पथ के साथी

Wednesday, September 7, 2016

665



1. बिन तुम्हारे

(पराये देश में बुजुर्गों की व्यथा)
मंजीत कौर मीत

मोड़ पर खड़ा हूँ मैं
बिन तुम्हारे
निपट तन्हा हो गया
हूँ बिन सहारे
हाल भी न पूछता
अब आ के कोई
पास भी न बैठता
दिल लगाके कोई
आसमाँ से गिर रहा
ज्यूँ टूटे तारे
मोड़ पर खड़ा हूँ मैं
बिन तुम्हारे
घेरती यादें तुम्हारी
बन के सपने
इस बेगाने देश में
मैं ढूँढूँ अपने
याद मुझको आते वो
जो पल गुज़ारे
मोड़ पर खड़ा हूँ मैं
बिन तुम्हारे

किस से कहूँ मैं यहाँ
दिल की बाती
विरह से मैं लिख रहा हूँ
नित्य पाती
ढूँढता भँवर में घिरा
मैं किनारे
मोड़ पर खड़ा हूँ मैं
बिन तुम्हारे

माटी मेरे देश की
अब वह भी रूठी
अजनबी हवा में हो गई
साँस झूठी
याद मुझको आते है
गंगा के धारे

पार्क में बैठा हूँ
बिलकुल अकेला
पेड़-पौधे,पक्षियों का
है झमेला
फूल कागज़ के खिले
बगिया में सारे
मोड़ पर खड़ा हूँ मैं
बिन तुम्हारे

ढूँढतीं मेरी निगाहें
अब साथ मेरे
हम निवाला,हम जुबाँ
हमरा मेरे
चाहता हूँ करना मैं
कुछ दिल की बातें
मोड़ पर खड़ा हूँ मैं
बिन तुम्हारे

ख़ाक के समान हैं
सारे रतन
लौट जाना चाहता हूँ
अपने वतन
सूखी रोटी देश की है
दुग्ध धारे
-0-
2 _हलधर - मंजीत कौर मीत


जनता का जो पेट है भरता
तिल-तिल कर वो ही मरता
क्या शासन अब तक चेता है
ये रोज़ आँकड़ा क्यूँ बढ़ता

किसको अपना कह दे हा
मण्डी में हैं खड़े दलाल
उनकी रोज़ तिजोरी भरती
बोझ कर्ज़ का नित बढ़ता
क्या शासन अब तक चेता है?

कभी बाढ़ खेती को खा
सूखा नदिया कभी उड़ा
ओले खड़ी फसल बिछाते
नैनो से झरना झरता
क्या शासन अब तक चेता है?

पीठ-पेट दोनों मिले हु
गुरबत में लब सिले हु
बेटी ब्याहे कि फीस चुका
यही सोच तिल-तिल मरता
क्या शासन अब तक चेता है?

खाद बीज सब सरकारी
लगा लाइन में वो भारी
बनी किश्त की लाचारी
यही सोच मन में डरता
क्या शासन अब तक चेता है?.

सूख रही फूलों की डाली
कहने को धरती का माली
खीसा-हाथ दोनों ही खाली
रोज़ बरफ सा वो गलता
क्या शासन अब तक चेता है?

हाथों की हैं घिसी लकीरें
सूखा-पाला दिल को चीरें
रात-दिन उलझन में उलझा
फिर एक फैसला वो करता
क्या शासन अब तक चेता है
-0-
3. कैसे तुझे बचाऊँ- मंजीत कौर मीत

कैसे तुझे बचाऊँ
किस आँचल के तले छुपाऊँ
शब्द नहीं हैं पास मेरे
कैसे तुझे बताऊँ
उम्र नहीं है तेरी बिटिया
ऊँच-नीच समझाऊँ
आना-जाना,गली मोहल्ला
क्या सब ही तेरा छुड़ाऊँ
कैसे तुझे ....
किस आँचल .........
माँ का दिल डरता है अब तो
सुन खबरें बदकारों की
कोमल कमसिन तू क्या जाने
नज़रें इन मक्कारों की
तुझे नज़र न लगे किसी की
किस कोठर में छुपाऊँ
कैसे तुझे ........
किस आँचल .......
गली मोहल्ले गाँव की बिटिया
सब की साँझी होती थी
साँझ ढले जब बैठ इकट्ठे
सुख-दुःख सभी पिरोती थीं
किस पर करूँ भरोसा अब तो
समझ नहीं मैं पाऊँ
कैसे तुझे ......
किस आँचल ........
कठिन राहहै जीवन की बिटिया
पग में काँटे ही काँटे हैं
तुझे हिम्मत से चुनने होंगे
जो कुदरत ने हम को बाँटे हैं
तेरे कोमल पाँव तले
पलकें आप बिछाऊँ
कैसे तुझे बचाऊँ
किस आँचल के तले छुपाऊँ |
-0-

