रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'
पथ के साथी
Monday, June 13, 2022
Saturday, June 11, 2022
1216-डॉ. शिप्रा मिश्रा की कविताएँ
डॉ. शिप्रा मिश्रा की कविताएँ
1
हर बात में तवज्जो हर बात में शिकायतें
एक तरफ है कैद और दूसरी ओर जिल्लतें
कैसे जी लेते हैं ऐसे लोग ये पता नहीं
चार दिन की जिंदगी और हैं हजारों लानतें
फुर्सत नहीं यहाँ किसी भी रिश्ते के लिए
जिद पाले बैठे हैं सब को झुकाने के लिए
जो एक बार झुक गया खुदा की बंदगी में
औकात क्या रही किसी को गिराने के लिए
किसी को हो अपने रुतबे का नशा तो हो
किसी को अपने उड़ने का नशा हो तो हो
हमें क्या करना किसी की मगरूरी से
उसे बेखौफ बदगुमानी का नशा हो तो हो
चेहरे हैं मुस्कुराते और दिल में जलजला
झूठ की बस्ती में नेकियों का सिलसिला
खूब उड़ा लो अपनी पतंगें आसमाँ तक
हम रहें जमीन पर बस यही है इल्तिजा
ये जिंदगी है बन्दे होगी ही धूप- छाँव
खुदा के कहर से कब तक बचेंगे पाँव
औकात में ही रहना सबको लाजिमी है
जड़ें ही कट गईं तो कब तक रहेगा गाँव
-0-
2-माटी- पानी ?
छोटी जगह की लड़कियाँ
बड़ी गँवारू
होतीं हैं
समझती नहीं कुछ
आज के तौर- तरीके
चली आती हैं गाहे- बगाहे
जब उनकी माटी पुकारती है
अब भी करतीं हैं परदा
अपने जेठ- सरदार से
उतारतीं हैं थकान पाहुन की
पानी भरे परात में
अब भला जरूरत क्या है
मँगरुआ के घारी में
बेझिझक चले जाने की
और तो और
वहाँ से गोबर उठा लाने की
उसके बिना क्या चौका
अपवित्र रहता है भला
व्यंजनों से परोसी थाल भी
उन्हें तृप्त नहीं कर पातीं
जब तक न खाएँ
घूरे में पकाया
आलू का चोखा
फेरा लगा आती हैं
गाँव के खेत- खलिहान
गोहार आती हैं शीतला माई
बरह्म बाबा, वनदेवी
आँचर पसार- पसार
ये लड़कियाँ देतीं हैं
उगते सुरुज को जल
गांछ- बिरिछ और
दुआरी पर
बांध जातीं हैं
मनौती की डोर
जनेऊ वाले महादेव पर
माथा पटकतीं हैं
बुदबुदाते हुए
गायों को कौरा खिलाती
बढन्ती की असीस माँगतीं
लगाती हैं घर के
गोल- मटोल- से छौने के
लिलार पर करिया टीका
अकलुआ की मऊसी से
सनेस माँगने की
भला क्या जरूरत
घर में मिठाइयों की
कोई कमी है क्या
नइहर के खोंइछा के बिना
भला क्यों अधूरी रहती हैं
ये छोटी जगह की
लड़कियाँ भी ना
सहेज जाती हैं
पुरखों की नसीहतें
और बचा लेतीं हैं
अपनी माटी- पानी को..
-0-
3-परिणति
नदी
अपना मार्ग
स्वयं बनाती है
कोई नहीं पुचकारता
उछालता उसे
कोई उसकी ठेस पर
मरहम नहीं लगाता
दुलारना तो दूर
कोई आंख भर
देखता भी नहीं
तो क्या
नदी रुक जाती है
या हार मान लेती है
कोई उसे मार्ग भी
नहीं बताता
चट्टानों से भिड़ना
उसकी नियति है
और उसे
अपनी नियति या
नियंता से
कोई उलाहना नहीं
उसे तो
स्वीकार्य है
स्वयं का
आत्मसात
यही परिणति है
जो उसे सिंधु की
विशालता से
उसका परिचय
करवाता है
और वह
सर्वस्व न्यौछावर
करने के बावजूद
बिंदु से सिंधु के
अंक में समाहित
हो जाती है
सदा- सर्वदा के लिए
और हो जाती है
परिपूर्ण..
