एक महात्मा जी और एक डाकू को चित्रगुप्त के सामने पेश किया गया । चित्रगुप्त ने अपना बहीखाता खोला। गम्भीर स्वर में बोले–‘‘महात्मा जी, आपने अपने जीवन में तीन–चौथाई पुण्य किए हैं और एक–चौथाई पाप। कौन–सा भोग आपको पहले चाहिए?’’
महात्मा जी संयत स्वर में बोले–‘‘पापों का फल पहले भोग लूँ। उसके बाद तो स्वर्ग का आनन्द प्राप्त होगा ही।’’
चित्रगुप्त ने डाकू की ओर संकेत किया–‘‘अब तुम बतलाओ। तुमने तीन–चौथाई पाप किए हैं और एक चौथाई पुण्य।’’
डाकू चुप रहा।
महात्मा जी मुस्कराए।
‘‘कहिए, तुम्हें पहले क्या चाहिए?’’ चित्रगुप्त ने टोका।
नरक–यातना तो भोगनी ही है। पहले स्वर्ग का आनन्द क्यों न उठा लूँ?’’
‘‘ठीक है। यमराज जी से अन्तिम स्वीकृति लेकर व्यवस्था करा देता हूँ।’’
डाकू ने प्रसन्नता प्रकट की और बढ़कर चित्रगुप्त जी से खुसर–पुसर की।
तत्पश्चात् महात्मा जी को नरक के यातना केन्द्र पर भेज दिया गया और डाकू को स्वर्ग में। आज तक दोनों नरक तथा स्वर्ग भोग रहे हैं।
पथ के साथी
Thursday, January 31, 2008
संस्कार
साहब के बेटे और कुत्ते में विवाद हो गया। साहब का बेटा कहे जा रहा था–‘‘यहाँ बंगले में रहकर तुझे चोंचले सूझते हैं। और कहीं होते तो एक–एक टुकड़ा पाने के लिए घर–घर झाँकना पड़ता। यहाँ बैठे–बिठाए बढ़िया माल खा रहे हो। ज्यादा ही हुआ तो दिन में एकाध बार आने–जाने वालों पर गुर्रा लेते हो।’’
कुत्ता हँसा–‘‘तुम बेकार में क्रोध करते हो। अगर तुम भिखारी के घर पैदा हुए होते तो मुझसे और भी ईर्ष्या करते। जूठे पत्तल चाटने का मौका तक न मिल पाता। तुम यहीं रहो, खुश रहो, यही मेरी इच्छा है।’’
‘‘मैं तुम्हारी इच्छा से यहाँ रह रहा हूँ? हरामी कहीं के।’’ साहब का बेटा भभक उठा।
कुत्ता फिर हँसा–‘‘अपने–अपने संस्कार की बात है। मेरी देखभाल साहब और मेमसाहब दोनों करते हैं। मुझे कार में घुमाने ले जाते हैं। तुम्हारी देखभाल घर के नौकर–चाकर करते हैं। उन्हीं के साथ तुम बोलते–बतियाते हो। उनकी संगति का प्रभाव तुम्हारे ऊपर ज़रूर पड़ेगा। जैसी संगति में रहोगे, वैसे संस्कार बनेंगे।’’
साहब के बेटे का मुँह लटक गया। कुत्ता इस स्थिति को देखकर अफसर की तरह ठठाकर हँस पड़ा।
कुत्ता हँसा–‘‘तुम बेकार में क्रोध करते हो। अगर तुम भिखारी के घर पैदा हुए होते तो मुझसे और भी ईर्ष्या करते। जूठे पत्तल चाटने का मौका तक न मिल पाता। तुम यहीं रहो, खुश रहो, यही मेरी इच्छा है।’’
‘‘मैं तुम्हारी इच्छा से यहाँ रह रहा हूँ? हरामी कहीं के।’’ साहब का बेटा भभक उठा।
कुत्ता फिर हँसा–‘‘अपने–अपने संस्कार की बात है। मेरी देखभाल साहब और मेमसाहब दोनों करते हैं। मुझे कार में घुमाने ले जाते हैं। तुम्हारी देखभाल घर के नौकर–चाकर करते हैं। उन्हीं के साथ तुम बोलते–बतियाते हो। उनकी संगति का प्रभाव तुम्हारे ऊपर ज़रूर पड़ेगा। जैसी संगति में रहोगे, वैसे संस्कार बनेंगे।’’
साहब के बेटे का मुँह लटक गया। कुत्ता इस स्थिति को देखकर अफसर की तरह ठठाकर हँस पड़ा।
मुखौटा
नेताजी को चुनाव लड़ना था। जनता पर उनका अच्छा प्रभाव न था। इसके लिए वे मुखौटा बेचने वाले की दूकान में गए। दूकानदार ने भालू, शेर, भेडिए,साधू–संन्यासी के मुखौटे उसके चेहरे पर लगाकर देखे। कोई भी मुखौटा फिट नहीं बैठा। दूकानदार और नेताजी दोनों ही परेशान।
दूकानदार को एकाएक ख्याल आया। भीतर की अँधेरी कोठरी में एक मुखौटा बरसों से उपेक्षित पड़ा था। वह मुखौटा नेताजी के चेहरे पर एकदम फिट आ गया। उसे लगाकर वे सीधे चुनाव–क्षेत्र में चले गए।
परिणाम घोषित हुआ। नेताजी भारी बहुमत से जीत गए। उन्होंने मुखौटा उतारकर देखा। वे स्वयं भी चौंक उठे–वह इलाके के प्रसिद्ध डाकू का मुखौटा था।
दूकानदार को एकाएक ख्याल आया। भीतर की अँधेरी कोठरी में एक मुखौटा बरसों से उपेक्षित पड़ा था। वह मुखौटा नेताजी के चेहरे पर एकदम फिट आ गया। उसे लगाकर वे सीधे चुनाव–क्षेत्र में चले गए।
परिणाम घोषित हुआ। नेताजी भारी बहुमत से जीत गए। उन्होंने मुखौटा उतारकर देखा। वे स्वयं भी चौंक उठे–वह इलाके के प्रसिद्ध डाकू का मुखौटा था।
