पथ के साथी

Thursday, December 9, 2021

1165

 क्षणिकाएँ- प्रो. विनीत मोहन औदिच्य

1


ईश्वरीय सत्ता
के

समानांतर

खुली हुईं

धर्म के ठेकेदारों की दुकानें

बेचती हैं आस्था

2

सहलाती हैं पीठ

एक दूसरे के विरुद्ध करके

विष- वमन

विरोधाभासी

खुरदरी जिह्वाएँ

3

खा जाने को आतुर

घूरती कई जोड़ी आँखें

करती है सर्वत्र पीछा

असहज नारी देह का

4

बस्ते के बोझ तले

कराहते शैशव का

मौन प्रतिकार

अनसुना कर देती हैं

महत्वाकांक्षाएँ

5

बनकर मठाधीश

साहित्य का

निरंतर करते हैं

चीरहरण

अंधों में काने राजा

6

मानव के हाथों

होकर पूर्णतः अपमानित

मचा रही चहुँ ओर

हाहाकार

निर्वस्त्र रोदन करती प्रकृति

7

स्वार्थ की बलिवेदी

पर नित्य होते होम

जीवन मूल्यों को

टुकुर- टुकुर

ताकती हैं मौन

मानवीय संवेदनाएँ

8

निर्ममता से लील

रहीं है प्रतिदिन

दिशाहीन यौवन को

महत्त्वाकांक्षाओं की

प्रज्वलित भट्टियाँ

9

ओढ़ी हुई

शालीनता के मुखौटों से

मत होना तनिक भी भ्रमित

नहीं होता इनके

अंतस् से

मलिनता का निस्तार

10

विकलांग श्रद्धा

अंध भक्ति

व्यक्ति पूजा से ग्रस्त

चरण वंदना हेतु उद्यत

भीड़

रौंदती जा रही है

अनवरत

आत्मा जनतंत्र की

11

कृशकाय कंपित गात

भौतिक विलासिता में डूबी

संतति के समक्ष

विवश हो देखता

दम तोड़ते

अपने सपनों को

12

सहस्राधिक

बिच्छुओं के डंक- सा

दंश दे जाती हैं

परछाइयों- सी

गहराती अतीत की

स्मृतियाँ

13

नेहासक्ति का

पाकर खाद - पानी

फूटने लगे हैं

प्रेमांकुर

युगल हृदय की

अमराइयों में

14

नीले अंबर पर

लहराते कुंतलों -सी

उमड़ती मेघावरि

करे आँख- मिचौली

सजन भुवन भास्कर से

15

धर्म की तुला में संरक्षित

नित्य प्रति दिन

ऑक्टोपस- सा

चारों ओर विस्तार पाता

जनसंख्या का घनत्व

मुँह चिढ़ा रहा है

विकास को

16

थरथराते अधरों पर

चुंबनों से कोमल स्पर्श की

मादकता जगाती

प्रथम अनुभूति से

कामनातुर

अर्ध उन्मीलित

रतनारे नयन

बोल उठते प्रेम की

मौन भाषा

17

अव्यक्त से व्यक्त होकर

पुनः अव्यक्त होने की

प्रक्रिया में जीव

विस्मृत कर

नश्वर जग यथार्थ

उलझता

मायावी प्रलोभनों की

शृंखलाओं में

18

कभी छूता है शिखर

कभी टूटता है दर्प

कदाचित् फिर भी

आने लगा है आनंद

मनुष्य को

साँप सीढ़ी के

खेल में

19

प्राची से उगकर

प्रतीची के आंचल में

छुपता रवि

नित्य देता मानो

सरल संदेश

उत्थान से पतन का

-0-

प्रो. विनीत मोहन औदिच्य

कवि, सोनेटियर एवं ग़ज़लकार

सागर, मध्य प्रदेश

Tuesday, December 7, 2021

1164

 डॉ.जेन्नी शबनम की क्षणिकाएँ

1.चाँद का दाग़

 


ऐ चाँद! तेरे माथे पर जो दाग़ है 

क्या मैंने तुम्हें मारा था? 