-0-
4- वह एक दरिंदा -डॉ.शिप्रा मिश्रा
डरते हैं हम अपनी आँखें खोलने से
डरते हैं हम अपनी पाँखें खोलने से
उस घूरने वाले से हम काँप जाते हैं
उसके गंदे इरादे हम भाँप जाते हैं
हमारे थरथराने पर वह ठहाके लगाता है
अपने मंसूबों को साजिशों से सजाता है
बेजान तितलियों के पंख वह मसल देता है
हमारी मासूम खिलखिलाहट में दखल देता है
हमारा चहकना उसे अच्छा नहीं लगता
वह एक दरिंदा हमें सच्चा नहीं लगता
उसकी मुट्ठियों में शिकारियों के जाल हैं
बहशी बेखौफ शैतानों से बड़े बाल है
जी चाहता है नाखूनों से चिथड़े कर दें
उसके कलूटे जिस्म के टुकड़े कर दें
इन भेड़ियों को बनाया क्यों भगवान ने
या इंसानियत ही छोड़ दी यहाँ इंसान ने
जज अंकल!! इन्हें लटका दो फाँसी पर
अरे!कुछ तो तरस खाओ मुझ रुआँसी पर
तिल-तिल मरने का दर्द क्या होता है
बेजुबान सिसकती रातें सर्द क्या होता है
हम नन्ही चिड़िया हमें बेखौफ उड़ने दो
हमारे ख्वाबों में चाँद-सितारे जड़ने दो
हमें मचलने दो हमें भी खिलने दो
इन्द्र-धनुष के रंगों में हमें घुलने दो
हम तक जो पहुँचे हाथ वो जल जाए
हमारी जलती रोशनी से वो सँभल जाए
उससे कह दो हम अबला या कमजोर नहीं
हमें छू सके उन बाजुओं में इतना जोर नहीं
-0-
-0-
Monday, May 30, 2022
1215-दोहे-कुण्डलिया
डॉ. गोपाल बाबू शर्मा
1
अँधियारा
गहरा हुआ, फैला कहाँ उजास।
नहीं मौन को स्वर मिला,
नहीं रुदन को हास
2
अभी राजसी ठाट का, कहाँ हुआ है अन्त।
पतन, पाप,
पाखण्ड में, मस्त नए सामन्त।
3
चमक-दमक के दौर में, कौन करे पहचान
आज काँच को मिल रहा, हीरे का
सम्मान।।
4
सच सौ ऑसू
रो रहा, झूठ मनाता मोद।
सौदागर ईमान का, बैठा सुख की गोद॥
5
मूल्य-हीन घोड़े हुए, हाथी फाकें धूल।
गदहों पर पड़ने लगी, अ
रेशम की झूल ।
6
तृण औरों की आँख में, देखें, बनें कबीर
दिखे न अपनी आँख का, लोगों को शहतीर।।
7
पहन रही हैं आजकल, रातरानियाँ ताज।
आँगन की तुलसी मुई, हुई उपेक्षित आज
8
पात्र, कथा,
उद्देश्य अब, बदल गए संवाद।
भूल शहीदों को गए, रहे शोहदे याद॥
9
द्वार बँटे,
आँगन बँटे, बँटा हृदय का प्रेम ।
चूर-चूर दर्पन हुओं, सिर्फ़ रह गया फ़्रेम
10
घर पर यदि छप्पर नहीं, रिक्त उदर का कोष।
चौराहे की मूर्तियाँ
, क्या देंगी सन्तोष ।
11
दंगे -
दंगल हर जगह, आया जंगल - राज
मगल की बातें कहीं, शनि के सिर पर ताज ।
12
नागफनी
को क्यों रहे, फूलों की दरकार।
वह तो निशिदिन शोभती, कॉटों से कर प्यार।।
13
दोष किसी का, और को, मिलता है अंजाम।
सागर
खुद खारा मगर, प्यास हुई बदनाम।।
14
सुन्दर योग्य सुशील वर, वही आज कहलाय |
जिसकी वेतन से अधिक, हो ऊपर की आय।।
15
बदनीयत संसार में, खूब रहे फल - फूल।
जिसकी नीयत नेक है, उसको यह जग शूल।।
16
