पथ के साथी

Saturday, July 20, 2019

916


कुछ रिश्ते (16 क्षणिकाएँ) 

डॉ.जेन्नी शबनम
1.
कुछ रिश्ते बेनाम होते हैं
जी चाहता है  
कुछ नाम रख ही दूँ 
क्या पता किसी ख़ास घड़ी में  
उसे पुकारना ज़रूरी पड़ जाए
जब नाम के सभी रिश्ते नाउम्मीद कर दें   
और बस एक आखिरी उम्मीद वही हो...
***
2.
कुछ रिश्ते बेकाम होते हैं
जी चाहता है  
भट्टी में उन्हें जला दूँ 
और उसकी राख को अपने आकाश में 
बादल -सा उड़ा दूँ 
जो धीरे-धीरे उड़ कर धूल-कणों में मिल जाएँ
बेकाम रिश्ते बोझिल होते हैं 
बोझिल ज़िंदगी आखिर कब तक...
***
3.
कुछ रिश्ते बेशर्त होते हैं 
बिना किसी अपेक्षा के जीते हैं 
जी चाहता है 
अपने जीवन की सारी शर्तें 
उन पर निछावर कर दूँ 
जब तक जिऊँ
बेशर्त रिश्ते निभाऊँ...
***
4.
कुछ रिश्ते बासी होते हैं 
रोज़ गर्म करने पर भी नष्ट हो जाते हैं
और अंततः बास आने लगती है 
जी चाहता है 
पोलीथीन में बंद कर 
कूड़ेदान में फेंक दूँ 
ताकि वातावरण दूषित होने से बच जाए...
***

5.
कुछ रिश्ते बेकार होते हैं 
ऐसे जैसे दीमक लगे दरवाज़े  
जो भीतर से खोखले पर साबुत दिखते हों 
जी चाहता है 
दरवाज़े उखाड़कर
आग में जला दूँ 
और उनकी जगह शीशे के दरवाजे लगा दूँ  
ताकि ध्यान से कोई ज़िंदगी में आए 
कहीं दरवाजा टूट न जाए...
***
6.
कुछ रिश्ते शहर होते हैं
जहाँ अनचाहे ठहरे होते हैं लोग  
जाने कहाँ-कहाँ से आकर बस जाते हैं 
बिना उसकी मर्जी पूछे  
जी चाहता है 
सभी को उसके-उसके गाँव भेज दूँ 
शहर में भीड़ बढ़ गई है...
***  
7.
कुछ रिश्ते बर्फ होते हैं 
आजीवन जमे रहते हैं 
जी चाहता है 
इस बर्फ की पहाड़ी पर चढ़ जाऊँ
और अनवरत मोमबत्ती जलाए रहूँ 
ताकि धीरे-धीरे 
ज़रा-ज़रा-से पिघलते रहे...

***
8.
कुछ रिश्ते अजनबी होते हैं
हर पहचान से परे 
कोई अपनापन नहीं 
कोई संवेदना नहीं
जी चाहता है 
इनका पता पूछ कर 
इन्हें बैरंग लौटा दूँ...

***
9.
कुछ रिश्ते खूबसूरत होते हैं 
इतने कि खुद की भी नज़र लग जाती है
जी चाहता है 
इनको काला टीका लगा दूँ 
लाल मिर्च से नज़र उतार दूँ 
बुरी नज़र... जाने कब... किसकी...

***

10.
कुछ रिश्ते बेशकीमती होते हैं
जौहरी बाज़ार में ताखे पे सजे हुए 
कुछ अनमोल 
जिन्हें खरीदा नहीं जा सकता 
जी चाहता है 
इनपर इनका मोल चिपका दूँ 
ताकि देखने वाले ईर्ष्या करें...

***
11.
कुछ रिश्ते आग होते हैं
कभी दहकते हैं, कभी धधकते हैं  
अपनी ही आग में जलते हैं  
जी चाहता है 
ओस की कुछ बूँदें 
आग पर उड़ेल दूँ
ताकि धीमे धीमे सुलगते रहें...