अम्मा कहती है -मैं बहुत शैतान थी 

और कुछ भी कर सकती थी। 

 

2- शगुन

 

हवा हर सुबह चुप्पी ओढ़ 

अँजुरी में अमृत भर 

सूर्य को अर्पित करती है 

पर सूरज है कि जलने के सिवा 

कोई शगुन नहीं देता।  

 

3- उजाला पी लूँ 

चाहती हूँ दिन के उजाले की कुछ किरणें

मुट्ठी में बंद कर लूँ
जब घनी काली रातें लिपटकर डराती हों मुझे
मुट्ठी खोल, थोड़ा उजाला पी लूँ
थोड़ी-सी, ज़िन्दगी जी लूँ।

 

4-शुभ-शुभ

 

हज़ारों उपाय, मन्नतें, टोटके 

अपनों ने किए ताकि अशुभ हो,  

मगर ग़ैरों की बलाएँ, परायों की शुभकामनाएँ   

निःसंदेह कहीं तो जाकर लगती हैं 
वर्ना जीवन में शुभ-शुभ कहाँ से होता।  

 

5-स्त्री की डायरी

 

स्त्री की डायरी उसका सच नहीं बाँचती    

स्त्री की डायरी में उसका सच अलिखित छपा होता है  
इसे वही पढ़ सकता है, जिसे वो चाहेगी,   
भले ही दुनिया अपने मनमाफ़िक़  
उसकी डायरी में हर्फ़ अंकित कर ले।   

 

6- सुख-दुःख जुटाया है  
  

तिनका-तिनका जोड़कर सुख-दुःख जुटाया है   

सुख कभी-कभी झाँककर   

अपने होने का एहसास कराता है   

दुःख सोचता है कभी तो मैं भूलूँ उसे   

ज़रा देर वो आराम करे 
मेरे मायके की टिन की पेटी में।

-0-

Saturday, December 4, 2021

1163

 

 ज़िन्दगी- प्रीति अग्रवाल


ये नज़र, जाए जहाँ तक, सब धुँआ- सा लग रहा
इस शहर में, हर कोई, क्यों, लापता- सा लग रहा

खोए- खोए हैं सभी, हर शख़्स ही हैरान है
अमन ओ चैन का यहाँ, न नाम, और निशान है

शून्य आँखों में बसा है, सूरतों पर है थकान
दिल हैं झोंपड़ी से, आलिशान, ऊँचे हैं मकान

बेतहाशा दौड़ता, हर आदमी बेहाल है
बेलगाम ख़्वाहिशों का, यह सुनहरा जाल है

किस मोल पर है क्या मिला, ये सोचता, कोई नहीं
मंज़िलों की चाहतों में, खो रहे, खुद को सभी

यूँ तो सब के पास सब है, वक़्त की बस, है कमी
सांस केवल चल रही हो, ज़िन्दगी, ये तो नहीं

कल की रट में आदमी, है आज को झुठला रहा
जो भी है, बस आज है, न समझ, न समझा रहा

बेखबर को जब खबर होगी, कि जीवन क्यों मिला
सांझ करती होगी रस्ता, रात आने के लिए

इक दफा जो रात ने, अपना ठिकाना कर लिया
आएगा 'कल', या न आए, कोई न बतला सका

जो है तेरे पास, ले आनन्द, उसे सम्मान दे
'और' की रट छोड़, जो है, वो बहुत, ये मान ले

कल नहीं है, वो न आएगा कभी, तू जान ले
जो है केवल 'आज' ही है, जान और पहचान ले

कल की रट को छोड़, तू, इस दिन की डोरी थाम ले
जो है, वो ही है बहुत, इस बात को, तू मान ले!!