Tuesday, January 1, 2008
Sunday, December 23, 2007
Saturday, December 22, 2007
विवाह –गीत
अन्दर से लाड्डो बाहर निकलो
कँवर चौंरी चढ़ गयौ
होय लो न रुकमण सामणी ।
-मैं कैसे निकलूँ मेरे कँवर रसिया
लखिया सा बाबा मेरी सामणी ।
तेरे बाबा को अपणी दादी दिला दूँ
होय लो न रुकमण सामणी ।
-मैं कैसे निकलूँ मेरे कँवर रसिया
लखिया सा ताऊ मेरी सामणी
तेरे ताऊ को अपणी ताई दिला दूँ
होय लो न रुकमण सामणी
-मैं कैसे निकलूँ मेरे कँवर रसिया
लखिया सा भाई मेरी सामणी
तेरे भाई को अपणी बाहण दिला दूँ
होय लो न रुकमण सामणी
-मैं कैसे निकलूँ मेरे कँवर रसिया
लखिया सा बाबुल मेरी सामणी
तेरे बाबुल को अपणी अम्मा दिला दूँ
होय लो न रुकमण सामणी ।
कँवर चौंरी चढ़ गयौ
होय लो न रुकमण सामणी ।
-मैं कैसे निकलूँ मेरे कँवर रसिया
लखिया सा बाबा मेरी सामणी ।
तेरे बाबा को अपणी दादी दिला दूँ
होय लो न रुकमण सामणी ।
-मैं कैसे निकलूँ मेरे कँवर रसिया
लखिया सा ताऊ मेरी सामणी
तेरे ताऊ को अपणी ताई दिला दूँ
होय लो न रुकमण सामणी
-मैं कैसे निकलूँ मेरे कँवर रसिया
लखिया सा भाई मेरी सामणी
तेरे भाई को अपणी बाहण दिला दूँ
होय लो न रुकमण सामणी
-मैं कैसे निकलूँ मेरे कँवर रसिया
लखिया सा बाबुल मेरी सामणी
तेरे बाबुल को अपणी अम्मा दिला दूँ
होय लो न रुकमण सामणी ।
लड़की की इच्छाएँ
लाड्डो मँगना हो सो माँग
राम रथ हाँक दिए।
मैं तो माँगूँ अयोध्या का राज
ससुर राजा दशरथ से ।
लाड्डो मँगना हो सो माँग
राम रथ हाँक दिए।
मैं तो माँगूँ कौशल्या –सी सास
देवर छोटे लछमन से ।
लाड्डो मँगना हो सो माँग
राम रथ हाँक दिए।
मैं तो माँगूँ श्रीभगवान
पलंगों पै बैठी राज करूँ ।
लाड्डो मँगना हो सो माँग
राम रथ हाँक दिए।
राम रथ हाँक दिए।
मैं तो माँगूँ अयोध्या का राज
ससुर राजा दशरथ से ।
लाड्डो मँगना हो सो माँग
राम रथ हाँक दिए।
मैं तो माँगूँ कौशल्या –सी सास
देवर छोटे लछमन से ।
लाड्डो मँगना हो सो माँग
राम रथ हाँक दिए।
मैं तो माँगूँ श्रीभगवान
पलंगों पै बैठी राज करूँ ।
लाड्डो मँगना हो सो माँग
राम रथ हाँक दिए।
Wednesday, December 19, 2007
बन्नी –गीत( माँ की सीख -हास –परिहस)
बन्नी –गीत( माँ की सीख -हास –परिहस)
आर्यों का प्रण निभाइयो मेरी लाड्डो
जै तेरा ससुरा मन्दी ऐ बोल्लै
पत्थर की बण जाइयो मेरी लाड्डो
आर्यों का प्रण निभाइयो मेरी लाड्डो
जो तेरी सासु गाळी ऐ देगी
ले मूसळ गदकाइयो मेरी लाड्डो
आर्यों का प्रण निभाइयो मेरी लाड्डो
जो तेरा जेठा मन्दी ऐ बोल्लै
घूँघट मैं छिप जाइयो मेरी लाड्डो
आर्यों का प्रण निभाइयो मेरी लाड्डो
जो तेरी जिठाणी गाळी देगी
ले सोट्टा गदकाइयो मेरी लाड्डो ।
आर्यों का प्रण निभाइयो मेरी लाड्डो
जो तेरा देवरा मन्दी ऐ बोल्लै
हाँसी मैं टळ जाइयो मेरी लाड्डो
आर्यों का प्रण निभाइयो मेरी लाड्डो
जो तेरी नणदा गाळी ऐ देगी
चुटिया पकड़ घुमाइयो मेरी लाड्डो
आर्यों का प्रण निभाइयो मेरी लाड्डो
जो तेरा राजा मन्दी ऐ बोल्लै
कुछ न पलट कै कहियो मेरी लाड्डो ।
आर्यों का प्रण निभाइयो मेरी लाड्डो
लोकगीत
रंग का गीत
एक रंगमहल की खूँट
जिसमें कन्या नै जनम लिया ।
बाबा तुम क्यों हारे हो
दादसरा म्हारा जीत चला ।
एक रंगमहल की खूँट…………
पोती तेरे कारण हारा हे
पोते के कारण जीत चला ।
एक रंगमहल की खूँट………
उसके पिताजी को फिकर पड़ ग्या
पिताजी तुम क्यों हारे हो
ससुरा तो म्हारा जीत चला ।
एक रंगमहल की खूँट………।
बेटी तेरे कारण हारा हे
बेटे के कारण जीत चला ।
एक रंगमहल की खूँट………
…
काला पति
काले री बालम मेरे काले,
काले री बालम मेरे काले ।
जेठ गए दिल्ली ससुर बम्बई,
काला गया री कलकता नगरिया ,
काले री बालम मेरे काले ।
जेठ लाए लड्डू ,ससुर लाए बर्फ़ी,
काला लाया री काली गाजर का हलुआ,
काले री बालम मेरे काले ।
जेठ लाए साड़ी , ससुर लाए अँगिया ,
काला लाया री ,काली साटन का लहँगा ,
काले री बालम मेरे काले ।
जेठ लाए गुड्डा ,ससुर लाए गुड़िया
काला लाया री ,काली कुत्ती का पिल्ला ,
काले री बालम मेरे काले ।
>>>>>>>>>>>>>>>>>