***
12. 
कुछ रिश्ते चाँद होते हैं
कभी अमावस तो कभी पूर्णिमा 
कभी अन्धेरा कभी उजाला 
जी चाहता है 
चाँदनी अपने पल्लू में बाँध लूँ 
और चाँद को दीवार पे टाँग दूँ 
कभी अमावस नहीं...
***
13.
कुछ रिश्ते फूल होते हैं
खिले-खिले बारहमासी फूल की तरह 
जी चाहता है 
उसके सभी काँटों को 
ज़मीन में दफ़न कर दूँ 
ताकि कभी चुभे नहीं 
ज़िंदगी सुगन्धित रहे 
और खिली-खिली...
***
14.
कुछ रिश्ते ज़िंदगी होते हैं
ज़िंदगी यूँ ही जीवन जीते हैं 
बदन में साँस बनकर 
रगों में लहू बनकर 
जी चाहता है 
ज़िंदगी को चुरा लूँ 
और ज़िंदगी चलती रहे यूँ ही...
***
15.
रिश्ते फूल, तितली, जुगनू, काँटे...
रिश्ते चाँद, तारे, सूरज, बादल...
रिश्ते खट्टे, मीठे, नमकीन, तीखे...
रिश्ते लाल, पीले, गुलाबी, काले, सफ़ेद, स्याह... 
रिश्ते कोमल, कठोर, लचीले, नुकीले...
रिश्ते दया, माया, प्रेम, घृणा, सुख, दुःख, ऊर्जा...
रिश्ते आग, धुआँ, हवा, पानी...
रिश्ते गीत, संगीत, मौन, चुप्पी, शून्य, कोलाहल...  
रिश्ते ख्वाब, रिश्ते पतझड़, रिश्ते जंगल, रिश्ते बारिश...
रिश्ते स्वर्ग रिश्ते नरक...
रिश्ते बोझ, रिश्ते सरल...
रिश्ते मासूम, रिश्ते ज़हीन... 
रिश्ते फरेब, रिश्ते जलील...
***
16.
रिश्ते उपमाओं- बिम्बों से सजे
संवेदनाओं से घिरे 
रिश्ते, रिश्ते होते हैं 
जैसे समझो
रिश्ते वैसे होते हैं...
रिश्ते जीवन 
रिश्ते ज़िंदगी...
-0- जेन्नी शबनम (नवंबर 16, 2012)
लम्हों का सफ़र के अंक 375 से साभार

[अधिक पढ़ने के लिए  इनका यह ब्लॉग ज़रूर पढ़िए-

Monday, July 15, 2019

915



1-प्रीति अग्रवाल
1-भोर

भोर हो गई
चलो स्नान कर,
सूर्य देव को 
अर्घ चढ़ाएँ,

डाल- डाल फिर
चहक- चहक,
नव दिन का 
मंगल गीत सुनाएँ ।

-0-

2-क्या पता था

मिज़ाज  कुछ
सुस्त था,
तन्हाई का
आलम भी,

पिघलती रेत ने
ऐसे गुदगुदाया,
कि मुस्कुराहट 
आ ही गई ।
-0-
(चित्रांकन: प्रीति अग्रवाल)
ई-मेल- agl.preeti22@gmail.com

-0-
दोहे
2-अनिता मण्डा
1
खाली पाती मेघ की, धरा रही है बाँच।
तृष्णा पल-पल बढ़ रही, सुलगी भीतर आँच।।
 2
बदरा नभ का पावणां, रखे धरा से हेत।
भूले जब से राह वो, सूख गए हैं खेत।।
3
जंगल, नदिया, बावड़ी, धूप रही है चूस।
वापस कुछ देते नहीं, मेघ हुए कंजूस।।
-0-
3-मंजूषा मन
1
मेरे सब सुख आपके, दुख सब मेरे नाम।
प्रभु जी सुनिए यह अरज, कीजै मेरा काम।
2
मुझमें  थोड़ा तू बसा,  तुझमें  मेरा वास।
जीवन की खुशियाँ यही, मन क्यों रहे उदास।।

Tuesday, July 9, 2019

914-अभिलाषाएँ


  डॉ हृदय नारायण उपाध्याय

1-अभिलाषाएँ
चाहूँगा मैं फूलों से बन पराग बिछ जाना,
कलियों से थिरकन को लेकर पत्तों सा हिल जाना ।
बढ़ता जाऊँ नीलगगन में, मन की यह अभिलाषा,
माटी से जुड़कर पूरी हों, मन की सारी आशा।
पतझड़ और तपन आकर भी, गीत ऐसा गा जाए,
स्वर कोयल का गीत मीत का, जीवन-राग सुनाए।
कांटे समझ भले ही अपने, अंत समय तज जाएँ,
फिर भी सबके रक्षा की, अभिलाषाएँ मिट ना पाएँ।
[आकाशवाणी अम्बिकापुर छतीसगढ़ से प्रसारित कविताएँ]

2-कोशिश
मेरी कोशिश है –
शब्द अब नए अर्थों से सँवर जाएँ,
लोग विध्वंस, चीख, धोखा और विवशता के अर्थ भूलकर
निर्माण, हँसी, विश्वास और सहजता की चर्चा करें।
मेरे कोशिश है –
लोंगों के मुख से आशीष निकले,
कबीर का जीवन जीकर, लोग मीरा सा प्रेम करें।
लोगों में ईसा-सी सेवा की चाह हो,
मानवता की खातिर चाहे सलीबों की राह हो।
मेरे कोशिश है –
बची रहे झरनों की शीतलता और नदियों की लहरें,
चौपायों के मधुवन और शिशुओं की किलकन ।
शांति के कुटीर हों, सुखद समीर हो।
स्वार्थों से परे रहकर स्वभाव से अमीर हों ।  
-0-


