पथ के साथी

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Monday, March 19, 2018

808-शुभ जन्मदिवस !!


 सुनीता काम्बोज 
जन्म-दिवस ये आपका , जैसे हो त्योहार 
माँगू खुशियाँ आपकीरब से बारम्बार ।।
दिल है गंगा नीर -सापावन मन के भाव 
बन जाते  पतवार होखेते सबकी नाव ।।
उड़ने को अम्बर दियाभरी परों में जान ।
ऐसा लगता हो गया, हर रस्ता आसान ।।
आप सभी की राह सेचुनते आए शूल ।         
गुरुवर अर्पित आपकोये भावों के फूल ।।
आप सभी की राह सेचुनते आए शूल ।
सदा बुराई से लड़ेझुकना नहीं कबूल .........

हिमांशु जी के प्रति -
ज्योत्स्ना प्रदीप

पूर्ण चंद्र  सा जिसका हृदय
पवित्र नयनों  में स्नेह -संचय
हिम के जैसा शीतल -शीतल
विरल प्रीत का ले गंगाजल
सुकर्मों का रामेश्वरम-सेतु
नमित हो मन ऐसे गुरु हेतु ..................

आदरणीय  भैया जी को जन्म-दिवस के अवसर पर सब प्रकार से सुखी , स्वस्थ , यशस्वी , दीर्घायु जीवन की हार्दिक शुभकामनाएँ !!

  -सुनीता काम्बोज , ज्योत्स्ना प्रदीप एवं सभी बहनें




                             




Sunday, December 31, 2017

785

1-डॉ0 कविता भट्ट  

रात का रोना तो बहुत हो चुका ,
नई भोर की नई रीत लिखें अब।

नहीं ला सकता  है समय बुढ़ापा ,
युगल पृष्ठों पर  हम गीत लिखें अब ।

नहीं हों आँसू  हों नहीं  सिसकियाँ,
प्रेम-शृंगार और प्रीत लिखें अब।

दु:ख- संघर्षों  से हार न माने ,
वही भावाक्षर मन मीत लिखें अब।

समय जिसे  कभी  बुझा  नहीं  पाए
हम वह जिजीविषा पुनीत लिखें अब

कभी हार न जाना ठोकर खाकर,
पग-पग पर वही उद्गीत लिखें अब।

काल -गति से  कभी बाधित न होंगे
आज कुछ इसके विपरीत लिखें अब।

यही समय हमारा नाम लिखेगा ,
सोपानों पर नई जीत लिखें अब।
-0-[हे0न0ब0गढ़वाल विश्वविद्यालय,श्रीनगर (गढ़वाल),उत्तराखण्ड]

2-सुनीता काम्बोज

नए साल में, नई धुनों पर
नए तराने गाएँगे
आगे बढ़ते जाएँगे

लक्ष्य निर्धारित कर अपना
दृढ़ निश्चय से बढ़ते जाना
आशाओं की  पकड़ी डोरी
घोर निराशा से टकराना
जिसे ज़माना याद करेगा
काम वही कर जाएँगे
नए---

मुरझाए रिश्तों में साँसें
भरने का दम रखते हैं
ठान लिया जो मन में उसको
करने का दम रखते हैं
नई चुनौती नई योजना
 ऊर्जा से भर जाएँगे
नए--

कुछ नूतन किसलय फूटेंगे
सूने मन की डाली पर
जो हैं सूखे ताल ,सरोवर
देंगे अब कर्मों से भर
तम को अपना दास बनाकर ,
नया सवेरा लाएँगे
नए--

-0-

Saturday, October 28, 2017

772

मुक्तक
1-सुनीता काम्बोज 
वो क्या अपने जो देते हैं,चोट हमेशा
ले लेते हैं रिश्तों की वो,ओट हमेशा
सभी खूबियाँ जग वो, गिनवाते हैं
उनको मेरे अंदर दिखते खोट हमेशा
2
कभी  हो प्यार की बातें , कभी तकरार की बातें
कभी हो जीत की बातें, कभी हो हार की बातें
गुजर जाएगी बातों में हमारी जिंदगी सारी
कभी इस पार की बातें, कभी उस पार की बाते
3
जब मन का ये खालीपन भर जाएगा
लौट परिंदा अपने ही घर जाएगा
भारी पत्थर डूब गए गहराई में
लेकिन तिनका लहरों पर तर जाएगा
4
तेरी आँखों में वो चाहत समर्पण ढूँढती हूँ मैं
समन्दर से मिले गंगा वो अर्पण ढूँढती हूँ मैं
मेरी हद से बढ़ी दीवानगी का ही सबब है ये
तेरी सूरत बसी जिसमें वो दर्पण ढूँढती हूँ मैं
 -0-

