पथ के साथी

Wednesday, February 24, 2016

619



रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

जो अन्न यहाँ का खाते हैं, 
गुण गद्दारों के गाते हैं 
जो जमे हमारे ही घर में
हमको ही आँख दिखाते हैं ।
          भले आदमी का बेटा  जब
          सीमा पर जान गवाँता है
          घर में आग लगाने वाला
          तब हम पर ही गुर्राता  है ।

 खुले आम जो कहें  देश को-
 ‘तुमको टुकड़ों में बाँटेंगे।’
  कान खोलकर के सुन लेना-  
  ‘तुमको टुकड़ों में काटेंगे।’
          जो विषधर  पले आस्तीन में
          अब उन्हीं के  फन कुचलने हैं
          हर बस्ती हर  चौराहे पर
          भारत के दुश्मन जलने हैं ।
देश की खातिर वीर जवान
सीमा पर जान लुटाते हैं
उनके बलिदानों को भूले
ये श्वान यहाँ गुर्राते हैं 
          हमको  है कसम तिरंगे की
          जो हमको आँख दिखाएँगे
          साँस हमारी जब तक बाकी
          वे यमपुर   भेजे जाएँगे।
-0-
24 फ़रवरी , 2016  ( 12-50)

Tuesday, February 23, 2016

618



वक्त का पहिया  
 कमला घटाऔरा

जीवन की व्यस्तता ने
इतने भी पल न दिए
पूछो हाल उनका
छोड़ आ जिन्हें पीछे
परदेस आकर
बढ़ने को आगे
जमाने के साथ
वक्त इतना निर्मम नहीं
देता है हर क्षण
सब को उसके हिस्से का
तक़सीम करके
क्यों समझने लगे
खुद को कुछ ख़ास तुम
वक्त ठहर जागा
तुम्हारे लिए कुछ देर को
एक और मौका देने को
की पा लो प्यार उनका,
तुम्हारी ख़ुशी के वास्ते
जिन्होंने चुन लिया वीराना
उगाकर जो सूर्य तेरे घर का
चले गए उस पार
न आने के लिए।

बैठे रहे थे जो राह में
मिलने की चाह लिये
बाँटने को खुशियाँ तुम्हारीं
पलक पाँवड़े बिछा
अब याद आई उनकी ?
किसे करके फोन
पूछते हो हाल
अपनों का, बेगानों का
जिन के घर आँगन
चहकते घूमते थे
तुतलाते बतियाते
सवालों की झड़ी लगाते
सब छोड़कर चले गए
वो दिल से चाहने वाले
निःस्वार्थ प्यार लुटाने वाले
वो वुज़ुर्ग अपने
अपनों से बढ़कर बेगाने
विदा हो गए
एक एक करके
फिर न लौटने के लिए
चेतना था वक्त से पहले
अब बैठो मलो हाथ
वक्त का पहिया
उल्टा नहीं घूमता। 
-0-

Saturday, February 20, 2016

617



1-गा बसंत
-पुष्पा मेहरा

यह क्रम अनंत , यह क्रम अनंत
देखो ! फिर आया है बसंत ,
उजड़े कितने भी वन उपवन
फूलों के यौवन पर प्रहार
कितना भी असहनीय करे काल
जितना भी शेष बचेगा जग में
वह जीते जी सुरभि बिखेरेगा ,
यह क्रम अनंत, यह क्रम अनंत
देखो! फिर आया है बसंत ।
कोयल की तानें सुनने को
फूली अमराई भी क्यों न
पगला जा , मिठ्ठू की तान-
आलाप सुनने की खातिर चाहें
कितने भी कान तरस जाएँ,
तितली- दल रूठे ना आ
निज जीवन की आहुति दे दें,
ठिठुरे भौंरे भी  ना जागें ,
कमलों के मुख का हास सखे !
जल में निज रूप- निहार बुझे
इक सूनापन अपना गीत रचे,
सौन्दर्य अछूता रह जा ,
सर- सरिताओं की धाराएँ
वेग  विहीन हो कसमसाएँ -
और टूट कर बिखर जाएँ
मधुसिक्त कलियाँ निज
मधु आसव होंठों में लिये
सदा को सो जाएँ ,
कितने पट , कितने ही झरोखे
ये बेसुध मानव खोले और बंद करे-
पर जब जब घूमेगा प्रकृति-चक्र
तब तब आगा बसंत।
देखो! आ गया ऋतुराज बसंत
तो मिलकर बैठें,शृंगार रचें, कि
मीठी धूप का आँचल पा,
हल्दी कुमकुम ,सुहाग भाग पा
धरा सदा सुहागन कहला
वन उपवन फिर से सज जाएँ
रूठे भी वापस आ जाएँ
मंगलाचरण से भोर सजे,
 नदियाँ चरणोदक लायें
कामराज के स्वागत को
पाखीदल सारे लौट पड़ें
फूलों से नत वल्लरियाँ
निज आसव भी नित नित ढालें
तितली- भौंरे भी मिलजुलके
विरुदावलियाँ गानें आ जाएँ
यह रूखापन जो उसको
यहाँ इस बार मिला
आगे न कभी मिलने पा
आयें हैं ऋतुराज तो रूठ के
ना जानें पायें ,
देखो ! आया है बसंत
लाया है खुशियाँ अनंत
फिर लौट के आया है बसंत
फिर- फिर आगा बसंत !!
-0-
2-उड़ने की चाह

डॉ सिम्मी भाटिया

छटपटाता  पाखी
बन्द पिंजरे में
उड़ने की है चाह
नही जानता-
निर्मम है दुनिया
जाल फैला
बैठा हर बहेलिया
फिर भी
उड़ने को आतुर,
नदी झरने बहे
फिर भी प्यासा
नर हुआ जीवन
पंख कटे
हो गया घायल
मिलेगी निराशा
असहाय पीड़ा
क्षुब्ध मन
गिनती की साँसें
जीवन का अंत !!
-0-

Friday, February 12, 2016

616

अनिता ललित
1
हे माँ! वीणा वादिनी, दो मुझको वरदान
आखर-आखर में ढलूँ, भर दूँ उनमें प्रान
भर दूँ उनमें प्रान, चुनूँ हर पथ के काँटे  
सुमन-सुवासित भाव, व्यथा हर मन की बाँटे
जीवन का उल्लास, मिले इन चरणों में माँ   
रख दो सिर पर हाथ, तृप्त मन कर दो, हे माँ !!
2
अधर-अधर मुस्का दिया, मन पुलकित है आज
ताज बसंती पहनकर, आए हैं ऋतुराज
आए हैं ऋतुराज, धरा भी है हर्षाई
पीली सरसों संग, हुई है आज सगाई
थिरक रहा है गगन, हवा लहराती चूनर
दिल में उठे तरंग, फूल हुए कोमल अधर।।

-0-