पथ के साथी

Sunday, December 24, 2023

1392-थरथराती पलकों का मौन


रश्मि 'लहर'

  


अचानक 

एक खिलखिलाती स्मृति 

पूरे दिवस पर छाने लगी! 

यथार्थ की व्यथाओं को

दुलराने लगी।

 

मन संशय में रहा.. 

अश्रुबिंदु उलझने लगे!

असंख्य पुराने पल

तुम्हारी बाहों से गुजरने लगे।

 

एक जीवन्त मिलन

अनुभूति की जकड़न से

बाहर आने का

असंयत प्रयास करने लगा।

 

जाने क्यों

विकल वर्तमान का 

कठोर चेहरा 

अतीत के मुलायम वक्ष को

खोजने लगा।

 

चिंतन के अबोध अधरों को

थरथराने से

रोकने लगा।

 

वो प्रकंपित प्रथम मिलन की 

अजनबी ऑंखें!

वो असहज- सी

अतृप्त बातें!

 

कितने सुव्यवस्थित ढंग से

जीवन को सँजो लेती हैं न?

 

पर

 

जब-तब लुढ़का देती हैं

समय के कपोल पर

इक्का-दुक्का आँसू! 

 

उफ़! 

ये प्रेम भी न..

कमजोर करता जाता है 

विस्मरण की अजूबी डोर को! 

 

दृढ़ करता जाता है 

अनाम बन्धन के 

हर छोर को!

 

सुनो! 

एक अपूर्ण!

रहस्यमय सा..

अपरिचित स्वप्न!

क्या तुमने भी देखा है?

 

क्या अपने बँधे-बँधे हाथों में 

दुबारा मिलने की 

कोई अटूट रेखा है?

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रश्मि 'लहर'

इक्षुपुरी कॉलोनी, लखनऊ उत्तर प्रदेश

मोबाइल -9794473806

Saturday, December 23, 2023

1391-पद्म प्रतिमा (सॉनेट)

 मूल रचयिता (ओड़िआ) - इं. विष्णु साहू 

 अनुवाद - अनिमा दास, कटक, ओड़िशा 

स्वर्णिम तनु की चंद्रकिरण में तरल लास्य कर द्रवित

चिरयौवना तुम कर कामना की शिखा प्रज्जलित

मुकुलित हो तुम किसी मंजरी वन में.. हे, अभिसारिका!

नहीं हूँ कदापि भ्रमित कि भिन्न है तुम्हारी भूमिका।

 

चारण कवि की चारु कल्पना तुम तरुण तरु की छाया

नृत्यशाला की मृण्मयी हो तुम मग्नमृदा की माया

तिमिर-तट की शुक्र तारिका तुम हो मुक्ता कुटीर की  

मंजुल तुम्हारे देह-देवालय जैसे अग्नि में ज्योति सी।

 

जिसके हृदय में नहीं रही कभी कोई प्रेयसी-रूपसी 

उसे नहीं है ज्ञात कि किस सुधा से पूर्ण है काव्यकलशी 

हे,मधुछंदा! तुम्हारी सुगंध से सुगंधित मेरी नासा

मन में भर दी है तुमने भावपूरित तरल काव्यभाषा।

 

तुमने किया है परिपूर्ण  जीवन-पात्र मेरा.. हे,परिपूर्णा!

नयन में नृत्य करती छलहीन तुम्हारी पद्म प्रतिमा।

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Friday, December 15, 2023

1390

 

‌मन

संध्या झा

 


मन भावनाओं का शृंगार चाहता है।

हर क्षण तुम्हें आस-पास चाहता है।

हृदय की व्याकुलता कोई ना समझे।

तुम समझो बस इतना सा व्यवहार चाहता है।

प्रेम के अतिरिक्त जीवन में हैं भी क्या ?