Tuesday, September 6, 2016

664



1-ज़िन्दगी फिर भी नमकीन है
- मंजूषा मन

दुःख मिला जो हमें
अंतहीन है,
ज़िन्दगी फिर भी नमकीन है।
जीवन लगता अब मशीन है,
ज़िन्दगी फिर भी नमकीन है।

र्जर हुई है
मन की हर दीवार,
टूट ग हैं अब सारे द्वार,
छाया है हर ओर
घनघोर अँधेरा,
कहीं दिखाई न देता है
कोई सवेरा,
दिल का माहौल ग़मगीन है
ज़िन्दगी फिर भी नमकीन है।

मंज़िल कहाँ है, ये नहीं पता
अपने भी रहते है
सदा हमसे खफा,
तरसे हैं हम
इक  इक ख़ुशी के लिए,
पाया भी क्या है
ज़िन्दगी के लिए,
हासिल तेरह न पाया तीन है
ज़िन्दगी फिर भी नमकीन है
छूटा जो हाथो से
ग़म न किया,
जीवन का हर पल
हँ- हँसकर जिया
सहे दर्द
न कभी आँसू बहा
नहीं कभी
ये कदम डगमगा
निकाला कोई मेख न कोई मीन है
ज़िन्दगी फिर भी नमकीन है
-0-
2-औरों की खुशियों में (सार या ललित छंद )
सुनीता काम्बोज

एक बार गर गई, लौटकर,आती नहीं जवानी
माटी में माटी मिल जाए,
फिर पानी में पानी ।
सबको इक दिन जाना होगा,जो दुनिया में आया
हँसकर रोकर
हर मानव ने,जीवन का सुर गाया ।
ज्ञानी है कोई इस जग में, है कोई पाखण्डी
कोई सरल बड़ा ही मिलता,कोई बड़ा घमण्डी ।
इस दुनिया में कुछ लोगों को ,अपना आप सुहाता
जो उनकी अच्छाई गिनता ,केवल वो ही भाता ।
रंग- बिरंगे सजे खिलौने ,दुनिया लगती मेला
कोई जीता भीड़- भाड़ में,कोई रहा अकेला ।
सारा जीवन धन के पीछे ,फिरते हैं बौराए
जितना मिलता कम पड़ता है, हाय हाय! चिल्लाए ।
औरों की खुशियों में खुशियाँ , जिसने ढूँढी ,पाई
रहता नहीं कभी वह प्यासा, मिट जाती तन्हाई ।
-0-

Monday, September 5, 2016

663




धन्य हैं हम 
 प्रेरणा शर्मा

ब्रह्म-वेला में तन्द्रा टूटी भी नहीं थी कि मस्तिष्क में विचार कौंधने लगे। युग-पुरुष पिता की छवि मन-मस्तिष्क में उभरने लगी।शिक्षक- दिवस हो और माता-पिता की स्मृति न आए, कैसे मुमकिन था? आज प्रात: ही बचपन की धुँधली यादों के चित्र ज्यों -ज्यों स्पष्ट होने लगे ,उनकी रोशनी की चमक मेरे चेहरे पर भी आने लगी । विद्वान्,कर्मठ ,कृषक पिता हम भाई-बहनों को अल-सुबह ही जगाकर अध्ययन के लिए नियत स्थान पर बैठने का निर्देश देते। जाने वह कैसा सम्मोहन था ,जो इतनी सुबह जागकर पढ़ना सुखद लगता । तब न कुर्सी थी न मेज़ ।अनाज की ख़ाली हुई बोरियों का आसन और सर्दियों की ठंड में गर्मी पाने का एकमात्र सहारा सूरज की गुनगुनी धूप ।आज भी स्मृति- पटल पर अमिट छाप बनाकर कर्मठता को प्रेरित करती है। सुबह चार बजे पिता की एक आवाज़ से बिस्तर छोड़ सक्रिय हो जाने वाले हम भाई-बहन प्रारंभिक शिक्षा कक्षा-1 तक पिताजी के सानिध्य में घर पर ही पूरी करते और  पाँच वर्ष की उम्र में दूसरी कक्षा में विद्यालय में प्रवेश पाने के अधिकारी बन जाते । इससे पहले पिताजी ही गुरु के रूप में स्लेट- खडिया  (चॉक) व किताबों से शिक्षा की प्रतिमूर्ति बन पाठ पढ़ाया करते थे।

