पथ के साथी

Thursday, April 9, 2020

969


प्रीति अग्रवाल ‘अनुजा’( कैनेडा)
1.
फ़िलहाल तो ख़्वाबों पर पहरे नहीं हैं
तुमने आना- जाना  क्यों कम कर दिया है?
2.
हमने हाल अपना, ज़रा हँसके क्या टाला
तमाशे का ज़माने को, सामाँ मिल गया है!
3.
बहरहाल न शिकवा कोई, और न ही गिला है
बस, हाल कहते जिससे, वो शख़्स न मिला है!
4.
मेरे हाल पे अश्क बहाने वालो !
मगरमच्छ भी तुमसे हैं तौबा करते!
5.
एक ही बोली में बरसों बतियाए
न तुम हमें समझे, न हम ही समझ पाए!
6.
मीलों चले तन्हा, न थके न ऊबे
दो कदम तुम्हारे साथ, दुश्वार हो गए!
7.
मेरे हमदम, तेरा साथ था कितना मुबारक
र तय हुआ कब, खबर ही नहीं!
8.
जब भी चाहो, चुपचाप चले जाना
तुम्हारे कदमों की आहट से मैं जान लूँगी !
9.
खिड़कियों में न झाँकके, दिलों में झाँका होता
ज़माने का जो हाल है, वो हाल फिर न होता!
10.
इन किनारों का मुक्कदर भी हमारा-सा है
साथ चल तो पड़े, पर मिलेंगें नहीं।
11.
ये जो तुम बिन कहे, मेरी बात समझ जाते हो
लगता है, मुझसे ज्यादा, मुझ से वाक़िफ़ हो!
12.( दोहा )
'मैं, मेरा, मुझको' यही, रटन लगी दिन रात
आठ पहर कुल थे मिले, बीत गए हैं सात!!
-0-
2- दोहे
सविता अग्रवाल 'सवि', कैनेडा
1
कोरोना है चल रहा, टेढ़ी गति की चाल
घर बैठा मानव डरा, मिली न अब तक ढाल ।।
2
दानव- सी आकर  खड़ी, कोरोना की पीर ।
विपदा की कैसी घड़ी, तरकश में ना तीर ।।
कोरोना घातक बना, छाया है कुहराम 
मन ही मन सब भज रहे, ईश्वर का ही नाम ।।
4
जग सारा भयभीत हैबीमारी की मार ।
घर के अन्दर क़ैद हैं, होकरके लाचार ।।
5
छेड़-छाड़ तुम ना करोकरो प्रकृति का मान ।
तोड़ोगे जो रीत तो, टूटेगा अभिमान ।।  
-0-

Tuesday, April 7, 2020

968


दस्तक दे दी है  
शशि पाधा

दस्तक दे दी है  
फिर से 
फ़ोटो-शशि पाधा
वसंत ने  
उसे शायद पता नहीं  
कि
धरती जूझ रही है 
अनजान दुश्मन से 
पहाड़ खड़े हैं 
हैरान–बेजान 
नदियाँ–सागर 
पूछ रहे हैं
जटिल  प्रश्न 
हाथ मलता देख रहा है  
आसमान 
और दुश्मन 
चुपके से कर रहा है
 प्रहार,आघात
ओ रे वसंत! 
तुम्हारे पास तो होगी न  
कोई छड़ी, जादू की------- 
सुन रहे हो न ??????
 वह छड़ी घुमा दो
जितने भी पतझरी प्रयास हैं,
उन्हें भगा दो !
-0-

Monday, April 6, 2020

आवेग है इसमें

 डॉ.कविता भट्ट

 1

 अजब सा दौर है, अजब दस्तूर है,

ग़म की स्याही में शख़्स हर चूर है।

जीने के वास्ते, तुम गीत गाते रहो-

जिंदगी प्यार है और मुस्कराते रहो।

 

बहुत मशगूल हैं, अब शहर दोस्तों,

घर किसी के कोई आता-जाता नहीं।

मेरे घर आओ तो- ये तुम्हारा ही है,

और कभी मुझे भी घर बुलाते रहो।

 

माना कि रोटियाँ हैं जरूरी मगर,

लोग खुश वे भी हैं, दो कमाते हैं जो।

चुस्कियाँ चाय की, सुर मिलाते रहो।

जिंदगी प्यार है और मुस्कराते रहो।

-0-

2-मेरे भीतर

 

