पथ के साथी

Friday, April 24, 2020

977



1-जीतेगी जिंदगी
परमजीत कौर 'रीत' ( श्री गंगानगर)

 लॉकडाउन में
बंद दरवाजों 
मुँह चिढ़ाती गलियों
सिर मुँडा बाज़ारों
और
रूठे चौराहों के बीच ।
अपने जीवन की परवाह किए बग़ै
धन्य है-
 इधर-उधर दौड़ता मैडिकल-पैरामेडिकल स्टॉफ।
धन्य है-
क्वारेंटाइन ,आइसोलेशन 
सँभालती पुलिस ,सेना ,और सभी नींव की ईंटे।
धन्य है-
लॉकडाउन के नियम और
अनुशासन को पालते लोग ।
इस उम्मीद के साथ कि 
कुछ दिन घर रहकर ही सही
कुछ दिन सबसे दूर रहकर ही सही
ज़िन्दगी जीतेगी ज़रूर.
ज़िन्दगी जीतेगी ज़रूर....
-0-
-0-
2-डॉ.सुरंगमा यादव
1
सर्द मौसम,उस पर ये लम्बी रातें
दिल कितना करे खुद से बातें ?
2
ऐसी बरसात भला किस काम की?
एक हो जाएँ नदिया-पोखर ।
3
तेरी चाहत हमें ले आ कहाँ तक
र का पता ही ना चला ।
4
जब से तारीफ़ तुमने हमारी कर दी
हम भी इतराके चलना सीख ग
5
औरत हूँ ,जानती हूँ बखूबी
होठों को सी लेना भी ।
6
ज़िदगी में काँधे तो बहुत मिले
दिल को भरोसा तेरे काँधे पे हुआ।
7
तन्हाई यूँ गुज़ार देती हूँ
तेरी बाहों की तरह यादों से लिपट जाती हूँ ।
8
डायरी में दबे फूल की तरह तुमने
इक माने बाद याद किया मुझको ।

9
किसी से उम्मीद लगाना छोड़ दिया जबसे
जीना बड़ा आसान हो गया तबसे ।
10
ये जुब़ान भी अजीब है
फिसलकर छिप जाती है।
11
तुम्हारे इंतज़ार में सदियां गुज़र गईं
तुम पास आ भी , मगर गै़रों की तरह ।
12
बस इतनी गुज़ारिश  है तुमसे
तुम मेरे हो ,ये व़हम ना तोड़ देना ।
13
हम तुम्हें अपना समझकर हक़ जताते रहे
तुमने हमें  मुकाबिल समझ लिया ।
14
प्यार तो रगो में बहता है
कोई काँटा नहीं है , जो काँटें से निकल जागा।
15
बुढ़ापे का तोहफा
लंबे  हो गये दिन-रात
गुज़रते ही नहीं ।
-0-

Thursday, April 23, 2020

976


-0-
1-मुझसे रहा न गया-मुकेश बाला

देख बदली में

छिपते हुए चाँद को
मुझसे रहा न गया
आखिर पूछ ही लिया
मैंने वो
जो उससे कहा न गया
कुछ यूँ  याँ किया
दर्द को अपने
टूटे हों जैसे
उस के सपने
आज कोई पलक तक ना उठी
कल होड़ लगी थी
मेरे दीदार की
बना हुआ था
मैं मूर्त्त
हर किसी के प्यार की
हँस रहे हैं मुझ पर
ये सितारे
बड़ा इठला रहे थे
चँदा प्यारे
बेखबर था मैं
दुनिया की रीत से
दिल लगा बैठा
दो पल की प्रीत से
छुपा लिया है खुद को
कर बदली की ओट
दिख न जाए कहीं
लगी हृदय पे चोट
आज खुद को
शून्य में पाया है
चारों ओर
घोर अंधेरा छाया है
सुन चन्द की बातें
ये बात समझ में आईं
अपने ही मतलब को
इस जग ने रीत बनाई
-0-
2-इन आँखों में- मुकेश बाला
  
इन आँखों में
कितना कुछ समाया 
कुछ खोया कुछ पाया 
गहराया अंदर
प्रीत का समंदर 
फ़िक्र अपनों की
उड़ान सपनों की
दिल की फरियादें
दोस्तों की यादें
प्यार का दरिया
जीने का जरिया
दायित्व का भार
स्नेह की धार
प्रेम और पीर
बेहिसाब नीर
ऊर्जा और होंसला
आशाओं का घोंसला
-0-
3-बरसात में भीगा हुआ कागज़- मुकेश बेनिवाल