 बोरी का आसन और 'पाटी- बरता(स्लेट- चॉक )' ले वर्णमाला ,संख्या- गिनती, पहाड़े जोड़ -बाक़ी ,गुणा-भाग करते -करते हम आगे बढ़ते जाते।इस दौरान पिताजी अपना कार्य कर रहे होते। लिखते -मिटाते पूरी 'पाटी'अक्षरों से भर लेने पर जब हम उन्हें दिखाने जाते ,तो नज़रों में शाबाशी का भाव पा धन्य हो पुनः अभ्यास -प्रक्रिया का हिस्सा बन जाते। यह क्रम प्रतिदिन अनवरत चलता रहता। विद्यालयी शिक्षा के लिए पिता के द्वारा डाली गई यह नींव इतनी गहरी और मज़बूत थी कि प्रतिस्पर्धा में सहपाठियों का हमसे आगे निकलना भला संभव कैसे हो पाता ? पर से में अहंकार का भाव बालमन में भी उनकी दी गई 'स्थितप्रज्ञ' की सीख के कारण कभी अंकुरित न हो पाया। वे कहते थे कि मनुष्य को सुख- दु:ख दोनों समय में समान रहने की चेष्टा करनी चाहिए। ख़ुशियाँ आने पर अहंकार व उच्छृंखल नहीं होना चाहिए। दु:ख अथवा परेशानी में स्वयं को मज़बूत रखकर आगे बढ़ना चाहिए। भविष्य में भी जीवन के हर मोड़ पर जादुई व्यक्तित्व के धनी मेरे माता-पिता सदैव प्रोत्साहित करते रहे। उनकी सीख- "सदैव सबसे सीखो।" आज भी मेरी प्रेरणा -स्रोत है। 'प्रकृति की प्रत्येक चीज़  हमें सीख देती है। हमारे चेतन-अवचेतन व्यक्तित्व की निर्मात्री है।' उनके ये विचार चिर स्मृति बनकर प्रकृति-प्रेम  के प्रति मुझको प्रोत्साहित कर रहे हैं। आज मैं स्वयं एक शिक्षिका के रूप में विद्यालयी -शिक्षा की ज़िम्मेदारी  वहन करने की क़ाबिलियत रखती हूँ;परंतु आज भी यह महसूस करती हूँ कि अभी बहुत कुछ सीखना बाक़ी है। अभी तो तोला में से मासा भी तो नहीं सीखा है।

आज शिक्षक-दिवस और गणेश-चतुर्थी के पावन दिन की बधाई प्रेषित करते व स्वीकार करते प्रथमपूज्य भगवान गणेश के साथ-साथ सभी गुरुजन व शिक्षक-वृंद का स्मरण भी हो रहा है ;जिन्होंने मुझे इस क़ाबिल बनाया। जीवन की अर्द्धशती के इस मोड़ पर आते- आते अनेक नाम जुड़ते चले गए ,जिनसे बहुत-कुछ सीखा। कुछ शिक्षकों के नाम अभी भी याद हैं ,तो अतीत का साया आ जाने से यादों के दर्पण में कुछ  की छवि कुछ धुँधली हो चली है ;परंतु उनकी सीख और उनके गुण मेरे ज़हन में उतर कर ,परिश्रम की आँच में पिघलकर ,नए साँचे में ढल चुके हैं। नवीन रूप लेकर मेरे कार्यों में आज भी जीवंत रूप में दृष्टिगोचर हैं।  आज मैं श्रद्धावनत होकर उस प्रत्येक शिक्षक को नमन करती हूँ ,जिसने मुझे शिक्षक की प्रतिकृति का रूप दिया। सीखने का क्रम निरंतर जारी है ;अत: बड़ों -छोटों , साथियों के साथ सिखाने वाले प्रकृति के सभी उपादानों को मेरा कोटिश: नमन व हार्दिक शुभकामनाएँ स्वीकार हों !
"धन्य है हम

भाव-विह्वल है मन

गुरु-शिष्य का।

 (05-09-16)
२२८-प्रताप नगर,खातीपुरा रोड
वशिष्ठ मार्ग ,वैशाली नगर
जयपुर ,राजस्थान (३०२०२१)