नई कलम

सरहद पर एक जवान
इरशाद

जी रहे हैं इस पल को
    कोई तो अपना सहारा होगा
हमारे होंठों की खुशी की खातिर
    सरहद पर मर रहा होगा ।

छोड़ कर आया माँ की रोटी
    वो भी कहीं रोया होगा
अपने एक वतन की ख़ातिर
    सब अपना खोया होगा ।

याद करो एक बार उसको
    किसी का वो भी लाल होगा
आंसू तो बहाआे तुम अपना
नही तो उसका अपमान होगा ।

बहन भी करती होगी दुआ
    भाई भी तो रोया होगा
बाप टूट कर हार गया
    क्या यह देश रोया होगा ।

वो भी कफन में रोता होगा
    देख देश कहानी को
देश तो आज़ाद हो गया
    पर गुलाम है आज भी जवानी तो ।             
-0-

2- सहती बेटी-           

       -इरशाद

जब वो छोटी गुड़िया थी 
    न किसी की प्रिया थी 
सब घूरा करते थे उसको ;
    क्योंकि वो एक बेटी थी ।

फिर भी उसे कलंक कहा गया
    बिना कहे सब सहती थी
कुछ न दिया समाज ने उसको
    क्योंकि वो एक बेटी थी ।

बेटा तो सब छोड़ गया
   माँ उसे समझाती थी
जब रहा न कोई भी अपना 
   वही लाठी बन जाती थी ।

पढ़ने से उसे रोका जाता
    गृहिणी कहलाती थी
सारी खुशियां छीन ली उसकी
    क्योंकि वो एक बेटी थी ।

विधवा जब वो हो गई
    कलंक वाहिनी कहलाती थी  
धिक्कारा करता समाज ये उसको
    क्योंकि वो एक बेटी थी ।

करूँ प्रार्थना समाज से
    नहीं पूजना कोई देवी
छोड़ भी दो ये भेदभाव
    मान लो बस उसको बेटी
-0-
सम्पर्कसुपुत्र मो० इकबाल,  979/7 अशोक विहार  कॉलोनी बेरी वाली मस्ज़िद,                               पानीपत, (132103)-   Irshad Malik <irshadmalik1135@gmail.com>

-0-

Monday, May 29, 2017

741

चौपाई छंद
1-सुनीता काम्बोज
  
सरहद पर है गोलाबारी
करें सियासत खद्दरधारी

फिर सड़कों में गढ्ढ़े भारी
पैसा कहाँ गया सरकारी

चमचों ने ही नाव चलाई
डूब गई फिर से खुद्दारी

गलियों में बारूद बिछा है
घर की कर लो चारदीवारी

अब ये कौन खजाना लूटे
चोर करेंगे पहरेदारी

कैसे दर्शन कर लूँ तेरा
खाली है अब जेब हमारी

आज सुनीता दिन वो आया
जब दुश्मन ने बाजी हारी
-0-

2-रेनू सिंह

मातु यशोदा के तुम लाला।
बाबा नंद प्रेम से पाला।।
मोहक छवि है बसती आँखों।
उड़ती ऊँची हूँ बिन पाँखों।।
गोप ग्वाल सब सखा तुम्हारे।
आकर मेटो दुःख हमारे।।
बंसी की धुन सबको भाती।
याद मुझे यमुना तट लाती।।
वस्त्र चुराते माखन खाते।
लुक छिप सारा नेह दिखाते।।
चुन लो सेवक अपनी दासी।
दरसन दो मथुरा के वासी।।
-0