एक रंगमहल की खूँट
जिसमें कन्या नै जनम लिया ।
बाबा तुम क्यों हारे हो
दादसरा म्हारा जीत चला ।
एक रंगमहल की खूँट…………
पोती तेरे कारण हारा हे
पोते के कारण जीत चला ।
एक रंगमहल की खूँट………
उसके पिताजी को फिकर पड़ ग्या
पिताजी तुम क्यों हारे हो
ससुरा तो म्हारा जीत चला ।
एक रंगमहल की खूँट………।
बेटी तेरे कारण हारा हे
बेटे के कारण जीत चला ।
एक रंगमहल की खूँट………
…
काला पति
काले री बालम मेरे काले,
काले री बालम मेरे काले ।
जेठ गए दिल्ली ससुर बम्बई,
काला गया री कलकता नगरिया ,
काले री बालम मेरे काले ।
जेठ लाए लड्डू ,ससुर लाए बर्फ़ी,
काला लाया री काली गाजर का हलुआ,
काले री बालम मेरे काले ।
जेठ लाए साड़ी , ससुर लाए अँगिया ,
काला लाया री ,काली साटन का लहँगा ,
काले री बालम मेरे काले ।
जेठ लाए गुड्डा ,ससुर लाए गुड़िया
काला लाया री ,काली कुत्ती का पिल्ला ,
काले री बालम मेरे काले ।
>>>>>>>>>>>>>>>>>
शिशु-जन्म
शिशु-जन्म
होलर का बाबा यूँ कहै-
तुम खरचो दाम बतेरे
होलर की दादी ये कहै-
होलर कै हुण्डी लाया
सिर ते सरफुल्ला आया
पैरों से नंगा आया
हाथों की मुट्ठी भींच कै
सिर पै झण्डूले लाया ।
होलर का ताऊ यूँ कहै-
तुम खरचो दाम बतेरे
होलर की ताई यूँ कहै-
होलर कै हुण्डी लाया
सिर ते सरफुल्ला आया
पैरों से नंगा आया
हाथों की मुट्ठी भींच कै
सिर पै झण्डूले लाया ।
>>>>>>>>>>>>>>>>
1-होलर =नवजात शिशु ;
2-सरफुल्ला =नंगे सिर
3-झण्डूले = बच्चे के सिर के नवजात बाल
>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>
होलर का बाबा यूँ कहै-
तुम खरचो दाम बतेरे
होलर की दादी ये कहै-
होलर कै हुण्डी लाया
सिर ते सरफुल्ला आया
पैरों से नंगा आया
हाथों की मुट्ठी भींच कै
सिर पै झण्डूले लाया ।
होलर का ताऊ यूँ कहै-
तुम खरचो दाम बतेरे
होलर की ताई यूँ कहै-
होलर कै हुण्डी लाया
सिर ते सरफुल्ला आया
पैरों से नंगा आया
हाथों की मुट्ठी भींच कै
सिर पै झण्डूले लाया ।
>>>>>>>>>>>>>>>>
1-होलर =नवजात शिशु ;
2-सरफुल्ला =नंगे सिर
3-झण्डूले = बच्चे के सिर के नवजात बाल
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खड़ी बोली के लोकगीत
1-जच्चा -गीत
जच्चा मेरी भोली –भाली री
के जच्चा मेरी लड़णा ना जाणै री
सास-नणद की चुटिया फाड़ै
आई गई का लहँगा री
के जच्चा मेरी लड़णा ना जाणै री
ससुर –जेठ की मूछैं फाड़ै
आए- गए का खेस उतारै
के जच्चा मेरी लड़णा ना जाणै री
जच्चा मेरी भोली –भाली री
>>>>>>>>>>>
2- जच्चा -गीत
मैं याणी-स्याणी मेरा घर न लुटा दियो
मैं याणी-स्याणी मेरा घर न लुटा दियो ।
सासू की जगह मेरी अम्मा को बुला दियो
मैं याणी-स्याणी मेरा घर न लुटा दियो
सासू का नेग मेरी अम्मा को दिला दियो
बक्से चाबी मेरी चोटी मैं बाँध दियो
मैं याणी-स्याणी मेरा घर न लुटा दियो ।
ननद की जगह मेरी बहना को बुला दियो
ननदण का नेग मेरी बहना को दिला दियो
मैं याणी-स्याणी मेरा घर न लुटा दियो ।
जच्चा मेरी भोली –भाली री
के जच्चा मेरी लड़णा ना जाणै री
सास-नणद की चुटिया फाड़ै
आई गई का लहँगा री
के जच्चा मेरी लड़णा ना जाणै री
ससुर –जेठ की मूछैं फाड़ै
आए- गए का खेस उतारै
के जच्चा मेरी लड़णा ना जाणै री
जच्चा मेरी भोली –भाली री
>>>>>>>>>>>
2- जच्चा -गीत
मैं याणी-स्याणी मेरा घर न लुटा दियो
मैं याणी-स्याणी मेरा घर न लुटा दियो ।
सासू की जगह मेरी अम्मा को बुला दियो
मैं याणी-स्याणी मेरा घर न लुटा दियो
सासू का नेग मेरी अम्मा को दिला दियो
बक्से चाबी मेरी चोटी मैं बाँध दियो
मैं याणी-स्याणी मेरा घर न लुटा दियो ।
ननद की जगह मेरी बहना को बुला दियो
ननदण का नेग मेरी बहना को दिला दियो
मैं याणी-स्याणी मेरा घर न लुटा दियो ।
Saturday, December 8, 2007
मारे जाएँगे
राजेश जोशी
जो इस पागलपन में शामिल नहीं होंगे
मारे जाएँगे
कटघरे में खड़े कर दिए जाएँगे,जो विरोध में बोलेंगे
जो सच-सच बोलेंगे,मारे जाएँगे
बर्दाश्त नहीं किया जाएगा कि किसी की कमीज़ हो
‘उनकी’ कमीज़ से ज़्यादा सफ़ेद
कमीज़ पर जिनकी दाग़ नहीं होंगे , मारे जाएँगे
