पथ के साथी

Monday, August 29, 2016

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लोक-शैली रसिया पर आधारित रमेशराज की दो तेवरियाँ
1
रमेशराज
मीठे सोच हमारे, स्वारथवश कड़वाहट धारे
भइया का दुश्मन अब भइया घर के भीतर है।

इक कमरे में मातम, भूख गरीबी अश्रुपात गम
दूजे कमरे ताता-थइया घर के भीतर है।

नित दहेज के ताने, सास-ननद के राग पुराने
नयी ब्याहता जैसे गइया घर के भीतर है।

नम्र विचार न भाये, सब में अहंकार गुर्रा
हर कोई बन गया ततइया घर के भीतर है।

नये दौर के बच्चे, तुनक मिजाजी-अति नकनच्चे
छटंकी भी अब जैसे ढइया घर के भीतर है।
2
खद्दरधरी पट्ठा, जन-जन के अब तोड़ें गट्टा
बापू के भारत में कट्टा देख सियासत में।

तेरे पास न कुटिया, तन पर मैली-फटी लँगुटिया
नेताजी का  ऊँचा अट्टा देख सियासत में।

तेरी मुस्कानों पर, रंगीं ख्वाबों-अरमानों पर
बाजों जैसा रोज झपट्टा देख सियासत में।

खुशहाली के वादे, तूने भाँपे नहीं इरादे
वोट पाने के बाद सिंगट्टा देख सियासत में।
-0-

परिचय रमेशराज
पूरा नाम-रमेशचन्द्र गुप्त
पिता- लोककवि रामचरन गुप्त
जन्म-15 मार्च 1954, गाँव-एसी, जनपद-अलीगढ़
शिक्षा-एम.ए. हिन्दी, एम.ए. भूगोल
सम्पादन-तेवरीपक्ष [त्रैमा. ]
सम्पादित कृतियाँ-1-अभी जुबाँ कटी नहीं,2. कबीर जि़न्दा है ,3. इतिहास घायल है,
4-एक प्रहारः लगातार [ सभी तेवरी संग्रह ]
स्वरचित कृतियाँ-रस से संबंधित-1. तेवरी में रससमस्या और समाधान 2-विचार और रस [ विवेचनात्मक निबंध ] 3-विरोध-रस 4. काव्य की आत्मा और आत्मीयकरण
तेवर-शतक-लम्बी तेवरियाँ-1. दे लंका में आग 2. जै कन्हैयालाल की 3. घड़ा पाप का भर रहा 4. मन के घाव नये न ये 5. धन का मद गदगद करे 6. ककड़ी के चोरों को फांसी 7.मेरा हाल सोडियम-सा है 8. रावण-कुल के लोग 9. अन्तर आह अनंत अति 10. पूछ न कबिरा जग का हाल
शतक-1.ऊघौ कहियो जाय [ तेवरी-शतक ] 2. मधु-सा ला [ शतक ]3.जो गोपी मधु बन गयीं [ दोहा-शतक ] 4. देअर इज एन ऑलपिन [ दोहा-शतक ] 5.नदिया पार हिंडोलना [ दोहा-शतक ] 6.पुजता अब छल [ हाइकु-शतक ]
मुक्तछंद कविता-संग्रह-1. दीदी तुम नदी हो  2. वह यानी मोहन स्वरूप
बाल-कविताएं- 1.राष्ट्रीय बाल कविताएं
प्रसारण-आकाशवाणी मथुरा व आगरा से काव्य-पाठ
सम्मानोपाधि- ‘साहित्यश्री, उ.प्र. गौरव, तेवरी-तापस, शिखरश्री
अभिनंदन-सुर साहित्य संगम [ एटा ] , शिखर सामाजिक साहित्कि संस्था अलीगढ़
अध्यक्ष-1.सार्थक सृजन [ साहित्यक संस्था ] 2.संजीवन सेवा संस्थान ;सामाजिक सेवा संस्था 3.उजाला शिक्षा एवं सेवा समिति [ सामाजिक संस्था ]
पूर्व अध्यक्ष-राष्ट्रीय एकीकरण परिषद, उ.प्र. शासन, अलीगढ़ इकाई
सम्प्रति-दैनिक जागरण से स्वतंत्र पत्रकार के रूप में सम्बद्ध
सम्पर्क-15/109, ईसानगर, निकट-थाना सासनी गेट, अलीगढ़[ उ.प्र. ]
मोबा. 09634551630
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Thursday, August 25, 2016

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सुनीता काम्बोज

तेरी प्यास मुझको तेरी आरजू
इधर तू ही तू है, उधर तू ही तू

मेरे श्याम सुंदर मेरे साँवरे
ये नैना तुम्हारें लिए बावरे
मुझे हर घड़ी है तेरी जुस्तजू
इधर...

ये चाहत है दिल की कभी बात हो
तुम्हारी हमारी मुलाकात हो
कभी तो मिलो और करो गुफ्तगू
इधर ....
निराशा में आशा कन्हैया बने
सुनीता सदा वो खेवैया बने
बचाते रहे तुम सदा आबरू

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659



1-सुन लो कान्हा बात हमारी- योगेन्द्र नाथ शर्मा अरुण
     
हे नटनागर,कृष्ण,कन्हैया,रास रचैया,गोवर्धन धारी!
हे मन मोहन,राधा के प्रिय,हे मुरलीधर, श्यामविहारी!!
सारे जग के पालक हो तुम, तुम्ही सभी कष्टों के हर्ता,
फिरसे आओ यहाँ प्रभु तुम,सुनलो कान्हा बात हमारी!
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2- ओ कन्हैया !
गिरीश पंकज

पता नहीं किस नंदनवन में ,
भ्रमण कर रहे किसन-कन्हैया।
लेकर के अवतार प्रभु तुम,
आज बचा लो अपनी गैया।।

बढ़ते जाते असुर यहाँ पर,
देवों का हो गया पलायन।
'गीता' को सब भूल गए हैं ,
स्वार्थ का इकतरफा गायन।
कंस रूप धर कर के नाना,
करता मानो ता-ता- थैया।।

मुरली की धुन सुनकर तेरी,
गऊ माता इठलाती थी।
चारा चरती थी जंगल में,
और सुखी हो जाती थी।
आज कहाँ चारा-सानी अब ,
कचरा किस्मत में है भैया।

आ जाओ अब कान्हा मेरे,
'यमुना' का उद्धार करो।
एक नहीं अब कंस हजारों
वध करके उपकार करो।
गोकुल जैसा देश बना दो,
कहती है तुझसे हर मैया।
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3-कुण्डलिया-अनिता ललित

भाई है तेरी शरण, सुन लो आज पुकार
मुझको पार उतारना, कान्हा मैं मँझधार
कान्हा मैं मँझधार, न तुम बिन जग में कोई
छेड़ो ऐसी तान, रहूँ मैं तुझमें खोई
मोर-मुकुट मुख सजे, चपल मुस्कान लुभाई
भूलूँ सुख-दुख सभी, निहारूँ छवि मनभाई !!
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2

जब-जब फैला है तमस, तब-तब किया उजास ।

अपनों का जमघट, मगर; हो इक तुम ही पास॥

हो इक तुम ही पास, न दूजा और सहारा ।

तुम ही हो पतवार, बही जब आँसू-धारा ॥

मन कलुषित की हार, नयन में नेह लबाबब ।

धडकन बनी तरंग, मगन कान्हा में दिल जब !!
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