पथ के साथी

Tuesday, January 26, 2016

611



1-प्रदीप कुमार शर्मा

1-इंतज़ार

सुबह से रात
सरहद पर खड़ा है वो
लिये
औरों की नींदों की सौगात
जबकि धुल गया काजल
उसके इंतज़ार में
दो जागती आँखों का !
-0-
2-राष्ट्र का गुरूर

एक सरहद
देशभक्ति को पार करती हद
जिसमें सर
झुकता नहीं
कटाना मंज़ूर है
एक वीर
राष्ट्र का गुरूर है |

-0-
प्रदीप कुमार शर्मा
जन्म: दिल्ली
शिक्षा: एम. ए( हिन्दी), एम. बी . ए
सम्प्रति: हिंदी अनुवादक ( सूबेदार मेजर ),सी. आर .पी. एफ
-0-
2-ज्योत्स्ना प्रदीप
1
आज़ाद हैं हम ,
अपना संविधान है,
फिर भी कुछ कमी हैं -
जो कर गए देश हवाले अपने
उनकी यादें.. दिल में
बर्फ सी जमीं हैं ,
आओ !उन यादों को
कुछ इस तरह पिघलाएँ
कि अँधेरे भी..
रौशनी के गीत गाएँ
-0-

Sunday, January 24, 2016

610



1-काफिर- श्री सुबोध ( पूर्व अंग्रेज़ी-प्रवक्ता)

जो मानवता के दुश्मन है
वोही जग मे काफिर है
जो नव युवको को केवल
मौत का पाठ पढ़वाता है
स्वयं को छोड़ कर जग में
सबको काफ़िर बतलाता है
तू ख़ुद ही सोच जरा मन में
जीवन दान जब तुझे मिला
तब भी ओ मानव हित में
क्या तेरा नही ईमान हिला
जिसको तू धर्म कहता है
वो धर्म नही हो सकता है
मर्महीन होकर अब तू
यूँ ही बकता फिरता है
जब जग में न जीवन होगा
क्या तू ही बच पागा
निर्दोषो को पायेगा
तेरी मनसा न पूरी होगी
कितना चाहे जोर लगा ले
तू धर्म क्या बचा सकता
ख़ुद को ही तू आज बचा ले
भारत फिर भी भारत है
परसेवा है आदत जिसकी
पीड़ित की सेवा करना
नीति सदा रही इसकी
दमन अमन का करते हो
दमन तुम्हारा ही होगा
निर्दोष छात्र जो मारे तुमने
अब दण्ड भुगतना ही होगा
आतंकी का न धर्म कोई
तेरी इंसानियत सोई है
इंसानियत के दुश्मन तुम
सोचो अब तेरा क्या होगा
न हिन्दू मुस्लिम काफिर है
न सिख ईसाई काफिर  है
जो मानवता का दुश्मन है
बस वो ही इंसा काफिर  है
-0-दरपुर, ऊधम सिंह नगर उत्तराखण्ड

2-कृष्णा वर्मा
1
कब क्यूँ और कैसे
बदला वजूद
वजह तलाशती
लगातार
रिसती रहीं स्मॄतियाँ।
कसमसाया मन
भर गया गुब्बार
झप्प से बुझा जो
आशाओं का दीप
कर गया आबनूसी
भीतरी दीवारें।
साथ ना देते
फिसल रहे थे
एकतार
ज़ुबान की हथेली से
शून्य होते शब्द।
अफ़सोस ओढ़े बैठी थीं
दो आँखें
हलदियाए चेहरे पर।
साँसों की पटरी पर
बेदम भाग रही थी
ज़िंदगी
और पसर गया था
सन्नाटा
बेरंग होंठों के घाट।
सोच के आँगन में
मौन को तोड़ती
साँसों की
आवाजाही के
कदमों की आहट
दे रही थी
मेरे ज़िंदा होने का।
सबूत।
-0-
2-मुठ्ठी भर उजियारे-कृष्णा वर्मा

जीवन के द्वंद्वों से मैंने
कभी ना मानी हार
विपदाओं से लड़-भिड़ के
की इक-इक सीढ़ी पार
शांत कहाँ भीतर बहती
लावे की सदा नदी
लगातार दे ख़बर ताव की
साँसों तपी लड़ी
ओढ़ा चिंताओं को बिछाया
पोर-पोर दुख का सहलाया
साथ ना छोड़ा उम्मीदों का
तब जा टुकड़ों में सुख पया
चहल-पहल खुशियों के सपने
आँखों बीच सजाए
चक्रवात के बीचों-बीच
हवा के महल बनाए
हमने अँधियारी रातों को
काटा गिन-गिन तारे
यूँही नहीं मिले मुठ्ठी भर
जीवन में उजियारे।
-0-

Friday, January 22, 2016

609



कविताएँ
1-शब्द
  प्रियंका गुप्ता
कौन कहता है
शब्द बेजान होते हैं ?
दफ़न हों सीने में
तो
घुटती हैं साँसें
बाहर निकल भी अक्सर
वार करते है
और
मार देते हैं
किसी न किसी को
या फिर
जब घुटते रहते हैं भीतर ही
खुद मर जाते हैं
अपनी इच्छाओं/ भावनाओं समेत
उनकी मौत पर कोई नहीं रोता
सिवाय दिल के;
तो चलो, कागज़ पर उकेरें
कुछ आड़ी-तिरछी सी लकीरें
नाम दें उन्हें शब्दों का
उड़ेल दें उनमें थोड़ी प्राण वायु
ताकि फिर कभी
जब वो मरें
तो सनद रहे
कभी वो भी थे ज़िंदा...।
-0-
2-यादों के धागे
प्रियंका गुप्ता

यादों के धागों से
बाँध रखे हैं कुछ लम्हें
जेबों में सम्हाल के रखे हुए
खनकते हैं गाहे-बगाहे
जेबें भारी हो रही
मेरे मन की तरह
सोचती हूँ
वक़्त से उधार ले लूँ
एक गुल्लक
सब लम्हें वहीँ जमा कर दूँगी
और जब होऊँगी तन्हा कभी
गुल्लक से निकालूँगी यादें
रूरत भर को
और फिर
तुम्हारे आने पर
हम कर देंगे वापस वो लम्हें
गुल्लक में;
कुछ ब्याज तो दोगे न तुम ?
-0-