Thursday, February 23, 2017

709



समीक्षा

कवयित्री- डॉ. ज्योत्स्ना शर्मा द्वारा रचित दोहा संग्रह "महकी कस्तूरी

सुनीता काम्बोज
दोहा पुरातन छंद है ।कम शब्दों में गहरा अर्थ प्रकट हो यही दोहे की विशेषता है ।छन्दों के उपवन में दोहा   गुलाब प्रतीत होता है जो रचनाकार को अपनी ओर आकर्षित करता है  । डॉ. ज्योत्स्ना शर्मा  जी का दोहा संग्रह  महकी कस्तूरी पढ़कर जो अनुभूति  हुई उसे शब्दों में ढालने का प्रयास किया है ।आज के परिवेश में मन की गहराई से दोहा गढ़ने वालों की सख्या बहुत कम है ।किसी छंद को रचने के लिए शिल्प पक्ष बहुत अनिवार्य है । परन्तु भाव पक्ष अगर कमजोर है हो तो  छंद निष्प्राण प्रतीत होते हैं। डॉ ज्योत्स्ना जी के दोहे शिल्प और भाव पक्ष  की दृष्टि में उत्तम हैं । दोहों में सुन्दर शब्द संयोजन से ऐसा लगता है , जैसे ठण्डी आहें भरते दोहे को संजीवन प्रदान कर दी हो । उनके गहन भावों ने मन को अभिभूत कर दिया ।
चाहें जीवन की सच्चाई हो या कान्हा का प्रेम ,राजनीति हो या प्रकृति के रंग ,रिश्तों का  प्रेम  हो  संस्कार व मर्यादा, नारी का जीवन और त्योहारों के रंग , इत्यादि सभी मनोभावों का बहुत संजीदा ढंग से दोहे के रूप में प्रतुतीकरण  किया है । कवयित्री के  मन के सुकोमल भावों में अदभुत आकर्षण है ।
जो रचना या छंद पाठक के ह्रदय के तारों को नहीं छू पाते उसे सार्थक रचना नहीं कहा जा सकता । कवयित्री ने माँ शारदे ,सद्गुरु की वंदना के साथ साथ  कलम को निरन्तर निडर हो चलने का संदेश दिया है ।
·       पदम आसना माँ सदा,करूँ विनय कर जोर ।
फिर भारत उठकर चले, उच्च शिखर की ओर ।।
·       इस बेमकसद शोर में, कलम रही गर मौन ।
तेरे मेरे दर्द को ,कह पाएगा कौन ।।
हिन्दी के प्रति कवयित्री का स्नेह और सम्मान देखते ही बनता है । हिन्दी की पीड़ा, और हिन्दी का गौरव गान  व देश प्रेम की भावना से भरे अनोखे दोहे इस पुस्तक की शोभा दोगुनी कर देते हैं-
·       कटी कभी की बेड़ियाँ, आजादी त्यौहार ।
फिर क्यों अपने देश में ,हिन्दी है लाचार ।।
·       एक राष्ट्र की अब तलक, भाषा हुई ,न वेश ।
सकल विश्व समझे हमें, जयचन्दों का देश ।।
परिवार मनुष्य की शक्ति  है ।इस शक्ति और रिश्तों को सहेजने का प्रयास करते हुए कवयित्री ने दोहों के माध्यम से भटकते समाज को जो संदेश दिया वह प्रशंसनीय है ।माँ की ममता को यथार्थ करता ये दोहा अनुपम है -
·       माँ मन की पावन ऋचा ,सदा मधुर सुखधाम ।
डगमग पग सन्तान के,लेती ममता थाम ।।
·       खिलकर महकेगा सदा,इन रिश्तों का रूप ।
सिंचित हो नित नेह से,विश्वासों की धूप ।।
फागुन के रंग और राखी के पवित्र तार हो या इर्द की ख़ुशबू ,दीवाली की मिठास ,   कवयित्री की लेखनी ने सभी विषयों का  बखूबी चित्रण किया है ।
 कवयित्री ने जनमानस की स्थिति  को बड़ी गंभीरता से दर्शाया है ।  एक तरफ जहाँ दोहों में भावों की रसधार बहती है दूसरी तरफ पटाखों से बढ़ते प्रदूषण पर भी प्रहार किया है ।
·       इत हाथों में लाठियाँ ,उत है लाल गुलाल ।
बरसाने की गोपियाँ, नन्द गाँव के ग्वाल।।
·       जल्दी ले जा डाकिए ,ये राखी के तार।
गूँथ दिया मैंने अभी,इन धागों में प्यार ।।
·       साँस-साँस दूभर हुई ,धरती पवन निराश ।
छोड़ पटाखे छोड़ना ,रख निर्मल आकाश ।।
·       मेहनत करते हाथ को , बाकी है उम्मीद ।
रोज-रोज रोजा रहा, अब आएगी ईद।।
 डॉ ज्योत्स्ना शर्मा जी ने दोहों में  नारी की पीड़ा ,त्याग ,कोमलता और नारी शक्ति को बड़ी सहजता से दोहों में प्रकट किया है । साथ- साथ महाभारत की तस्वीर  व समाज में बढ़ते अपराध को बड़ी स्पष्टता से उकेरा है-
·       पिंजरे की मैना चकित ,क्या भरती परवाज़ ।
कदम-कदम पर गिद्ध हैं ,आँख गड़ाए बाज ।।
·       पावनता पाई नहीं,जन-मन का विश्वास ।
सीता को भी राम से,भेट मिला वनवास ।।
कवयित्री ने गाँव की महक,मौसम के अनेक रंगों को ,धरती की सुंदरता को  बड़ी खूबसूरती से दोहों में ढाला हैं इन दोहों पढ़ मन आनंद और उमंग से भर जाता है-
·       अमराई बौरा गई, बहकी बहे बयार।
सरसों फूली सी फिरे, ज्यों नखरीली नैर ।।
·       टेसू ,महुआ,फागुनी,बिखरे रंग हज़ार।
धरा वधु सी खिल उठी, कर सोलह सिंगार ।।