धन है तो तू चौथ दे, कहे माफिया. राज।
वर्ना मारा जायगा, कोई. नहीं इलाज॥
17
आस्तीन में साँप अब, सन्तों के घर चोर।
भोलापन. गूँगा हुआ, छल-प्रपंच मुँहजोर ।
18
संकट में फिर द्रौपदी, लाज बचाए कौन।
मनमानी कौरव करें, कान्हा साधे मौन।।
19
जीते जी जिसके लिए, लोग बिछाते खार।
उसके शव को पूजते, चढ़ा पुष्प के हार।।
20
गज से ज़्यादा कीमती, हुए आज गजदन्त।
श्रद्धा-आदर पा रहे, छैल चिकनियाँ सन्त।।
21
आम आदमी पिस रहा, खास मारते मौज।
कहीं 'पूर्णमासी मने, कहीं न दीखे दौज।।
22
बगुले पाते हैं यहाँ, बार - बार सम्मान।
हंस उपेक्षित ही मरें, अपना देश महान्।।
23
जिनके मन में खोट हैं, वे ही बने कहार।
रह पाए महफूज क्यों, डोली आखिरकार।।
24
लोगों ने छल-धर्म से, खूब बनाए ठाठ।
रावणवंशी कर रहे, रामायण का पाठ।
25
कथनी-करनी में दिखे, आज हर जगह भेद
चलनी परखे आचरण, लिए बहत्तर
छेद।।
-0-
2-डॉ.उपमा शर्मा
आया नभ वो छा गया,बादल करे कमाल।
रिमझिम-रिमझिम वो करे, नाचे दे- दे ताल।
नाचे दे दे ताल, सुर सभी मिलकर साधें।
होती दिन में रात, सूर्य अब बस्ता बाँधे।
ठंडी चले बयार, गीत दादुर ने गाया।
उपमा हो मन- मुग्ध, गगन जब बादल आया।
Friday, May 27, 2022
1214
1-स्वीकारोक्ति
भीकम सिंह
बड़े ध्यान से
पेंशनर ने पढ़ा
अपना-
जीवित होने का
प्रमाण-पत्र
पढ़कर
मरने के पल
याद आये
उन पलों से जुड़े कुछ
नाम
उन नामों से जुड़े
अभद्र काम
कुछ दिन के
कुछ रात के
कुछ बिना बात के
कुछ अटके
कुछ भटके
कुछ सुदूर तट के
आत्मा ना उठा पाई थी
जिनका भार
ना जानें कितनी बार
तब किसी ने नहीं माँगा
जीवित होने का
प्रमाण-पत्र ।
-0-
-ग़ज़ल
विनीत मोहन-फ़िक्र सागरी
नये मरहलों में नयी रात होगी
मुहब्बत में उनसे मुलाकात होगी ।
यहाँ इश्क में जीत मिलने से पहले
कभी शह मिलेगी कभी मात होगी।
न दुनिया को कोसो न अपना मुकद्दर
मिलेगा तुम्हारी जो औकात होगी।
बदल दो सभी अपनी आदत पुरानी
नयी जिंदगी की शुरुआत होगी।
हुई जो शरारत न लो उस को दिल पर
किसी मनचले की खुराफात होगी।
वदलती है हर शय जहाँ में हमेशा
खुदा के रहम की भी बरसात होगी।
गमे जिंदगी में रहे दर्द शामिल
नये जख्म भी 'फ़िक्र' सौगात होगी।
-0-ग़ज़लकार एवं सॉनेटियर,सागर, मध्यप्रदेश
2-पेड़
अनिमा दास
मेरी गोद मे
सिर रख सो जा तू
बाँहें पसारे खड़ी हूँ मैं
दुख सारे बाँट ले मुझसे
तेरी माँ हूँ मैं ...।
रोज़ सींचूँ साँसें तुम्हारी
अणु- अणु है मेरी अमृतधारा
आ ! मैं तेरा जीवन सँवार दूँ
आशाओं की बारिश करूँ मैं
तेरी माँ हूँ मैं ......।
शाखाएँ मेरी सपने हैं तेरे
स्नेहिल स्पर्श से
सावन की बौछार दूँ मैं
तेरी माँ हूँ मैं .....।
ये शीतल छाया
फिर कब मिलेगी?
तपती धूप में
तू कब तक जलेगा?
