पथ के साथी

Saturday, February 25, 2023

1294

 1-बीज

सुमन झा

 


कभी मत कहना

कभी मत सोचना कि

मैं  वो बीज हूँ

जो कभी अंकुरित हुआ ही नहीं।

बीज हो गर प्यार का

तो

जाँचें पहले वफ़ा की मिट्टी

हर गीली मिट्टी में वफ़ा नहीं होती

क्योंकि दिखावा, प्यार नहीं होता

फिर

 डाले अपनेपन का खाद उसमें और

समय और समझ के जल से सींचे

समझे ख्यालात को और बिसात को

वरना

 एकतरफा वफ़ाएँ 

 बहुत तकलीफ़ देती हैं

 एकतरफ से सेंककर

 तो

 रोटी भी नही बनती यारो।

 प्यार क्या ख़ाक होगा?

 और

 मिट्टी में पड़ा बीज कभी नष्ट नही होता

 फूटकर बिखर जाता है

 दबा पड़ा होता है, कहीं किसी कोने में

 फिर

 जब भी, जरा- सी भी,

हाँ सेभी  थोड़ी हमदर्दी मिली

वह पुनः पनपने लगता है,

तो

अब

और न कहना 

कभी मत सोचना कि

मैं वो बीज हूँ जो कभी अंकुरित हुआ ही नहीं।

-0-सुमन झा, गोरखपुर

-0-

2- मेरी गुड़िया

सुरभि डागर

 


मेरी गुड़िया बड़ी हो गई

गुड्डे -गुडिया के खेल

खेलती मेरी गुड़िया

बड़ी हो गई।

अब नहीं करती ज़िद

न‌ ही नखरे दिखाती है

पहले होती थी नाराज़

छोटी-छोटी बातों में

अब जख्म को भी 

छुपाती है।

चाट, गोलगप्पे को 

देख खिलाता था चेहरा 

अब खुशी से दाल रोटी 

खाती है।

बाजार से नहीं लौटती

थी खाली हाथ 

अब पुरानी साड़ी को भी 

अभी नई बताती है।

भूल‌कर वो खुद को

अपनी जिम्मेदारी निभाती है 

लहराती थी गेहूँ की बालियों- सी

अब आँखों से सब कह जाती है।

-0-

 

Friday, February 24, 2023

1293

 1-बदनसीबी

 कृष्णा वर्मा 

  