चंचल मन केवल प्रेम का प्रवाह चाहता है।

ह्रदय के साथ जीवन भी अर्पित किया तुम्हें

मन तुमसे भी थोड़ा समर्पण,अधिकार चाहता हैं।

वाद-विवाद यह सब हैं तुच्छ- सी बातें ।

इन सबसे ऊपर उठे , प्रेम तो बस प्रेम का आधार चाहता हैं।

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 बेली रोड, मौर्य पथ, पटना (बिहार ) 800014 

 Email -sandhyajha198@Gmail.com

Saturday, December 9, 2023

1389

    मंथन

शशि पाधा

 

अपना-अपना भाग्य लिखाए

धरती पर हैं आते लोग

विधना जो भी संग बँधाए

गठरी भर- भर लाते लोग।

 

किस स्याही से खींची उसने

हाथों की अनमिट रेखाएँ

वेद_ पुराण पढ़े हर कोई

भाग्य नहीं पढ़ पाते लोग।

 

बीते कल की पीड़ा बाँधे

‘आज’ तो जी भर जी न पाए

भावी की चिंता में डूबे

जीवन-स्वर्ण लुटाते लोग।

 

रिश्तों  के इस  मोहजाल में

मन पंछी व्याकुल- सा रहता

जग जंजाल छोड़के सारा 

मुक्त नहीं हो पाते लोग।

 

कौन है अपना, कौन पराया

किसने कैसी रीत निभाई

मन तराजू मन ही पलड़े  

तोल- मोल कर जाते लोग।

 

सुंदर मन सुंदर यह जगति

सुंदर सृष्टि रूप-अनूप

मन दर्पण हो जिसका जैसा

वैसा चित्र   बनाते   लोग।

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Email: shashipadha@gmail.com

Monday, December 4, 2023

1388

 विजय का नाद

 सुरभि डागर 


कितने बड़े योद्धा हो तुम

अर्जुन की भाँति

क्या सारथी भी माधव‌ ही है

लड़ रहे हो बरसों से 

अपनों के विरुद्ध ही 

अदृश्य चक्र तुमको 

विजय की ओर अग्रसर

कर रहा है।

विफल हो रहीं हैं मारण क्रिया

और चूक रहे हैं विषैले वाण

ध्वस्त हो चले हैं सभी षड्यन्त्र

तुम खड़े हो अपने राज्य के समक्ष

हानि अधिक हुई; परन्तु

निःसंकोच तुम बढ़ते रहो

माना कठिन वक्त पर 

डटे रहना हथियार लिये

आगे बढ़ते रहना।

शकुनि वार छुपके ही कराएगा

और तुम निकल जाना

लाक्षागृह से सकुशल

लगा लेंगे हृदय से गिरधारी

झलक उठेंगे उनके भी नयना

कसके पकड़ लेना बाँह गिरधारी की

वे नहीं सोएँगे तुम्हारे लिए रात भर

केशव को सौंप दो स्वयं को 

और विजय का नाद सुनो ।

Thursday, November 30, 2023

1387

 तुम कहो.. मैं लिखूँ (सॉनेट)

अनिमा दास

 

मैं जीवन लिखता हूँ तुम मृत्यु लिखो, मैं उत्तर लिखता हूँ तुम पश्चिम लिखो

संताप का अर्थ एक ही है...जीवंत हो अथवा मृत..अभिशाप भी एक ही है

स्वतः आ जाए गीत तो..हर्ष व उल्लास लिखो..अथवा अधर रक्तिम लिखो

सीमाओं में परिबद्ध आशाओं का...ध्वस्त होने की कहानी... अनेक भी हैं।

 

कोई भी पर्व तुम्हे यदि प्रेम पर्व प्रतीत हो..मेरी प्रतीक्षा ही होगी चतुर्दिश

तुम म्लान मुख्यमंडल से न देखना दर्पण..गवाक्ष पर होगी एक प्रतिछाया 

उस प्रतिछाया की भाषा में मेरे कुछ अक्षर होंगे,उनकी ध्वनि होगी अहर्निश

तुम कहोगी 'मैं गाती हूँ गीत..तुम सुनो'..मैं कहूँगा 'तुम्हारे शब्दों में है माया'।

 

उस मायापाश में होगी मेरी आत्मा बद्ध..करूँगा प्रश्न मैं 'क्या यह था छल?'

तुम्हारी मौनता से अजंता की मूर्तियों में होगा कंपन..क्या तुम रहोगी मौन?

कहूँगा,'न तुम जीवन लिखो..मृत्यु नहीं है समीप..न है इसकी कामना सरल' 

क्या तुम तथापि रहोगी मौन?... इस जम्बूद्वीप में प्रेम से सिक्त...होगा कौन?

 

इस उत्सव को कर मुखरित..प्रणय पाश में कर बद्ध..तुम हो जाओ जीवित 

मानवरूप में दैवत्य हो किंवा दैत्य..इस काव्यकलश में रहेगी मृत्यु निश्चित।

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