पथ के साथी

Monday, August 18, 2014

लो शाम हुई

रामेश्वर काम्बोज हिमांशु
1सेदोका
1
लो शाम  हुई 
भोर के स्वप्न मरे
दोपहर रो पड़ी,
प्यार खो गया
धूल भरी  आँधियाँ।
नीड तोड़ती गई ।
[कैनेडा-3-40 अपराह्न-24 जुलाई-2014;भारतीय समय: 25 जुलाई पूर्वाह्न 1-10 बजे,माता जी की मृत्यु से 10 मिनट  पहले]
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मुक्तक
1
सूरज की किरनों का जग में  व्यापार नहीं होता ।
अपनेपन से बढ़कर रिश्तों  का सार  नहीं  होता  
जिसको चाहा  दो पल उसको सब कुछ  करना अर्पण
बदले में कोई  कुछ माँगे , वह प्यार नहीं होता ।।
2
बोझ ज्ञान का ढोकरके  कोई गुणवान्  नहीं  बनता , 
जड़े खोदकर औरों की नेक इंसान नहीं बनता  
सारा जीवन जिया है जिसने केवल अपनी खातिर ,
 है अभिशाप का रूप वह ,कभी  वरदान नहीं  बनता ।।
(16 अगस्त-14)
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Friday, August 15, 2014

स्वतंत्रता का साज़



1-पुष्पा मेहरा 

 धरा विहँस रही, गगन मुस्करा रहा ,
 सजा के तारकों के दीप, चाँद गीत गा रहा।

 डाल-डाल डोलती,हर पात गीत गा रहा ,
 स्वतंत्रता के साज़ पर सुर से सुर मिला रहा ।

 सब ओर जयघोष से, नवप्रभात प्रमुदित हुआ ,
 माँ भारती का लाल हर तिरंगा ले निकल पड़ा ।

 लख नवोल्लास आज कण-कण मुखरित हुआ ,
 कुंज-कुंज घूम पवन मकरंद - आसव भर रहा ।

 लतर-लतर खिली कली, फूल संदेश दे रहा,
 आज पावन ध्वज तिरंगा नूतन छटा दिखला रहा।

 मुक्त गगन में डोल-डोल, उन्मुक्त लहरा रहा,
 बंधन विहीन जलधि दुग्धफेन चढ़ा रहा 

 हिममंडित हिमालय - धवल शृंग-शृंग मुस्करा रहा,
 रवि-किरण - निकर निकल, स्वर्ण कलश लुटा रहा ।

 नव शृंगार धार पवन चिर संदेश दे रहा -

 शत्रुता के शूल हटें, मित्रता की धरा रचें,
 छल-दंभ, ऊँच नीच,अहंकार से बचें।

 सत् का दीप जला  असत् का तिमिर हरें ,
 ज्ञान की लौ से लौ आगे बढ़ जलाते चलें ।

 शीर्ष पर तिरंगा उठा दुर्गम पथ पार करें,
 रथ स्वतंत्रता का सदा बढ़ता रहे, बढ़ता रहे ।
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 पुष्पा मेहरा, बी-201, सूरजमल विहार, दिल्ली-110092

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2-सुशीला शिवराण


आज़ादी है फ़र्ज़ भी, नहीं सिर्फ़ अधिकार।

काश दिलों में रोप लें, सब जन यही विचार॥
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Thursday, August 14, 2014

परी नदी

1-परी नदी
-डॉ०क्रांति कुमार, पूर्व प्राचार्या केन्द्रीय विद्यालय

कल- कल, छल छल का निनाद कर
हहराती कहाँ चली प्रिये
श्वेत शुभ्र फेनि वस्त्रों में
इठलाती ले चली हिये ।

पल भर रुक जा ,दो बातें कर
इतनी भी है क्या जल्दी
मतवाली बन होश न खोना
सुध तो ले जन जीवन की।

तट पर बसे नगर अनेकों
हरे खेत और देवालय
सिंचित कर औ प्यास बुझा कर
मधुमय कर दे जन जीवन।

