पथ के साथी

Tuesday, April 21, 2020

975-बहुत बोल चुके [ मेरी पुरानी कविता]



रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

बहुत बोल चुके, अब न बोलो
अपने मन की गाँठ न खोलो।

गाँठ खोलकर अब तक तुमने
जितना भी था, सभी गँवाया।
मेरे यार ज़रा बतला दो
बदले में तुमने क्या पाया ?

बहुत तोल चुके, अब न तोलो
जिसको अब तक तुमने तोला
उन सबको पाया है पोला
वार किया उसने ही छुपकर
जिसको तुमने समझा भोला।

अब सबके मन अमृत न घोलो
अमृत घोला,  जिनके मन में
उनका मन विषबेल हो गया।
धोखा देकर, खिल-खिल हँसना
उन लोगों का खेल हो गया।

बहुत बोल चुके, अब न बोलो
अपने मन की गाँठ न खोलो।

12 comments:

  1. "अब सबके मन अमृत न घोलो
    अमृत घोला, जिनके मन में
    उनका मन विषबेल हो गया।"
    - बहुत सुन्दर!
    हार्दिक बधाई और साझा करने के लिए आभार!
    - डाॅ. कुँवर दिनेश

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  2. बहुत बोल चुके, अब न बोलो
    अपने मन की गाँठ न खोलो
    अभिव्यक्ति सुन्दर, बधाई भैया।

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  3. हम कितने भोले हैं कि सबको अपना समझकर सब कुछ कह देते हैं |फिर वही सांप बनकर हमको डस लेते हैं | इसीलिए तो अबसे स्वयं से बात करो |बहुत ही कटू सत्य से परिपूर्ण रचना है| ये कभी पुरानी हो ही नहीं सकती -श्याम हिंदी चेतना

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  4. बहुत सुंदर कविता,आपको बधाई भाई साहब, शायद ईश्वर भी यही चाहता था ,इसलिए उसने कान तो दो दिए परन्तु मुँह केवल एक!

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  5. बहुत सुंदर अभिव्यक्ति ।कितना सच कहा। हार्दिक बधाई

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  6. सुंदर कविता , बोलने से ही मन की गाँठ खुलती है इसलिए भी तमाम समस्याओं में बातों की गुंजाइश को ज्यादा महत्व दिया जाता है ।
    रमेश कुमार सोनी , बसना

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  7. सत्य परक बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति ।बधाई भैया ।

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  8. सच कहा....
    सुंदर सृजन
    हार्दिक शुभकामनाएँ

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  9. बहुत सुंदर अभिव्यक्ति... हार्दिक बधाई भाईसाहब।

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  10. भाई कम्बोज जी बहुत सुन्दर भाव हैं रचना के हार्दिक बधाई |

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  11. मन के दर्द बयाँ करती सुंदर भावाभिव्यक्ति!
    हार्दिक बधाई आदरणीय भैया जी!

    ~सादर
    अनिता ललित

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  12. बहुत तोल चुके, अब न तोलो
    जिसको अब तक तुमने तोला
    उन सबको पाया है पोला
    वार किया उसने ही छुपकर
    जिसको तुमने समझा भोला।
    aesa hi hota hai bhaiya
    bahut sunder kavita badhayi
    rachana

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