धकेल दिए जाएँगे कला की दुनिया से बाहर
जो चारण नहीं
जो गुन नहीं गाएँगे , मारे जाएँगे
धर्म की ध्वजा उठाए जो नहीं जाएँगे जुलूस में
गोलियाँ भून डालेंगी उन्हें, काफ़िर करार दिए जाएँगे
सबसे बड़ा अपराध है उस समय
निहत्थे और निरपराध होना
जो अपराधी नहीं होंगे
मारे जाएँगे ।[श्री राजेश जोशी की यह कविता ‘कविता आजकल’ संग्रह (प्रकाशन विभाग सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय भारत सरकार, पटियाला हाउस,नई दिल्ली मूल्य 30 रुपए)से ली गई है। अच्छी कविताएँ बहुत कम लिखी जा रही हैं और ऐसी धारदार यथार्थ के धरातल से जुड़ी कविताएँ और भी कम । हम जोशी जी और प्रकाशन विभाग के अत्यन्त आभारी हैं ।]
जो इस पागलपन में शामिल नहीं होंगे
मारे जाएँगे
कटघरे में खड़े कर दिए जाएँगे,जो विरोध में बोलेंगे
जो सच-सच बोलेंगे,मारे जाएँगे
बर्दाश्त नहीं किया जाएगा कि किसी की कमीज़ हो
‘उनकी’ कमीज़ से ज़्यादा सफ़ेद
कमीज़ पर जिनकी दाग़ नहीं होंगे , मारे जाएँगे
धकेल दिए जाएँगे कला की दुनिया से बाहर
जो चारण नहीं
जो गुन नहीं गाएँगे , मारे जाएँगे
धर्म की ध्वजा उठाए जो नहीं जाएँगे जुलूस में
गोलियाँ भून डालेंगी उन्हें, काफ़िर करार दिए जाएँगे
सबसे बड़ा अपराध है उस समय
निहत्थे और निरपराध होना
जो अपराधी नहीं होंगे
मारे जाएँगे ।[श्री राजेश जोशी की यह कविता ‘कविता आजकल’ संग्रह (प्रकाशन विभाग सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय भारत सरकार, पटियाला हाउस,नई दिल्ली मूल्य 30 रुपए)से ली गई है। अच्छी कविताएँ बहुत कम लिखी जा रही हैं और ऐसी धारदार यथार्थ के धरातल से जुड़ी कविताएँ और भी कम । हम जोशी जी और प्रकाशन विभाग के अत्यन्त आभारी हैं ।]
Saturday, November 24, 2007
ग्रहण
सुकेश साहनी
“पापा राहुल कह रहा था कि आज तीन बजे---” विक्की ने बताना चाहा ।“चुपचाप पढ़ो!” उन्होंने अखबार से नजरें हटाए बिना कहा, “पढ़ाई के समय बातचीत बिल्कुल बंद !”“पापा कितने बज गए?” थोड़ी देर बाद विक्की ने पूछा।“तुम्हारा मन पढ़ाई में क्यों नहीं लगता? क्या ऊटपटांग सोचते रहते हो? मन लगाकर पढ़ाई करो, नहीं तो मुझसे पिट जाओगे।”विक्की ने नजरें पुस्तक में गड़ा दीं ।“पापा! अचानक इतना अँधेरा क्यों हों गया है?” विक्की ने ख़िड़की से बाहर ख़ुले आसमान को एकटक देख़ते हुए हैरानी से पूछा। अभी शाम भी नहीं हुई है और आसमान में बादल भी नहीं हैं! राहुल कह रहा था---“विक्की!!” वे गुस्से में बोले-ढेर सारा होमवर्क पड़ा है और तुम एक पाठ में ही अटके हो!”“पापा, बाहर इतना अँधेरा---” उसने कहना चाहा ।“अँधेरा लग रहा है तो मैं लाइट जलाए देता हूँ। पाँच मिनट में पाठ याद न हुआ, तो मैं तुम्हारे साथ सुलूक करता हूँ?”विक्की सहम गया। वह ज़ोर-ज़ोर से याद करने लगा, “सूर्य और पृथ्वी के बीच में चंद्रमा आ जाने से सूर्यग्रहण होता है---सूर्य और पृथ्वी के बीच---”
“पापा राहुल कह रहा था कि आज तीन बजे---” विक्की ने बताना चाहा ।“चुपचाप पढ़ो!” उन्होंने अखबार से नजरें हटाए बिना कहा, “पढ़ाई के समय बातचीत बिल्कुल बंद !”“पापा कितने बज गए?” थोड़ी देर बाद विक्की ने पूछा।“तुम्हारा मन पढ़ाई में क्यों नहीं लगता? क्या ऊटपटांग सोचते रहते हो? मन लगाकर पढ़ाई करो, नहीं तो मुझसे पिट जाओगे।”विक्की ने नजरें पुस्तक में गड़ा दीं ।“पापा! अचानक इतना अँधेरा क्यों हों गया है?” विक्की ने ख़िड़की से बाहर ख़ुले आसमान को एकटक देख़ते हुए हैरानी से पूछा। अभी शाम भी नहीं हुई है और आसमान में बादल भी नहीं हैं! राहुल कह रहा था---“विक्की!!” वे गुस्से में बोले-ढेर सारा होमवर्क पड़ा है और तुम एक पाठ में ही अटके हो!”“पापा, बाहर इतना अँधेरा---” उसने कहना चाहा ।“अँधेरा लग रहा है तो मैं लाइट जलाए देता हूँ। पाँच मिनट में पाठ याद न हुआ, तो मैं तुम्हारे साथ सुलूक करता हूँ?”विक्की सहम गया। वह ज़ोर-ज़ोर से याद करने लगा, “सूर्य और पृथ्वी के बीच में चंद्रमा आ जाने से सूर्यग्रहण होता है---सूर्य और पृथ्वी के बीच---”
मैं कैसे पढ़ूँ ?