 जैसा वह है, ऐसा होना 

उसका कुसूर नहीं 

सीली कोठरी में जन्मा 

खुली नालियों वाली तंग 

बदबूदार गलियों में कंचे- गिल्ली डंडा खेलता 

डंडी से टायर को ठेलता

पता ही न चला कब

आसपास घटती घटनाओं को

अनजाने आत्मसात् कर लिया उसने 

गलियों के अँधेरे मोड़ों पर जुए के जमावड़े 

अभद्र भाषा में जुमलों संग ठहाके सुनता 

साल दर साल बढ़ता उसका वजूद 

कब उस सोहबत में घुल गया 

फिसलन भरी गलियों में जहाँ 

न सूर्य का उजाला था, न ही ज्ञान का 

उसकी भटकन भरी ज़िंदगी ऐसी फिसली कि जा गिरी 

दमघोटू गाँजा अफ़ीम और शराब की दुर्गंध में

वह वही पढ़ता और गुढ़ता रहा जो कानों को सुनाया 

दायरे की पातक हवाओं ने 

और यही अमल बन गया उसका काला मुकद्दर 

नशे असले बारूद और बंदूक 

अभिशाप बनकर लद गई उसके युवा कंधों पर  

इसे उपलब्धि जानकर उसने ठहाका लगाया 

और मनुष्यता रोने लगी ख़ून के आँसू। 

-0-

2-इन्तज़ार

प्रीति अग्रवाल

1.
तुम क्या गए
संग ले गए
मेरी मुस्कुराहटें...
छोड़ गए पीछे
पत्तों की सरसराहट
जो लुक -छुपके पूछती है
एक दूसरे से वही सवाल
जो अक्सर मैं
खुद से पूछा करती हूँ-
'तुम क्यों गए?'
2.
रोज़ की तरह
आज फिर दिन ढला
रोज़ की तरह
आज फिर उदासी ने
डालाया डेरा
काश!
एक बार तो कोई बताए
क्या कुसूर था मेरा?
3.
ढलता सूरज
दोहरा रहा
वही रोज़ का वायदा-
'कल आऊँगा।'
मैंने भी दोहरा दिया
वही रोज़ का वायदा-
'मैं इंतज़ार करूँगी।'
4.
इस नींद का भी
कोई ठिकाना नहीं,
जाने कहाँ रहती है
रात भर...
पूछती हूँ तो कहती है-
'ख्वाबों से तेरे नैना भरे हैं
आने नहीं देते,
मुझे करते परे हैं।'
5.
मुलाकातें इतनी छोटी
इंतज़ार इतने लंबे
क्यों होते हैं...
जब तक तुम आते हो
मैं थक जाती हूँ
कहने सुनने को
कितना होता है,
पर बस
बाहों में, सो जाती हूँ।
6.
तुमने संजीदगी से कहा-
'मेरा इंतज़ार न करना,
मुझे आने में वक्त लगेगा।'
मैंने हँसकर कहा-
'मेरे पास वक्त ही वक्त है,
मैं इंतज़ार करूँगी।'

-0-

 

Wednesday, February 22, 2023

1292

 

  1-रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

घिरँधेरा घन,हरें पतवार कैसे छोड़ दूँ।

जीना अभी, करना बहुत संसार कैसे छोड़ दूँ।

-0-

2-परमजीत कौर 'रीत'

 

ग़ज़ल -1

अँधेरों की फ़ितरत का क्या कीजिए

चिराग़ों का  क़द ही बढ़ा लीजिए 

 

इसी में सुकूँ ज़िन्दगी का असल 

दुआ लीजिए और दुआ दीजिए

 

ये ही नफ़रतों का करेंगी इलाज़ 

जड़ी-बूटियाँ प्यार की बीजिए

 

समंदर सी रख ली है ग़र तिश्नगी़

न कम होगी, सौ-सौ नदी पीजिए 

 

खुदा ! ये दुआ है करूँ बंदगी

भले मुझको कम ज़िन्दगी दीजिए

 

ग़ज़ल -2

कहाँ कोई किसी से कम यहाँ था

ग़र इक तालाब तो दूजा कुआँ था 

 

गिरा पत्ता तो हावी हैं हवाएँ 

शज़र के साथ कब वह नातवाँ था

 

उन्हीं रिश्तों को परखा दूरियों ने 

वो जिनका नाम ही नज़दीकियाँ था 

 

मुझे थी पास होने की हिदायत

उन्हें हर बार लेना इम्तिहाँ था

 

नहीं था तर्क-ए-त'अल्लुक़ ये सच, पर

पलटकर 'रीत' देखा भी कहाँ था

 

ग़ज़ल -3

दिल से मिलें ग़र लोग, याराना बनता है

तार जुड़ें बेमेल, तमाशा बनता है

 

पेट काटकर तिनका-तिनका जोड़ें तब

सिर ढकने को एक ठिकाना बनता है 

 

 पंछी, पत्ते, फूल साथ छोड़ देते जब

बूढ़े पेड़ का मौन सहारा बनता है

 

वक्त के एक इशारे पर मंज़र बदलें

खुशी की आँखों में ग़म खारा बनता है

 

कुछ तो बात है हममें, सब यह कहते हैं

यूँ ही नहीं हर कोई दीवाना बनता है 

 

धुंध भले दीवार बने रस्ता रोके

फिर भी सूरज का तो आना, बनता है 

-परमजीत कौर 'रीत'

-0-

1291

 जलीय भाव मन के 

अनिमा दास

 


स्वार्थ की अग्नि में जल गया नभांचल

उर्वि हुई शुष्क.. मन-कूप हुआ मरुथल

पल्लवों का क्रंदन..पुष्पों का हृद-मंथन

केवल अश्रु में है आर्द्रता..जग वह्नि-वन।

 

आ! दे जा जल,भर दे आ,सर- सरिता 

सजीव के अधरों में खिल जाए स्मिता 

यह तपन...लोभ की यह असह्य क्रीड़ा

नित्य विष -सी घुल जाती असंख्य पीड़ा।

 

जिसे कहा जीवन.. उसे किया नाशित

जिसे कहा अमृत.. उसे किया दूषित 

रेमानव! क्या सृष्ट कर पाएगा सागर?

क्या तुझसे जन्म ले पाएगा एक अंबर ?

 

त्रास मेरा हो रहा...दिगंतर में घनीभूत

बन जल-धारा बरसेगी..व्यथा अनाहूत।

-0-कटक, ओड़िशा