मेरे भीतर

जो चुप -सी नदी बहती है

वेग नहीं, किन्तु आवेग है इसमें

बहुत वर्षों से-

डुबकी लगा रही हूँ

अपने को खोज न सकी अब भी

न जाने किस आधार पर

मैं अपने जैसे-

एक साथी की खोज में थी।

स्त्री समुद्र है

 डॉ.कविता भट्ट

1

उसके पास रोटी थी,

किन्तु भूख नहीं थी।

मेरे पास भूख तो थी,

किन्तु रोटी नहीं थी।

 

खपा वह भूख के लिए,

मिटा मैं रोटी के लिए।

भूख-रोटी दो विषयों पर,

बीत गए युग व युगान्तर।

 

संघर्ष रुका नहीं अब भी,

समय तो धृतराष्ट्र था ही।

किन्तु; प्रश्न तो यह है भारी

इतिहास क्यों बना गान्धारी ?

2

 हाँ स्त्री समुद्र है- उद्वेलित और प्रशान्त

मन के भाव ज्वार-भाटा के समान

विचलित और दुःखी करते हैं उसे भी

हो जाती है जीवमात्र कुछ क्षणों के लिए।

किन्तु; पुनः स्मरण करती है; कि

वह है- प्रसूता, जननी और पालनहार

पुरुष- अपने अस्तित्व के लिए भी

निर्भर है सूक्ष्म जीव सा- इसी समुद्र पर

दोहराता रहता है- भूलें-अपराध-असंवेदनाएँ

प्रायश्चित नहीं करता, किन्तु फिर भी

विश्राम चाहता है- स्त्री के वक्षस्थल में

विशाल हृदया स्त्री क्षमादान देती है

समेट लेती है- सब गुण-अवगुण

समुद्र के समान- प्रशान्त होकर

और चाहती है कि ज्वार-भाटा में

सूक्ष्म जीव का अस्तित्व बना रहे।

-0-

Sunday, April 5, 2020

967-दीप जलाएँ


1-ज्योति जगाएँगे
  रामेश्वर काम्बोज हिमांशु

शुभ संकल्प हृदय में जागें, दुनिया को सुखी बनाएँगे।
रोग-शोक घर-घर से भागें, मिल ऐसी ज्योति जगाएँगे।

दीप हमारे मन की ताकत, आशा का उजियारा है।
दीप नाश की कालरात्रि का, हर लेता हर अँधियारा है।
घर जलाने वाले  कभी क्या,  आँगन में दीप जलाएँगे?
जो मरघट में पूजा करते, वे  गीत नाश के गाएँगे।

जिनके मन की दया मरी है, अब उनका शोक मनाना क्या!
परहित जिनके लिए पाप है,  उनके नाम गिनाना क्या!
विष-बाणों से करें आरती, अब उनको क्या समझाएँगे!
हम तो उजियारे के रक्षक,  जो सिर्फ रोशनी लाएँगे।
-0-
 2- दीप जलाएँ
डॉ. शिवजी श्रीवास्तव

आओ साथी 
मिलकर हम सब 
दीप जलाएँ !

आशंकाएँ तैर रही हैं
समय विकट है,
आज मनुजता पर लगता
गहरा संकट है;
सहमे-सहमे -से 
लोग खड़े है,
मौसम ने भी अनायास 
तेवर बदले हैं
झंझावाती आँधी की 
भीषण बेला में
आओ साथी 
हम मधु ऋतु के गीत सुनाएँ
हर गवाक्ष पर एक दीप
जब मुस्काएगा
कैसा भी हो घना तिमिर
छँट ही जाएगा
मायावी वृत्तियाँ स्वयं
भय से भागेंगी
वेद।-ऋचाएँ हर आँगन में
फिर जागेंगी
हर ड्यौढ़ी में नित प्रति ही 
छूटें फुलझड़ियाँ
हम सब मिलकर
यूँ प्रकाश का पर्व मनाएँ !
-0-
3-गुंजन अग्रवाल

जीवन मे जब भी कभी, दुख का हो अहसास।
जला दीप लोबान का, जाना शिव के पास।
जाना शिव के पास, उमापति वो त्रिपुरारी।
पल में हरदें कष्ट, सभी भोले भंडारी।
जय हो भोले नाथ,शिवालय होती गुंजन
जाना शिव के द्वार, कष्ट यदि आ जीवन।
-0-