सुकेश साहनी
पूरे घर में मुर्दनी छा गई थी। माँ के कमरे के बाहर सिर पर हाथ रखकर बैठी उदास दाई माँ---रो-रोकर थक चुकी माँ के पास चुपचाप बैठी गाँव की औरतें । सफेद कपड़े में लिपटे गुड्डे के शव को हाथों में उठाए पिताजी को उसने पहली बार रोते देखा था----“शुचि!” टीचर की कठोर आवाज़ से मस्तिष्क में दौड़ रही घटनाओं की रील कट गई और वह हड़बड़ा कर खड़ी हो गई।“तुम्हारा ध्यान किधर है? मैं क्या पढ़ा रही थी----बोलो?” वह घबरा गई। पूरी क्लास में सभी उसे देख रहे थे।“बोलो!” टीचर उसके बिल्कुल पास आ गई।“भगवान ने बच्चा वापस ले लिया----।” मारे डर के मुँह से बस इतना ही निकल सका ।कुछ बच्चे खी-खी कर हँसने लगे। टीचर का गुस्सा सातवें आसमान को छूने लगा।“स्टैंड अप आन द बैंच !”वह चुपचाप बैंच पर खड़ी हो गई। उसने सोचा--- ये सब हँस क्यों रहे हैं, माँ-पिताजी, सभी तो रोये थे-यहाँ तक कि दूध वाला और रिक्शेवाला भी बच्चे के बारे में सुनकर उदास हो गए थे और उससे कुछ अधिक ही प्यार से पेश आए थे। वह ब्लैक-बोर्ड पर टकटकी लगाए थी, जहाँ उसे माँ के बगल में लेटा प्यारा-सा बच्चा दिखाई दे रहा था । हँसते हुए पिताजी ने गुड्डे को उसकी नन्हीं बाँहों में दे दिया था। कितनी खुश थी वह!“टू प्लस-फाइव-कितने हुए?” टीचर बच्चों से पूछ रही थी ।शुचि के जी में आया कि टीचर दीदी से पूछे जब भगवान ने गुडडे को वापस ही लेना था तो फिर दिया ही क्यों था? उसकी आँखें डबडबा गईं। सफेद कपड़े में लिपटा गुड्डे का शव उसकी आँखों के आगे घूम रहा था। इस दफा टीचर उसी से पूछ रही थी । उसने ध्यान से ब्लैक-बोर्ड की ओर देखा। उसे लगा ब्लैक-बोर्ड भी गुड्डे के शव पर लिपटे कपड़े की तरह सफेद रंग का हो गया है। उसे टीचर दीदी पर गुस्सा आया । सफेद बोर्ड पर सफेद चाक से लिखे को भला वह कैसे पढ़े?000000
Thursday, November 22, 2007
छ्ह कविताएँ

विपिन चौधरी
1-आड़े वक्त में
हर भरोसे को
पुड़िया में बाँध लेना चाहती हूँ मैं।
आने वाले वक्त में
इनके भरोसे से ही जीने की कोई
जुगत बिठानी पड़ेगी।
मुझ से मिलती- जुलती
सभी परछाइयों से दोस्ती कर लेना
चाहती हूँ मैं।
ताकि आड़े समय पर
उनकें द्वारों को
खटखटाया जा सके।
संवेदना का
छोटा- सा कतरा भी
निसंकोच उठा लेती हूँ मैं कि
मन का यह गागर
कभी भरे तो सही।
2-किरण पर हो सवार
लौट जाओ
उलटे पाँव
न ठिठको
एक पल भी रुकना
निषेध है यहाँ।
जंग लगे कपाट नहीं खुल पाएँगे
जानते नहीं हो
बरसो -बरस यहाँ
दूब का तिनका भी नहीं उगा।
क्या तलाशते हो यहाँ,
यहाँ वन -उपवन
कुछ भी शेष नहीं है।
पीछे कहीं पीछे
जब रचने की प्रकिया जारी थी
प्रतीक्षारत थी तब
कई आँखें
पर अब यहाँ कुछ भी
नहीं है बाकी।
पर फिर भी
आशावादियों के पक्षधर
रहे हो तुम
तलाश लो कोई
एक किरण
उतर जाओ
उस पर हो कर सवार
अंधेरे कुएँ में
जहाँ कुछ पौधे
धूप की इंतजार में अब भी हैं।
3-समय से दोस्ती
आखिरकार समय ने
मेरे भीतर से
रास्ता निकाल लिया है।
लदा- फदा, दौडता-फाँदता
उछलकूद करता
देर सवेर
लगभग हर पल गुजरता है
अब समय मेरे भीतर से।
तेज कानफोड़ू संगीत बजाता
आधुनिकता का जाम थामें
गुजरता हुआ
यह समय बेहद व्यस्त
है आजकलन ।
मैंने भी समय से
दोस्ती कर ली है
एक दूसरे का हाथ थामें
हमें हररोज चहलकदमी करते हुए
देखा जा सकता है।
4-अलविदा
सहजता से उसने
एक ही शब्द कहा-
‘अलविदा!’
पेडों ने सुना
धरती ने सुना
आकाश कब दूर था
उस तक भी
यह अतिम बार कहा गया
शब्द पहुँचा
अलविदा।
आज तक इस शब्द की
प्रतिध्वनियों को मुक्ति नहीं
मिल सकी है।
मेरे आस पास यह शब्द
आज भी उसी सहजता से
टकराता है
जिस सहजता से कहा गया था
कभी
‘अलविदा!’