क्यों करते हो कोशिश
मुझे समझने की
मुझसे तो अनजान है
मेरा अपना ही साया
बरसात में भीगा हुआ
कागज़ हूँ मैं
चाह कर भी जिसे 
कोई पढ़ नहीं पाया
-0-
2- आशा बर्मन
1-मौन बहुत है

मौन बहुत है, कुछ तो बोलो ।
माना कि तुम व्यस्त बहुत हो,
जीवन द्रुत है, त्रस्त बहुत हो ।
अन्तर्मन की परतों को निज
अब तो धीरे-धीरे खोलो ।
मौन बहुत है, कुछ तो बोलो ।

दूर कहीं कोई चिड़िया चहकी,
पास कहीं पर जूही महकी,
मधुर-मादक परिवेश है छाया.
वाणी का इसमें रस घोलो ।
मौन बहुत है, कुछ तो बोलो ।

पहले तुम थे बहुत चहकते,
यूँ ही  कुछ भी कहते रहते,
इस गम्भीर मुखौटे को तज,
क्यों पहले जैसे हो लो ।
मौन बहुत है, कुछ तो बोलो ।
जो अन्तर में, मुझे बताओ,
कह सब-कुछ हल्के हो जाओ ।
अपनेमन के मनकों को
प्रेम पगे तारों में पो लो ।
मौन बहुत है, कुछ तो बोलो ।
 -0-

3- सत्या शर्मा 'कीर्ति '

1-माँ, मेरी तुम मत जाओ

नहीं जानता जन्म क्या है ?
नहीं जानता मृत्यु क्या है ?
वेदों के सूक्तों में क्या है ?
ग्रन्थों के अर्थों में क्या है ?
पर ! जानता हूँ इतना कि
माँ , मेरी तुम मत जाओ ना

नहीं चल रही सांस तेरी
क्यों निस्तेज बदन ये तेरा
क्यों  मुंदी हैं ये पलकें तेरी ?
होठ बन्द क्यों हुआ हैं तेरे ?

हाँ! कुछ न कहना,चुप ही रहना
पर! माँ मेरी मत जाओ ना

मेरी पीड़ा न कोई देख सकेगा
मन की व्यथा न समझ सकेगा
तुम जननी मैं पुत्र तुम्हारा
कौन मुझे अब दुलार करेगा ?
हाँ! दुलार भले अब ना करना 
पर! माँ , मेरी मत जाओ ना ।

पल - पल दिन गुर रहा है
शाम है ढल कर आने वाली
क्यों नहीं उठती तुम आज तो
मेरी भी आँखें है झलकने बाली
नहीं पसन्द मेरा रोना तुझको
मैं अपने आँसू नहीं बहाऊँगा
हृदय पीड़ा से फट रहा है
फिर भी नहीं दिखाऊँगा
हाँ! मत पोछना आँसू मेरे
पर! माँ मेरी मत जाओ ना ।


स्वर्ग - नरक का ज्ञान न मुझको
सुख - दुख का न हाल मैं जानु
बस तेरे आँचल के ही अंदर ही
सारी दुनिया की खुशियां पालूं
हाँ ! मत देना आँचल की छाँव मुझे
पर ! माँ मेरी मत जाओ ना ..
हाँ ! प्यार भले न अब करना
पर! माँ मेरी मत जाओ ना ।
-0-

Tuesday, April 21, 2020

975-बहुत बोल चुके [ मेरी पुरानी कविता]



रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

बहुत बोल चुके, अब न बोलो
अपने मन की गाँठ न खोलो।

गाँठ खोलकर अब तक तुमने
जितना भी था, सभी गँवाया।
मेरे यार ज़रा बतला दो
बदले में तुमने क्या पाया ?

बहुत तोल चुके, अब न तोलो
जिसको अब तक तुमने तोला
उन सबको पाया है पोला
वार किया उसने ही छुपकर
जिसको तुमने समझा भोला।

अब सबके मन अमृत न घोलो
अमृत घोला,  जिनके मन में
उनका मन विषबेल हो गया।
धोखा देकर, खिल-खिल हँसना
उन लोगों का खेल हो गया।

बहुत बोल चुके, अब न बोलो
अपने मन की गाँठ न खोलो।

Monday, April 20, 2020

974


पूनम सैनी
 दोहा

जैसी जिसकी कामनावैसी उसकी प्रीत ।
जग माया का जाल है ,जीत सके तो जीत 

-0-
2-कविता
कभी नहीं एक सी होती 
जिंदगी बहता पानी है 
जो दिल में ही दफन अच्छी 
वो सुख- दुख की कहानी है ।

