, माँ ज्ञानदा माँ भारती

माँ सरस्वती…

धुन तेरी वीणा की बजे, हो हृदय में तेरा ही वास,  

स्वर तेरे गूंजे मेरे स्वर, जीवन बने तुझसे उजास 

करूँ वंदना, करूँ प्रार्थना, अभ्यर्थना करूँ स्तुति 

माँ सरस्वती..

 

मिट जाय सब मन के विकार जो हो श्वास में तेरा निवास

अन्तःकरण हो दीप्तिमान कर ज्ञान ज्योति का प्रकाश 

सब कुछ मेरा तेरी सर्जना गाउ तेरी ही अनुश्रुति 

माँ सरस्वती…. 

 

हो आत्म बोध हो मन प्रबल चैतन्य मन में तेरा वास 

आनंद हो या वेदना,  अवलंब तू तेरी ही आस

दृष्टि तू मेरी दिव्य कर माँ दूर कर सब विकृति 

माँ सरस्वती…

-0-

 

2-  मन का शृंगार

 

कैसे करूँ मन का शृंगार 

क्षण क्षण देखूँ रूप निहार,  

अधीर, अधूरा, आरव है,  

पल प्रतिपल द्वंद्व है इसमें,

स्वयं से जीते,  कभी माने हार,  

कैसे करूँ मन का ..

 

कितनी इच्छाएँ,  कितनी आशाएँ  

कभी हो दृढ़, तो कभी हो विचलित,  

कभी तो लगे सब ही निराधार,  

कैसे करूँ मन का …

 

कभी हो उदास,  कभी हो निराश,  

कभी तो बहे प्रेम रसधार,  

कभी हो लोभ,  कभी हो क्षोभ,  

कभी त्याग की उठे फुहार,  

कौन रूप सजाऊँ इसका,  

हो ना जिसमें कोई विकार,  

कैसे करूँ मन का …

 

मन का अपना ही रंगमंच है,  

धारण करे रूप अपार,  

कभी हर्ष का कोलाहल है,  

कभी विषाद की निर्ममता 

भूमिकाएँ हैं अनेक

अनेक रूप में करूँ विचार,  

कैसे करूँ मन का शृंगार 

कैसे करूँ मन का…

-0-St.Joseph’s College for Women, Civil Lines, Gorakhpur