5-अतीत, भविष्य, वर्तमान
उस सुसताए हुए
अतीत से
जुगलबंदी करना
अपने आप को
नीम बेहोश करने जैसा ही है।
भविष्य की ओर
टकटकी लगाकर
देर तक देखना
ऐसा है
मानो आकाश को और
अधिक चौड़ा कर देना।
वर्तमान से तो
कभी दोस्ती
हुई ही नही
हमेशा वह मुझ से
दो कदम आगे मिला
या दो कदम पीछे।
>>>
6-राग -विराग
शुक्ल पक्ष की
दूर तक फैली हुई
मधुर चाँदनी के नीचे
घेरे में बैठी
स्त्रियों का है यह
रंग- बिरंगा टोला।
छिटके दुख के पार जाने के
उम्मीद में सजी है उनकी
यह महफिल
तमाम आरोह- अवरोह के बीच
झाँकती जिंदगी को संगीत के
सतरंगी रंगों में
ढालने को आतुर हैं ये सभी।
हौले- हौले थाप देती
अपनी खुरदरी हो चुकी
हथेलियों से
घुंघट के धुंधले प्रकाश में
दिन भर खटती
रात के इस पहर
उपक्रम कर मीठा रस
छानती हैं ये सभी
अपने बेहद
सुरीले शब्दों से।
पर अब भी वे
खाली नहीं है
घर के राग- विराग से
उनीदें बच्चों को संभाले हुए वे
वे जल्दी जगाने की चिंता में
घुटी हुई हैं
फिर भी गीतों में एक सी
गति बनाती हुई।
उनके संगीत की लहरियाँ
जम्हाई लेती समूची दुनिया को
जगाने के लिये काफी हैं।
उनकी ढोलक का
उनकी मसरूफियत का
उनके दर्द का दौर
हर युग में जारी है
हमेशा उनके गीत- संगीत को
चाँदनी रातों ने दर्ज किया है।
उनकी आवाजें अब भी
नजदीक ही सुनाई दे रही है
जरा ध्यान से
आप- हम सुने।
थपक – थपक
थपक- थपक
थपक- थपक ।
>>
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कविताएँ,
पथ के साथी,
रचनाकार,
विपिन चौधरी
Tuesday, November 6, 2007
दिया जलता रहे
रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’
यह ज़िन्दगी का कारवाँ ,इस तरह चलता रहे ।
हर देहरी पर अँधेरों में दिया जलता रहे ॥
आदमी है आदमी तब ,जब अँधेरों से लड़े ।
रोशनी बनकर सदा ,सुनसान पथ पर भी बढ़े ॥
भोर मन की हारती कब ,घोर काली रात से ।
न आस्था के दीप डरते ,आँधियों के घात से ॥
मंज़िलें उसको मिलेंगी जो निराशा से लड़े ,
चाँद- सूरज की तरह ,उगता रहे ढलता रहे ।
जब हम आगे बढ़ेंगे , आस की बाती जलाकर।
तारों –भरा आसमाँ ,उतर आएगा धरा पर ॥
आँख में आँसू नहीं होंगे किसी भी द्वार के ।
और आँगन में खिलेंगे ,सुमन समता –प्यार के ॥
वैर के विद्वेष के कभी शूल पथ में न उगें ,
धरा से आकाश तक बस प्यार ही पलता रहे ।
24-4-2007
हर देहरी पर अँधेरों में दिया जलता रहे ॥
आदमी है आदमी तब ,जब अँधेरों से लड़े ।
रोशनी बनकर सदा ,सुनसान पथ पर भी बढ़े ॥
भोर मन की हारती कब ,घोर काली रात से ।
न आस्था के दीप डरते ,आँधियों के घात से ॥
मंज़िलें उसको मिलेंगी जो निराशा से लड़े ,
चाँद- सूरज की तरह ,उगता रहे ढलता रहे ।
जब हम आगे बढ़ेंगे , आस की बाती जलाकर।
तारों –भरा आसमाँ ,उतर आएगा धरा पर ॥
आँख में आँसू नहीं होंगे किसी भी द्वार के ।
और आँगन में खिलेंगे ,सुमन समता –प्यार के ॥
वैर के विद्वेष के कभी शूल पथ में न उगें ,
धरा से आकाश तक बस प्यार ही पलता रहे ।
24-4-2007
Sunday, November 4, 2007
जनसाधारण के दुःख का बयान करती कविताएँ
-रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’
मैं अयोध्या श्री हरेराम ‘समीप’ की 42 कविताओं का संग्रह है ।आज की आपाधापी में कविता के अर्थ बदल गए हैं। कबीर ,सूर ,तुलसी ,मीरा की कविता घर-घर तक पहुँचती थी क्योंकि उसमे जीवन की आवाज़ होती थी। समय बदला ,कविता के प्रतिमान बदले ,आदमी बदले आदमी के दुःख-दर्द को स्वरूप देने वाले साधन बदले आदमी गौण हो गया ,साधन प्रमुख हो गए ।आदमी की तकलीफ़ कहीं दूर गहरे मे दफ़्न हो गई । हरे राम ‘समीप’ की कविताएँ उसी दफ़्न तकलीफ़ का बयान हैं ।वह तकलीफ़ ‘मैं अयोध्या’ की है तो कहीं वह तकलीफ़ ‘सत्येन’ की है कहीं ‘स्वर्ग में जीवन नहीं होता’ की है । ‘मैं अयोध्या’ में झुलसता हुआ आम आदमी है ; प्रश्नाकुल एवं असहाय तो सत्येन में अभावों से जूझता वह संतप्त व्यक्ति है जिसकी सारी शक्ति पेट के गड्ढे को भरने में ही चुक जाती है ।उसके व्यक्तित्व को कवि ने इस प्रकार रूपायित किया है-
‘उसका तमतमाता चेहरा
जैसे जेठ की दोपहरी में
दमकता सूरज
जैसे
हिमालय के नीचे
धधकता एक ज्वालामुखी
जैसे
बर्फ़ीले इलाके में
एक गर्म चश्मा’
किसको कितनी आज़ादी मिली है ,क्या काम करने की आज़ादी मिली है ;यह विचारणीय है ।इस सन्दर्भ में सत्येन का यह कड़वा सच इस दौर की त्रासदी ही कहा जाएगा-
‘क्या तुम्हें नज़र नहीं आता
कि हमारी आज़ादियाँ दरअसल
सेठों , नौकरशाहों और राजनेताओं ने
अपनी अंटी में बाँध ली हैं।’
समाज में बहुत परिवर्तन हुआ है ।बहुत कुछ बदल गया है ;परन्तु इंसानी रिश्ते आज भी जिन्दा हैं।‘योगफल’ कविता गाँव के बारे में यही सन्देश देती है-
‘प्रेम और उपकार का भाव
बरसों से
आम और नीम के पेड़ों की तरह
आज भी हरा है यहाँ ’
कवि अपने गाँव में आशा की एक किरण देखता है जो पूरी इंसानियत के लिए एक उजाला है-
‘मेरा गाँव
उजाले की एक खिड़की है
जहाँ से दिखता है
दुनिया का बेहतरीन नज़ारा
एकदम साफ-साफ ’
पूजा’ कवि के अनुसार यदि किसी दुख में डूबे किसी व्यक्ति के कंधे पर हाथ भी रख दिया तो वह किसी पूजा से कम नहीं है । ‘पूजा’ कविता में कवि इसी सत्य को रेखांकित करता है ।
मानव-जीवन संघर्षों से भरा है । संघर्ष हैं तो उनका समाधान भी है ।हमें हिम्मत नहीं हारनी चाहिए । समीप जी कहते हैं-
‘नई रोशनी मिल जाएगी
जगनू होंगे ,दीपक होगा
चाँद सितारे कुछ तो होंगे
सूरज भी आ ही जाएगा
आस न छोड़ो।’
‘घर लौटा हूँ’ में शहर से घर लौटने की गरमाहट है, जो शहरी बेगानेपन पर भारी है।आदमी ही नहीं घर के अन्य प्राणी भी इसे महसूस करते हैं । दूसरी ओर कवि को चिन्ता है नष्ट होती संवेदना की जिसमें राम की नहीं ,केवल रावण की ऊँचाई बढ़ रही है-
‘सूख रहे हैं
अहसास के कुँए
पीली पड़ रही है
हृदय की हरीतिमा ’
मन के गाँव में
असंतोष ने डाल रखा है डेरा’
यही नहीं आज की तिकड़मी भीड़ में ईमानदार आदमी घुटन महसूस कर रहा है ।उसका अस्तित्व खतरे में है –
जहाँ मासूम ईमानदारी
बेचारे ‘हरसूद’ गाँव की तरह
डूब रही हो धीरे-धीरे
बाँध की क्रूर गहराइयों में
हरसूद और बाँध का प्रतीक कविता की सम्प्रेषणीयता और बढ़ा देता है ।
विकास के वायदे जनता को सदा गुमराह करते हैं। प्रशासन जो हित के काम करना चाहता है , बिचौलिये और भ्रष्ट तन्त्र उसे बीच में ही निगल जाते हैं ।कवि की यही पीड़ा ‘सड़क’कविता में प्रकट हुई है-
‘जाने कहाँ बिलर गई है
सड़क !