कवयित्री ने मानव को सावधान करने के लिए दूषित बयार ,अनाचार के ख़िलाफ़ क़लम द्वारा आवाज उठाई है। यही सच्चे लेखक का कर्तव्य भी है पर साथ -साथ  धीरज ,योग ,निष्काम कर्म करने पर भी बल दिया है-
·       माना हमने देश की ,दूषित हुई बयार।
वृक्ष लगा सद वृत्त के, महकेगा संसार
·       पग-पग पर अवरुद्ध पग, पत्थर करें प्रहार।
निज पथ का निर्माण कर,बह  जाती जल-धार ।।
कवयित्री ने इंसानियत के धर्म को सबसे ऊँचा कहाँ है , अनुभव को सच्चा मार्गदर्शक बताया है इस संग्रह के सभी दोहों में नयापन नई ऊर्जा है । इन दोहों से कवयित्री की दूरदर्शिता  गहरी संवेदना सचेतना का परिचय दिया है
कुछ  शब्दों के प्रयोग ने  इन दोहों में चार चाँद लगा दिए जैसे हवा का खाँसना , श्रम की चाशनी , कोहरा द्वारा  खरीदना , ज़िद की पॉलीथीन, दुआ का पेड़ , ये सब इन दोहों में ऐसे उपमान है जिन्हें पाठक पढ़कर नवीनता महसूस करता है । टिटुआ ,दीनदयाल के माध्यम से जनमानस का दर्द व्यक्त किया हैइन शब्दों का प्रयोग से दोहे ह्रदय तक पहुँचता प्रतीत होता है ।
·       सूरज गा विकास का , हुए विलासी लोग ।
हवा खाँसती रात दिन, विकट लगा ये रोग ।।
·       मेरे घर से आपका, यूँ तो है घर दूर।
मगर दुआ के पेड़ हैं, छाया है भरपूर ।।
·       दरवाजे की ओट में टिटुआ खड़ा उदास।
जाए खाली हाथ क्या, अब बच्चों के पास ।
जीवन की आस, प्रेरणा ,सन्देश से भरे ये दोहे मुझे ये समीक्षा लिखने को प्रेरित कर गए । डॉ. ज्योत्स्ना जी को मेरी   अनन्त शुभकामनाएँ हार्दिक बधाई । कवयित्री का पहला हाइकु संग्रह भी बहुत लोकप्रिय रहा और इस दोहा संग्रह महकी कस्तूरी को पढ़कर मुझे पूर्ण विश्वास  है , ये संग्रह जन मानस के ह्रदय में अवश्य अपना स्थान बनाएगा ।मैं डॉ . ज्योत्स्ना शर्मा जी के सफल भविष्य की कामना  करती हूँ । महकी कस्तूरी दोहा संग्रह आपकी साहित्यिक यात्रा को नई  ऊँचाई प्रदान करेगा।ईश्वर ने आपको ये लेखनी का वरदान दिया है उसके द्वारा आप ऐसे ही साहित्य की रौशनी फैलाती रहेंगी यही आशा है।शीघ्र ही  अन्य विधाओं में भी आपकी कृतियाँ पढ़ने का अवसर प्राप्त होगा ।
इस दोहा संग्रह को पढ़कर मेरे मन में ये  भाव उपजे -महकी कस्तूरी की महक में मेरे मन को भी महका दिया-
·       महकी कस्तूरी भरे , मन में एक उमंग ।
इन दोहों मे पा लिए ,  मैंने सारे रंग ।।       
·       महकी कस्तूरी तभी ,पाया ये उपहार ।
ज्योत्स्ना जी भाव ये,  छूते मन के तार ।।
·       महकी कस्तूरी मुझे,देती परमानंद ।
मन की हर इक बात को ,कहता  दोहा छंद ।।
-0-
महकी कस्तूरी  ( दोहा संग्रह):कवयित्री- डॉ. ज्योत्स्ना शर्मा ,मूल्य-180:00 रुपये
पृष्ठ-88,संस्करण :2017 ,प्रकाशक: अयन प्रकाशन , 1/20 महरौली नई दिल्ली-110030