Saturday, April 4, 2020

966-डॉ. रत्ना वर्मा की कविताएँ


डॉ. रत्ना वर्मा ( सम्पादक उदन्त्ती मासिक  http://www.udanti.com/)

1.ये पता ना था 

ये तो पता था कि
मौत तो इक दिन आनी है
जो उम्र लिखा है ओ जीना है 

पर ये ना पता था
कि 
यूँ चुपके से आ जाएगी
बिना किसी से कुछ कहे सुने
चुपके से ले जाएगी 

अपनों से गले मिलने का 
मौका दिए बगैर 
उन्हें 
बिना देखे बिना सुने 
अलविदा कैसे कह दें 

ये कैसी लड़ाई है 
अपने आप से 
जीने-मरने का
हिसाब करने का 
वक्त तो दो 

ऐसे कैसे आ सकती हो 
बगैर दस्तक दिए 
यूँ ही चुपचाप
-0-
2.कह दो

हवाओं से कह दो
तुम भी 
बहो ज़रा सम्भलके
इंसान की बदनियती ने
घोल दिया है ज़हर ।
तुम तो हर कण में बसे हो 
भला हमें छूऐ बगैर 
कैसे  बहोगे ।

मेरा बस चले तो 
तुम्हें भी बंद कर लूँ 
अपने घर के एक कमरे में
21 दिन बाद 
खोल दूँगी खिड़की दरवाज़े
फिर बहना पंख फैलाकर 
बेख़ौफ़
जहाँ तहाँ , यहाँ वहाँ ।
-0-
3. चिरैया

इन दिनों 
मेरे  आँगन  की चिरैया भी 
चहकने से डरने लगी ।
वह आदी नहीं है 
इस सन्नाटे की
दाना डालो तो 
इधर- उधर तकती हुई 
चौकन्ना होकर
एक दाना चुगती है 
और फुर्र से उड़ जाती है ।

दूर किसी पेड़ की डाल पर बैठी 
टटोलती है 
हम इंसानों की हरकतों को
जैसे पूछ रही हो
क्यों छिपा लिया है चेहरा तुमने 
क्या किया है कोई अपराध
या है पकड़े जाने का डर ।

यदि जीना है बेख़ौफ़ 
तो आ जाओ  हमारी 
दुनिया में
और उड़ जाओ 
जहाँ भी मन चाहे 
ना कोई रोकेगा ना कोई  टोकेगा 
-0-
4.आज की सुबह

रोज़ सुबह 
बगीचे में खिले 
रंग- बिरंगे फूलों को देख 
मन भी खिल उठता था 

पर आज 
फूल भी कुछ उदास थे 
रंग भी उनका कुछ
मुरझाया-सा था ।

तितली और भौंरे भी 
पास आने से कतरा रहे थे 

हवा मद्धम मद्धम 
बह तो रही है 
पर  जैसे 
उनकी गति पर भी 
कर्फ्यू का पहरा लगा हो 

क्या उन्हें भी 
अहसास हो गया है 
इस सन्नाटे का राज़ 

और 
थोड़ी दूरी बनाते हुए 
आ गए हैं 
हमारा साथ देने 
लॉक डाउन 
का पालन करने ।

-0-
5. तितली 

एक तितली ना जाने कैसे 
आज 
कपड़ों के संग भीतर आ गई
मैं घबरा गई
झटका देने पर भी 
नहीं उड़ी 
मैंने धीरे से पकड़ा
और
एक गमले में 
फूलों पर बैठा दिया
वह उड़ नहीं पाई 
पर 
अपने खूबसूरत
रंग- बिरंगे पंख 
बंद करके खोल रही थी 
मैंने  प्रार्थना की उसके लिए 
कहा 
बीमार होने की सजा 
तुम्हें नहीं मिल सकती 
फूलों का रस ले 
और 
उड़ आसमान की खुली हवा में 
घर के भीतर रहने की सज़ा तो 
हम इंसानों को मिली है !
फिर 
मैंने डरते हुए 
बाहर झाँका 
मन ही मन मनाती रही 
और 
मेरी मन की मुराद पूरी हुई 
तितली उड़ गई थी ।
-0- udanti.com@gmail.com