आ ! कोमल बचपन तुझे दूँ
करूँ मैं
तेरी माँ हूँ मैं .....।
तेरी माँ हूँ मैं .......।
-0-
Sunday, May 22, 2022
1211- छह सॉनेट
अनिमा दास
1. प्रिया-मोहन (सॉनेट)
एक प्रहर में, मौनता की कई निशाएँ... क्षुब्ध होती हैं
इस तनु की गंध_ वाटिका में...अस्थियाँ वंशी बनतीं हैं
तुम दे जाते हो जन्मों का संगम..., मृदा
में रुधिर निर्झर
हृदय-सरि में पद्म सम...होता पुष्पित...व्यथा-पुष्कर।
बिंबित होता चित्र लुप्त भावों का, नित्य
अंजुरी में एक
मैं, मंद-मंद चलती पवन में गूँथती, श्वास-मुक्ताएँ
अनेक
तुम होते अंकुरित अशांत वसुंधरा के सिक्त वक्षस्थल से
मैं जीवित हो जाती, तुम्हारे निस्तल प्रेमिल मधु जल से।
तुम ही धीर हो, तृषा की तीर हो, तुम ही शीतल
सलिल
छायाहीन स्वरूप की काया तुम, मग्न मेघों
का कलिल
सहस्र पूर्ण कुंभ से, देह में है, पारिजात की मुग्ध
सुगंध
गिरिशीर्ष में जैसे दिवा की दिव्यता व स्तीर्ण मलयज गंध।
देखो, कज्जल होता विलीन, रजनी क्रमशः
होती चंद्रप्रभ
मोहना! आलिंगन में है नक्षत्र, किंतु,
प्रिया है नीरव निष्प्रभ।
-0-
2. मेघ मल्हार (सॉनेट)
तुम गा रहे हो मेघ मल्हार प्रियवर, वन
पक्षी रो रहे
उमड़ रही है उन्मादी नदी प्रियवर, दृग हैं सो रहे
झर रही है अंतरिक्षीय मधु प्रियवर, मन-मोर
अधीर
वृक्षवासी हैं आह्लादित प्रियवर, इरा बहाए
नीर।
हृद-शाखाएँ पल्लवित प्रियवर, शब्दों में
अलंकार
तीर्ण देह पर शांत स्पर्श प्रियवर, अधरों
में झंकार
वक्ष अंबर का भीगता प्रियवर, आशाओं में
है गमक
तिमिर की परछाई गहन प्रियवर, मुख पर है
दमक।
पर्वत से बहता हिमजल प्रियवर, सुरों में
भी नीरद
पक्षियों का संगीत मधुर प्रियवर, पंखों में
भरें जलद
दामिनी संग नृत्यरत प्रियवर, इरा है लगी
प्रेम सरि
अम्लीय अश्रु मधुर प्रियवर, मदिर-सा लगे मेघावरि।
सघन गहन व्यथाओं में मलयज है सुगंधित प्रियवर
थिरकती वारि बूँद में पुष्परज है सुरभित प्रियवर।
-0-
3.चित्रांगदा (सॉनेट)
तुम्हारे विक्षिप्त हृदय का, मैं,
हूँ एक मात्र भग्नांश
स्पंदन में मेरे, अभिगुंजित क्षताक्त कल्पित स्वन
मेरे विस्तृत आयुकाल का, मैं हूँ मात्र एक क्षणांश
तुम्हारे अधरों में है, चिरजीवित मृदुल स्वप्न ध्वन
मैं हूँ महार्णव के वक्ष पर दिग्भ्रांत तरंगित प्रवाह
हूँ, मैं उद्विग्न निम्नगा की उद्वेलित उर्मिल मौनता
हे चित्रांगदा! मैं आग्नेय शिला का तीव्र अंतर्दाह
हूँ इस विदीर्ण मन की अश्रुपूर्ण सिक्त निर्जनता
दसदिशाओं का, देखो! विवर्ण रूप, हो रही शुष्क;
ईरा की शीतल मृदलता विछोह में है शोकग्रस्त
तप्त वायु सम हो रहा दग्ध-विदग्ध, यह
धनुष्क
हे चित्रा! नियति के नियमों में प्रणय है परित्रस्त
प्रिये! है देहातीत यह आत्मिक परिरंभ, है
दैवीय
संघर्षरत जीवन मेरा, है अनावृत पीड़ा-मानवीय।
-0-
4.मृगनयनी (सॉनेट)
हे, मृगनयनी! किसने किया श्वेत वस्त्र तुम्हारा विदीर्ण?
कौन भर गया कुंतल में यह भस्मित आशाएँ विशीर्ण?