कहा तो यही गया था गाँव में
कि राजधानी से
चल पड़ी है सड़क
गाँव के लिए’
‘बिलर’ शब्द अभिव्यक्ति को और धारदार बना देता है। भाषा की यह लौकिकता जनमानस की हताशा को बेहतर ढंग से प्रस्तुत करती है।
‘मैं अयोध्या’की कविताएँ हरेराम ‘समीप’ के व्यापक अनुभव और भाषा पर उनकी गहरी पकड़ का अहसास कराती हैं। श्री राम कुमार कृषक के अनुसार समीप जी ‘निरे बौद्धिक विमर्श के कवि नहीं हैं वे’।कविताओं की भीड़ में यह संग्रह अपनी अलग पहचान बनाएगा; ऐसी आशा है ।
…………………………………………………………………
मैं अयोध्या-हरेराम समीप ;प्रकाशक-शब्दालोक ,सी-3/59 ,नागार्जुन नगर ,सादतपुर विस्तार दिल्ली-110094 ,मूल्य-75/- पृष्ठ-120
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मैं अयोध्या श्री हरेराम ‘समीप’ की 42 कविताओं का संग्रह है ।आज की आपाधापी में कविता के अर्थ बदल गए हैं। कबीर ,सूर ,तुलसी ,मीरा की कविता घर-घर तक पहुँचती थी क्योंकि उसमे जीवन की आवाज़ होती थी। समय बदला ,कविता के प्रतिमान बदले ,आदमी बदले आदमी के दुःख-दर्द को स्वरूप देने वाले साधन बदले आदमी गौण हो गया ,साधन प्रमुख हो गए ।आदमी की तकलीफ़ कहीं दूर गहरे मे दफ़्न हो गई । हरे राम ‘समीप’ की कविताएँ उसी दफ़्न तकलीफ़ का बयान हैं ।वह तकलीफ़ ‘मैं अयोध्या’ की है तो कहीं वह तकलीफ़ ‘सत्येन’ की है कहीं ‘स्वर्ग में जीवन नहीं होता’ की है । ‘मैं अयोध्या’ में झुलसता हुआ आम आदमी है ; प्रश्नाकुल एवं असहाय तो सत्येन में अभावों से जूझता वह संतप्त व्यक्ति है जिसकी सारी शक्ति पेट के गड्ढे को भरने में ही चुक जाती है ।उसके व्यक्तित्व को कवि ने इस प्रकार रूपायित किया है-
‘उसका तमतमाता चेहरा
जैसे जेठ की दोपहरी में
दमकता सूरज
जैसे
हिमालय के नीचे
धधकता एक ज्वालामुखी
जैसे
बर्फ़ीले इलाके में
एक गर्म चश्मा’
किसको कितनी आज़ादी मिली है ,क्या काम करने की आज़ादी मिली है ;यह विचारणीय है ।इस सन्दर्भ में सत्येन का यह कड़वा सच इस दौर की त्रासदी ही कहा जाएगा-
‘क्या तुम्हें नज़र नहीं आता
कि हमारी आज़ादियाँ दरअसल
सेठों , नौकरशाहों और राजनेताओं ने
अपनी अंटी में बाँध ली हैं।’
समाज में बहुत परिवर्तन हुआ है ।बहुत कुछ बदल गया है ;परन्तु इंसानी रिश्ते आज भी जिन्दा हैं।‘योगफल’ कविता गाँव के बारे में यही सन्देश देती है-
‘प्रेम और उपकार का भाव
बरसों से
आम और नीम के पेड़ों की तरह
आज भी हरा है यहाँ ’
कवि अपने गाँव में आशा की एक किरण देखता है जो पूरी इंसानियत के लिए एक उजाला है-
‘मेरा गाँव
उजाले की एक खिड़की है
जहाँ से दिखता है
दुनिया का बेहतरीन नज़ारा
एकदम साफ-साफ ’
पूजा’ कवि के अनुसार यदि किसी दुख में डूबे किसी व्यक्ति के कंधे पर हाथ भी रख दिया तो वह किसी पूजा से कम नहीं है । ‘पूजा’ कविता में कवि इसी सत्य को रेखांकित करता है ।
मानव-जीवन संघर्षों से भरा है । संघर्ष हैं तो उनका समाधान भी है ।हमें हिम्मत नहीं हारनी चाहिए । समीप जी कहते हैं-
‘नई रोशनी मिल जाएगी
जगनू होंगे ,दीपक होगा
चाँद सितारे कुछ तो होंगे
सूरज भी आ ही जाएगा
आस न छोड़ो।’
‘घर लौटा हूँ’ में शहर से घर लौटने की गरमाहट है, जो शहरी बेगानेपन पर भारी है।आदमी ही नहीं घर के अन्य प्राणी भी इसे महसूस करते हैं । दूसरी ओर कवि को चिन्ता है नष्ट होती संवेदना की जिसमें राम की नहीं ,केवल रावण की ऊँचाई बढ़ रही है-
‘सूख रहे हैं
अहसास के कुँए
पीली पड़ रही है
हृदय की हरीतिमा ’
मन के गाँव में
असंतोष ने डाल रखा है डेरा’
यही नहीं आज की तिकड़मी भीड़ में ईमानदार आदमी घुटन महसूस कर रहा है ।उसका अस्तित्व खतरे में है –
जहाँ मासूम ईमानदारी
बेचारे ‘हरसूद’ गाँव की तरह
डूब रही हो धीरे-धीरे
बाँध की क्रूर गहराइयों में
हरसूद और बाँध का प्रतीक कविता की सम्प्रेषणीयता और बढ़ा देता है ।
विकास के वायदे जनता को सदा गुमराह करते हैं। प्रशासन जो हित के काम करना चाहता है , बिचौलिये और भ्रष्ट तन्त्र उसे बीच में ही निगल जाते हैं ।कवि की यही पीड़ा ‘सड़क’कविता में प्रकट हुई है-
‘जाने कहाँ बिलर गई है
सड़क !