Friday, July 5, 2019

913-पास तुम्हारे मेरा मन है


रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’
1
अपना कोई घर- आँगन है
यही सोचना पागलपन है।
ठहर गए थे जिस बस्ती में
वह दो पल का वृंदावन है।
उनके हिस्से महल दुमहले
अपने हिस्से नील गगन है।
पहले घायल पाँव हुए थे
अब तो घायल पूरा तन है।
तन तो साथ चला आया था
पास तुम्हारे मेरा मन है।
 -0-
2
कैसे -कैसे दिन
बेरहम वक़्त ने
हमको दिखाए हैं।
जिनको सींचा था
वे ही मिलकरके
मिटाने आए हैं।
देखना कभी तो
पूरा सच क्या है
तुम ऑंखें खोलकर।
पी गए  नफ़रतें
सारे छल फरेब
ईर्ष्या में घोलकर।
 -0-

 -0-

Sunday, June 30, 2019

912


डॉ. सुरंगमा यादव
1- वर्तमान में आग लगाकर 

एक अपने के ठुकराने से 
रूठा जग से नहीं जाता है 
वो यदि अपना होता
ठेस पे ठेस लगाकर
उपहास न करता
अपना बनकर छलने वाला
शत्रु से बढकर घातक होता है 
टूट गया जो प्रेम का नाता
सबसे नेह नहीं तोड़ा जाता है 
कुछ अपनी,कुछ उसकी मर्जी 
सदा स्वीकार नहीं होती है अर्जी 
मनचाहा सब कुछ दुनिया में 
नहीं सदा ही मिल पाता है 
दुःख साधन को पकड़े रहने से
हारिल बनकर स्वयं बँधा बंधन में 
एक सुख के न मिल पाने से
रोना-गाना अधिक नहीं भाता है 
दिखीं दरारें, भरना संभव
सीलन की ;पर राह खोजना दुष्कर 
सीली लकड़ी सुलग-सुलगकर
हानि आँख की करती
सीले ईंधन के कारण
चूल्हा नहीं तोड़ा जाता है 
असरदार हो औषधि कितनी
घाव हमेशा 
धीरे-धीरे ही भरता है 
एक घाव की खातिर 
अंग नहीं काटा जाता है 
वर्तमान में आग लगाकर 
भविष्य का उपवन
खिला नहीं करता है
-0-
2- आया कैसा दौर

काँटों की रंजिश में 
कब तक कलियाँ 
छलनी होंगी 
भँवरों की मनमानी को
कहो कहाँ तक 
सहन करेंगी
सोच में डूबी
बगिया सारी
कल होगी किसकी बारी
मौन हुई नन्हीं किलकारी
छोड़ गई मन में चिंगारी 
मैं तो जीवन हारी
अब न आए किसी की बारी
माली की कैसी लाचारी
ममता सहमी
किस दर जाएँ 
कैसे पाएँ फिर से उसको
कैसे न्याय दिलाए
नहीं सूझता ठौर
आया कैसा दौर
गिद्ध दृष्टि घात लगाए
घूमें गली-गली
कैसे पनपे हाय!लली
देर न कर अब
उठना होगा 
वरना हाथों को मलना होगा 
मेरी-तेरी भूल,
खड़े हो साथ
-0-


Tuesday, June 25, 2019

892-अक्षर नहीं मरा करते हैं


[1193 में बख़्तियार खिलज़ी ने भारतीय  ज्ञान के प्रति  ईर्ष्यावश नालन्दा विश्वविद्यालय के पुस्तकालय में आग लगवा दी। विश्व की उस समय की इस सर्वोच्च संस्था में  सँजोए सभी महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ जलकर ख़ाक़ हो गए। यह आग कई महीनों तक जलती रही। विद्वान् शिक्षकों  की हत्या कर दी गई। इस घटना से मन में कुछ भाव आए, जो आपके अवलोकनार्थ प्रस्तुत हैं।]
 रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

चाहे ख़िलजी लाखों आएँ
नालन्दा हर बार जलाएँ
धू -धू करके जलें रात- दिन
अक्षर नहीं जला करते हैं।

विलीन हुए  राजा और रानी
सिंहासन  के उखड़े पाए
मुकुट हज़ारों मिले धूल में
बचा न कोई अश्क बहाए।

ग्रन्थ फाड़कर आग लगाकर
बोलो तुम क्या क्या पाओगे
आग लगाकर  तुम खुशियों में
खुद भी इक  दिन जल जाओगे।

नफरत बोकर फूल खिलाना
बिन नौका  सागर तर जाना
कभी नहीं होता यह जग में
औरों के घर बार जलाना।

जिसने जीवन दान दिया हो
उसे मौत की नींद सुलाना
जिन ग्रन्थों में जीवन धारा
बहुत पाप है उन्हें मिटाना।

ख़िलजी तो हर युग में आते
इस धरती पर ख़ून बहाते
मन में बसा हुआ नालन्दा
लाख मिटाओ मिटा न पाते।

आखर -आखर जल जाने से
ये शब्द नहीं  मिट पाते हैं
भाव सरस बनकर वे मन में
अंकुर बनकर उग जाते हैं
जीवन जिनका है परहित में
कब  मरण से डरा करते हैं।
मरना है इस जग में सबको
अक्षर नहीं मरा करते हैं।

-0-