कहीं कभी भूल से तुमने  
जगत का लिया सहारा हो 
भरोसा करके दुनिया पर 
ईश से किया किनारा हो 
समझ लेना ये दुनिया की 
तो फितरत ही रवानी है । 

आँख जो भर के बह जाए 
पूछे दुनिया कि गम क्या है 
जख्म दिल चीर उभर आए 
तुम पे बीते सितम क्या है 
बता देना यूँ हँस करके 
नहीं आँसू, ये पानी है
-0-

Sunday, April 19, 2020

973


मेशराज की रचनाएँ
1-जनक छन्द  की तेवरी
1
क्या घबराना धूप से
ताप-भरे लू-रूप से, आगे सुख की झील है।
दुःख ने घेरा, क्यों डरें
घना अँधेरा, क्यों डरें, हिम्मत है-कंदील है।
भले पाँव में घाव हैं
कदम नहीं रुक पायँगे, क्या कर लेगी कील है।
खुशियों के अध्याय को 
तरसेगा सच न्याय को, ये छल की तहसील है।
है बस्ती इन्सान की
हर कोई लेकिन यहाँ बाज गिद्ध वक चील है।
पीड़ा का उपचार कर
भाग लिखें की’ आज सुन, चलनी नहीं दलील है। 
-0-
2-*गीतिका छंद में ग़ज़ल* 

सादगी पै, दिल्लगी पै, इक कली पै, मर मिटे 
दोस्ती की रोशनी पै, हम खुशी पै, मर मिटे।

फूल-सा अनुकूल मौसम और हमदम ला इधर 
 प्यार की इकरार की हम चाँदनी पै मर मिटे।

हम मिलेंगे तो खिलेंगे प्यार के मौसम नये
हम वफा  की, हर अदा की, वन्दगी पै मर मिटे।

रूप की इस धूप को जो पी रहे तो जी रहे
नूर के दस्तूर वाली हम हँसी पै मर मिटे।

फिर  उसी अंदाज में तू ‘राज’ को आवाज दे
नैन की, मधु  बैन की हम बाँसुरी पै मर मिटे।
-0-
3- हाइकु विन्यास में ग़ज़ल     

भूल चुके हैं / प्रियतम को जब / बेचैनी कैसी ?
माना सुख-सा / हर ग़म को जब / बेचैनी कैसी ?

उसके लब की / इक जलधर की / रंगीं रातों की 
प्यास नहीं है / अब हमको जब / बेचैनी कैसी ?

आज प्रीति का / भोग न रुचिकर / प्राणों को लागे 
माना नीरस / मधुसम को जब / बेचैनी कैसी ?

बेगानों हित / सहज प्रफुल्लित / रातों-बातों में 
हमने देखा / हमदम को जब / बेचैनी कैसी ?

दूर-दूर हैं / हम उपवन की / हूकों-कूकों से 
आज न चाहें / छम-छम को जब / बेचैनी कैसी ?
-0-
3- तेवरी

तभी बिखेरे बाती नूर, ये दस्तूर
मोम सरीखा गल प्यारे । 

दुःखदर्दों से किसकी मुक्ति? कोई युक्ति??
क्या होना है कल प्यारे

अब तू जिस संकट के बीच, भारी कीच
थोड़ा-बहुत निकल प्यारे । 

रैंग, हुआ जो पाँव विहीन, बनकर दीन
सर्प सरीखा चल प्यारे । 

जग में उल्टे-सीधे  काम, ओ बदनाम
क्यों करता है छल प्यारे ।
-0-
4- नम हैं बहुत वतन की आँखें 

हिन्दू-मुस्लिम बनना छोड़ो
बन जाओ तुम हिन्दुस्तानी,
अपना भारत महाकाव्य है
टुकड़ो में मत लिखो कहानी।

क्यों होते हो सिख-ईसाई
साथ जियो बन भाई-भाई,
धर्म  नहीं वह जिसने सब पर
हिंसा के बल धाक जमा

रक्तपात यह हल देता है
बस हिंसक जंगल देता है,
जातिवाद का मीठा सपना
मानवता को छल देता है।

जब मजहब उन्मादी होता
बस लाशों का आदी होता,
चीत्कार ही दे सकता है 
अमन देश का ले सकता है।

अतः धर्म  का मतलब जानो
मानवता सर्वोपरि मानो,
नम हैं बहुत वतन की आंखें
इसके मन का दुःख पहचानो।
-0-