माना कि गति ही है जीवन
पर इतनी भी क्या जल्दी
पथ के पथिकों से मिलती जा
अरी , रुको ओ परी नदी।
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2-कृष्णा वर्मा
1-अभिलाषा 

जब-जब चाहा इस जीवन से
इसने सब भरपूर दिया
नहीं शिकायत कोई रब से
गले-गले सुख पूर दिया।

यूँ तो सदा सरल सुगम से
जीवन की की थी अभिलाषा
करुणाकर थी विधना मुझपर
पूर्ण हुईं मनचाही आशा।

प्रीत बनी प्रिय की मेरी शक्ति
धर संसार हुआ मेरी भक्ति
सहज फूल दो खिले सहन में
हर्षित मन ज्यों चाँद गगन में।

नहीं नैराश्य का संग अपनाया
संयम ही मुझे पग-पग भाया
दिन सुन्दर बने सांझ कुनकुनी
अपनों संग रही खुशी ठुमकती।

चली निरंतर पाने गंतव्य
मंज़िल पा गए लगभग मंतव्य
प्रिय का सुख सुत श्रवण मिले हैं
नहीं जीवन से मुझको गिले हैं।

बेटी की भी कमी रही ना
जब बेटी सी बहू घर आई
बेटे के बेटे ने जन्म ले
रिश्तों में मृदु गाँठ लगाई


मिले-जुले अनुभव जिए सारे
ढली उम्र के सुखद सहारे
जीवन अतल भरा यादों से
रही शिष्ट निज के वादों से।

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2-आँखों का उलाहना

देती हैं मेरी आँखें
मुझे नित्य उलाहना
बे वक्त जगाने का
यह तुमने क्या ठाना
चर्राया यह क्या तुम्हें
कविताओं का शौक
लगा कहाँ से लिखने का
यह संक्रामक रोग
आँखों को शिकायत है
मेरी कविताई से
उल्लू सा जगा रखते
भावों की लिखाई में
ख़्यालों के शिकंजे में
जब-तब घिर जाते हो
बेचैन हृदय होता
सज़ा हमें सुनाते हो
दिल बंजर धरती- सा
ना पानी ना माटी
जाने दुख-सुख की कैसे
चित्तवृत्ति उग आती
घंटों तकें शून्य में हम
नभ की गहराई में
इक वाक्य बनाने को
शब्दों की जुटाई में
सोचों का सफर लम्बा
कर-कर हम थक जातीं
दरबान- सी पलकें भी
झपकन को तरस जातीं
कविताओं का घुन कुतरे
नींदों के किनारों को
बरबस तुम बाँधा करो
बेबाक विचारों को
यह भाव निगोड़े क्या 
मकड़ी के भतीजे है
बिन ताने-बाने के
कविता बुन लेते है
दिन-रात मगजमारी
इक कवि कहलाने को
शब्दों को उमेठते हो
कुछ तालियाँ पाने को
जब तक कलम चले
हमें संग जगाते हो
भावों के प्रवाहों पे
क्यूँ ना बाँध लगाते हो
मुई यह कविताएँ  क्यूँ
फिरें दिन में आवारा
जब कौली भरे रजनी
खटकातीं आ मन द्वारा।
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3- रेखा रोहतगी
 सतरंगी  सपने

सतरंगी  सपने
धुआँ - धुआँ  से हुए रिश्ते
बदगुमाँ हुए  लोग
जिंदगी भर हम
अपनेपन के लिए
तरसते रहे
गले में हुई रस्सी
हाथों की बनी हथकड़ी
जिन्हें जिन्दगी भर हम
गहने समझ
सजते-सँवरते रहे
राख-सा  लिबास
मटमैला आँचल  पहन
जिन्दगी भर हम
सतरंगी सपने
बुनते रहे
काँटों की चुभन
अँगारों की जलन  लिये
एक आसान जिन्दगी के लिए
जिन्दगी भर हम
पते रहे
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