-0-

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Friday, December 3, 2021

1162-तीन कविताएँ

1-शर्तों के कंधों पर-डॉ.सुरंगमा यादव

नफ़रत का हथियार दिखाकर
गीत प्रेम के गाते गाओ
हम बारूद बिछाते जाएँ
तुम गुलाब की फसल उगाओ
लपटों में हम घी डालेंगे
अग्नि- परीक्षा तुम दे जाओ
ठेकेदार हैं हम नदिया के
तुम  प्यास लगे कुआँ खुदवाओ
हम सोपानों पर चढ़ जाएँ
तुम धरती पर दृष्टि गड़ाओ
माला हम बिखराएँ तो क्या!
मोती तुम फिर चुनते जाओ
सिंहासन पर हम बैठेंगे
तुम चाहो पाया बन जाओ
फूलों पर हम हक रखते हैं
तुम काँटों से दिल बहलाओ
अधिकारों का दर्प हमें है
तुम कर्त्तव्य निभाते जाओ
करो शिकायत कभी कोई न
अधरों पर मुस्कान सजाओ
मन भरमाया,समझ न पाया

हम समझें कोई जतन बताओ
अब मत शर्तों के कंधों पर

संबंधों का बोझ उठाओ।

-0-

 2-सविता अग्रवाल 'सवि' कैनेडा 

1

अनगढ़ी प्रणय की दीवार

टूटी साँसों की लड़ियाँ

मधु यामिनी के स्वप्न रीते

वंचना से, भाव भीगे

सूखे पड़े हैं सुमन सारे

प्रतिकार में वायु बही है

बहती नदी की तीव्र धारा

अभिशाप सिक्त

पथ रोके खड़ी है ।

2

यंत्रों की मची है दौड़

प्रतिस्पर्धा की होड़

अपनत्व हुआ लुप्त

खोया स्वर्णिम प्रकाश

अभिशप्त हो रहा

मानव अस्तित्व

पाने- खोने की ये

कैसी आँख- मिचौनी

जीवन बन गया है

करुणामय कहानी ।

-0-

Monday, November 29, 2021

1161- दर्द का अनुवाद

 सुशीला शील राणा



रह-रह कर उठती है हूक

कहाँ रही कमी

कहाँ गए हम चूक

क्यों हैं दूर

दिल के टुकड़े दिल से

 

घण्टों उन्मन- सा बैठा

अकसर सोचता है मन

आँसू ही बोलते हैं

ज़बान तो बैठी है

दिन-महीने-साल से

चुप-चुप-सी

इस एक सवाल पर

बिल्कुल मौन

मूक

 

 

बेटों की दोस्ती

बनाएगी पुल

यही सोच

सरल-सा मन

हुआ प्रफुल्ल

किंतु मिले कुछ दाग़

कुछ बदगुमानियाँ

कुछ इल्ज़ामात

कुछ सजाएँ

उन ग़लतियों की

जो की ही नहीं

कहीं थीं ही नहीं

 

 

थीं तो बस बढ़ती उम्र की 

अकेलेपन की दुश्वारियाँ

नीम अँधेरों में

डरते-डराते सपनों की

डरावनी परछाइयाँ

 

मिला कोई अपना-सा

जागा सोया सपना- सा

चाहा था फ़क़त साथ

उठे बेग़ैरत सवालात

न जाने कहाँ से, क्यों

चले आए कुछ लांछन

ज़मीन-ज़ेवर-जायदाद

 

 

हमने चुना इक मोती

हमदर्द, जीवन-साथी

ख़ुशी-ख़ुशी सौंपी वारिसों को

उनकी ही थी जो विरासत

कार-कोठी-गहने

जो नहीं थे मेरे अपने

  

मेरे अंशी, मेरे वारिसो

हमारी दौलत ही नहीं

हम भी तुम्हारे हैं

सब कुछ सौंपकर तुम्हें

बस अपना बुढ़ापा सँवारा है

फिर क्यों ये परायापन

क्यों खींच दी हैं दूरियाँ

आँखों ही आँखों में

दिन-दिन घुटते आँसू

बेवज़ह की मज़बूरियाँ

 

तुम बिन

दिल का इक कोना

मन का आँगन सूना है

हमारी अधूरी ख़ुशियाँ

देखती हैं राह

कि कभी तो समझेगा 

हमारा ख़ून

हमारे दर्द

कभी तो महसूस करेगा

अवसाद की ओर 

धीमी मौत की ओर धकेलते

तन्हा दिन

डराती-सी लंबी अँधेरी रातें

  

सहेज लो अपने बुजुर्गों को

उसी तरह

जिस तरह

सहेज ली हैं तुमने

उनकी सब निशानियाँ

सब दौलतें

सब विरासतें ।