Saturday, April 18, 2020

972

1.प्रीति अग्रवाल
1.
ऐ दोस्त तेरे काँधे में कुछ ऐसी कशिश है
दिखते ही जी चाहे, मैं जी भर के रो लूँ!
2.
तुम तो ऐसे न थे, जो सताते मुझको
पर यादें तुम्हारी, बड़ी बैरी निकलीं!
3.
हमराज़ चुना है, हमने तुम्हीं को
ये राज़ किसी से कह तो न दोगे?
4.
गुमनामी से अभी तो यारी हुई थी
तुमने वो भी छीनी, मशहूर करके!
5.
आँखों में लाल डोरे, बोझिल- सा तन है
बीमार नहीं हूँ, बस रोने का मन है।
6.
ऐ टूटते तारे, तेरी खामोशी से याद आया
टूट था मेरा दिल भी, कुछ तेरी तरह ही!
7.
एक प्यार- भरा दिल, और वो भी टूटा हुआ,
अब गीत और ग़ज़लों के काफिले बढ़ेंगें!
8.
क़ुर्बानी सारी, औरत के हिस्से आईं
और शोहरत, 'कुर्बानी के बकरे' ने पाई!!
9.
खुद को समझा सुनार, और दाता को लुहार
अब देख! सौ सुनार की, सिर्फ एक लुहार की।
10.
आज़ादी पे कुछ दिन से पाबन्दी क्या लगी है
न चाहकर, परिंदों से, जलन हो रही है।
11.
बुझ चुकी थी आग, धुआँ तक नहीं था
अंगारे मनचले थे, सुलगने की ठानी!
12.
न जाने क्यों मंज़िल की परवाह नहीं है
हसीं है सफर, हम चले जा रहे हैं!
13.
ऐसा भी नहीं कि बिन तेरे, मर मिटेंगें
बस जीने की कोई खास, वजह न रहेगी।
14.
सोचती हूँ, बस हुआ, ये रूठना मनाना
मैं मना मना थकी, तुम रूठके न हारे।
15.
तू जानता है सब, फिर भी बुत बना खड़ा है
नाइंसाफ़ी करने वालों की, फिर ऐसी क्या ख़ता है
-०-
2-रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'
1
दूर रहकर पास आने की उम्मीद में जिए
पास आए तो दूरियाँ और गहरी हो गईं।
2
हम क्या हैं, समझाने में उम्र गुज़र गई।
ना वे समझ पाए ,न हम ही समझा सके

-0-

हाइकु
1
प्यारा अम्बर
ये था इनका घर
हमने छीना।

Wednesday, April 15, 2020

971-महादान -महिमा



रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

    दोहा-एक दिन कहने लगे, हमसे कफ़नखसोट ।
‘महादान से ही मिटें, जनम -जनम के खोट॥’
चपरासी, गुरु या अधिकारी। दारोगा , बाबू , पटवारी ।
रिश्वत इनको जो दे आता । मुँह-माँगा फल जग में पाता।
आशु फलदायिनी सुखकारी । महादान की यह बीमारी ॥
सच्चा साधक कभी न डरता । दुनिया भर का धन वह हरता ॥
वेतन अपना घर में धरता । घूस नोंच बैंकों में भरता ॥
बिना दिए जो काम कराता । केवल वही नरक में जाता ।
चाहे जितने पाप कमाओ । रिश्वत देकर छुट्टी पाओ ।।
जब तक भेंट नहीं चढ़ती  है। फ़ाइल आगे ना बढ़ती है ॥
बिना खिलाए साहब लड़ता । खा लेने पर बाँह पकड़ता ॥
     दोहा-पिटते इनके हाथ से, क़ायदे व क़ानून ।
इनकी कलम छुरी बने, करदे सौ-सौ खून ॥
 शिव के गण भी इनसे डरते । यमदूत यहाँ पानी भरते।
ज्ञान और गुण धक्के खाते। उल्लू घर-घर पूजे जाते ।
साहब के घर भेज मिठाई । नहीं किसी ने मुँह  की खाई॥
इनकी छाया जिस पर पड़ती । मौत न उसके आगे अड़ती ।
गुण्डे ,बनकर  साँड टहलते ।  चौराहों पर सुरती मलते ।
लूट-खसोट व चोरी-जारी । इसी से है सभी की यारी ॥
बेईमानी जो भी करता ,भव-सागर से पार उतरता ।
रिश्वत लेता पकड़ जाए । रिश्वत देकर वह छुट जाए ।
जो भी इनकी निन्दा करता। नरक लोक में सदा विचरता ।
   दोहा-कुछ न पता परलोक का , हे मूरख इंसान ।
जीवन बीता जा रहा, एक पथ महादान
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