प्राचीन भग्न स्तूप—सा लगे, तिरष्कृत तन-तरु तुम्हारा
धरा की यह है कौनसी ऋतु, तप्त है मन-मरु तुम्हारा।
है दृगों में निष्ठुर आषाढ़, क्यों हृदय में है प्रचंड निदाघ
निश्चल, नीरव, निरुद्देश्य है क्षिति,
मलिन हुआ शेष माघ
हे, कमलनयनी! किंवदंती के करुण क्रंदन की कामिनी!
क्यों हो मौन, इस महाद्वीप की मर्माहत मृण्मय मानिनी?
अधरों पर लिये क्षताक्त स्मिता का यह दृश्य विदारक
क्यों कर रही प्रतीक्षा त्राण की, जब
समय बना संहारक?
स्मृति तुम्हारी मृत रहेगी इस मृत्युलोक पर, हे
कुमारिका!
त्रस्त ध्वनि तुम्हारी होगी रुद्ध नभ गर्भ में, हे,
अनामिका!
धमनी में धावमान ध्वांत से हो रही आत्मा तुम्हारी मुक्त
सखी, देखो! ...वेदना, सहर्ष अस्थियों
से हो रही उन्मुक्त।
-0-
5.मैं (सॉनेट)
*****
नीलाकाश की मुक्त विहंगिनी मैं, हैं
स्वर्णिम वीची मेरे पंख
लीन हो जाती जलद में जब नादित होता तेरा महा शंख
केंद्रित होती दृष्टि पटल पर असंख्य स्वप्न की तारिकाएँ
हृदय-उपवन में होतीं प्रस्फुरित सहस्र क्षुधित लतिकाएँ।
मधुरिम करो देह मृदा को, के मैं तीक्ष्ण व्यथाओं को पी लूँ
मृत माने संसार किंतु, महार्णव के अतल गर्भ में ही जी लूँ
अल्प सांध्य तम में, यह तन प्रतिच्छाया बन न लुप्त हो जाए
देवद्रुम-सा, कर अंकबद्ध मुझे ऐसे, के श्वास
अतृप्त हो जाए।
तृष्णा की मेघमालिनी बन, स्तीर्ण रहूँ अग्निस्नात गगन पर
मरुस्थल की मृगतृष्णिका-सी, होती रहूँ अनुभूत जीवन भर
क्षत सारे अलंकार बन जाए मेरे कि मैं हूँ शैलीय मालती
यज्ञवेदी पर गुंजित देव मंत्र के शेष श्लोक क्यों मैं पुरावती।
ईप्सा के मुक्ताओं से अभिपूर्ण, द्रवित
दृगों के कृष्णिम तट
क्या प्राप्ति-रेखाएँ होंगी विकसित, संतृप्त
होगा कल्पवट?
-0-
6.मृत्यु
कलिका (सॉनेट)
इस संघर्ष की समाप्ति है तू, मैं केवल
अवशेष हूँ
अंत में मेरी प्राप्ति तू ही है, मैं केवल
निर्निमेष हूँ
अंगीकार हूँ तू, निर्णीत है मेरी समस्त क्रियाओं में
स्वीकार है मुझे तू, इस महायात्रा की प्रक्रियाओं में।
अंतःसलिला तू निर्धारित है, सहस्र युगों के प्रारंभ से
मैं देह निमित मात्र, तेरी सारी इच्छाओं के आरंभ से
श्रेष्ठ रही तू अंतिम कण पर्यंत, इस महा वलय
की
मैं तुच्छ निस्सीम तिमिर हूँ, अनिश्चित
महाप्रलय की।
पंचभूत की नायिका मैं, तू है मोक्ष मार्ग की सारथी
भाग्यचक्र की भग्न अक्ष मैं, हूँ माया
जड़ित स्वार्थी
है नक्षत्रपुंज की ज्योति राशि, है तू
स्वर्गीय अल्पना
मैं निशीथ का रुदन, हूँ वीभत्स काल की कल्पना।
हे, मृत्यु कलिका! हो पल्लवित, मनोरम
वा सुरभित
कर शुभ्रा मुझे, मैं अनंत काल से हूँ क्लांत व व्यथित॥
-0-Anima Das, Asstt. Teacher, New Stewart School, Mission,oad,
Buxibazar, Cuttack, Odisha-758001
animadas341@gmail. com