कहा तो यही गया था गाँव में
कि राजधानी से
चल पड़ी है सड़क
गाँव के लिए’
‘बिलर’ शब्द अभिव्यक्ति को और धारदार बना देता है। भाषा की यह लौकिकता जनमानस की हताशा को बेहतर ढंग से प्रस्तुत करती है।
‘मैं अयोध्या’की कविताएँ हरेराम ‘समीप’ के व्यापक अनुभव और भाषा पर उनकी गहरी पकड़ का अहसास कराती हैं। श्री राम कुमार कृषक के अनुसार समीप जी ‘निरे बौद्धिक विमर्श के कवि नहीं हैं वे’।कविताओं की भीड़ में यह संग्रह अपनी अलग पहचान बनाएगा; ऐसी आशा है ।
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मैं अयोध्या-हरेराम समीप ;प्रकाशक-शब्दालोक ,सी-3/59 ,नागार्जुन नगर ,सादतपुर विस्तार दिल्ली-110094 ,मूल्य-75/- पृष्ठ-120
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Friday, November 2, 2007
चिन्तन
शिक्षक के लिए संकीर्णता से मुक्त होना अनिवार्य है ।जब लोग अन्तरिक्ष में जा रहे हों उस समय यदि शिक्षक वर्गवाद,जातिवाद ,सम्प्रदायवाद के गिजबिजाते कीचड़ में लोट लगाता रहे तो क्या होगा ?शिक्षक का प्रत्येक पल खुशबू-भरे फूल खिलाने का पल है ।वैमनस्य ,घृणा ,क्षुद्रता का प्रचार –प्रसार करने का नहीं ।कोई संस्कारवान् हो या न हो चलेगा ,लेकिन शिक्षक संस्कारवान् नहीं है ,नैतिक बल वाला नही है;वह बच्चों को अपनी कुण्ठा का विष ही पिलाएगा।वह अमृत लाएगा भी कहाँ से ।शिक्षक-अभिभावक का सम्बन्ध ढाल –तलवार का सम्बन्ध नहीं वरन एक दूसरे के पूरक का है।माता-पिता और शिक्षक में आपसी समझ तथा संवाद बना रहे तो बहुत सारी बालमनोवैज्ञानिक जटिलताओं का निराकरण हो सकता है। यही तादात्मय बच्चे के हित में है ।
Wednesday, October 17, 2007
हाँफता हुआ बच्चा
हाँफता हुआ बच्चा
-रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’
सुबह-सुबह !
हाँफता हुआ बच्चा
जा रहा स्कूल
पीठ पर लादे
बस्ता किताबों का
गले में झूलती
पानी –भरी बोतल
थके हुए कदम
हलक़ सूखा हुआ
थका हुआ बच्चा
चढ़ रहा
स्कूल की सीढ़ियाँ
आगे खड़ा है –
मुँह बाए
बाघ-सा क्लास रूम !
क्लास रूम में आएँगे
चश्मे के भीतर से घूरते टीचर!
दोपहर हो गई-
छुट्टी की घण्टी बजी
उतर रहा है बच्चा
स्कूल की सीढ़ियाँ-
खट्ट -खट्ट खट्ट- खट्ट
पीठ पर लादे
भारी बस्ता किताबों का
होमवर्क का बोझ
जा रहा बच्चा घर की तरफ
फर्राटे भरता
फूल हुए पाँव
सामने है घर
आँचल की छाया
-रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’
सुबह-सुबह !
हाँफता हुआ बच्चा
जा रहा स्कूल
पीठ पर लादे
बस्ता किताबों का
गले में झूलती
पानी –भरी बोतल
थके हुए कदम
हलक़ सूखा हुआ
थका हुआ बच्चा
चढ़ रहा
स्कूल की सीढ़ियाँ
आगे खड़ा है –
मुँह बाए
बाघ-सा क्लास रूम !
क्लास रूम में आएँगे
चश्मे के भीतर से घूरते टीचर!
दोपहर हो गई-
छुट्टी की घण्टी बजी
उतर रहा है बच्चा
स्कूल की सीढ़ियाँ-
खट्ट -खट्ट खट्ट- खट्ट
पीठ पर लादे
भारी बस्ता किताबों का
होमवर्क का बोझ
जा रहा बच्चा घर की तरफ
फर्राटे भरता
फूल हुए पाँव
सामने है घर
आँचल की छाया
कुछ कीजिए
कुछ कीजिए
ईमान हुआ बेघर, कुछ कीजिए ।
भटकता है दर–बदर ,कुछ कीजिए ।
फ़रेब के सैलाब से न बच सके
परेशान है रहबर ,कुछ कीजिए ।
रहनुमा बनकर जो कल गले मिले।
वे लिये आज ख़ज़र,कुछ कीजिए ।
बेहया हो गया मौसम बहार का ।
मुश्किल है बहुत सफ़र,कुछ कीजिए ।
ख़ुदा! तू भी परेशान ही होगा
तेरा ख़ौफ़ बेअसर ,कुछ कीजिए ।
रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’
ईमान हुआ बेघर, कुछ कीजिए ।
भटकता है दर–बदर ,कुछ कीजिए ।
फ़रेब के सैलाब से न बच सके
परेशान है रहबर ,कुछ कीजिए ।
रहनुमा बनकर जो कल गले मिले।
वे लिये आज ख़ज़र,कुछ कीजिए ।
बेहया हो गया मौसम बहार का ।
मुश्किल है बहुत सफ़र,कुछ कीजिए ।
ख़ुदा! तू भी परेशान ही होगा
तेरा ख़ौफ़ बेअसर ,कुछ कीजिए ।
रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’
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