पथ के साथी

Friday, January 27, 2017

704



1-भारत माँ ने आँखें खोलीं(चौपाई )
ज्योत्स्ना प्रदीप

भारत माँ ने आँखें खोलीं,
देखो वो भी कुछ तो बोली ।
बालक मेरे  हैं अवसादित,
पथ ना जानें क्यों हैं बाधित।

वसुधा वीरों की मुनियों की,
ज्ञान कोष थामें गुनियों की।
कोई तो था प्रभु का साया,
कोई गंगा   भू पर लाया ।
संतानें अब बदल गई हैं,
माँ की आँखें सजल भई हैं ।
निकलो अपनी हर पीड़ा से,
खुद को सुख दे हर क्रीडा से ।
कुटिया चाहे ठौर बनाना ,
घी का चाहे कौर न खाना।
पावनता  को अपनाना है,
नवयुग सुख का फिर लाना है।
किरणें थामे नैन कोर हो,
सबकी अपनी सुखद भोर हो ।
बनना  खुद के भाग्य विधाता,
आस लगाये भारत माता ।
-0-
1- मैं आजाद हूँ -
      सत्या शर्मा कीर्ति

आओ आज मनाते हैं आजादी का जश्न
तुमने दिया मुझे नव भविष्य की कल्पना
और आजाद होने की अनुभूति ।

और हो गयी मैं आजाद.....
तोड़ दी सारी बंदिशें......
अपनी मासूमियत भरी कोमल
भावनाओं का चोला उतार फेंका मैने
क्यों जकड़ कर रखूँ खुद को
मर्यादा ,सभ्यता , शान्ति और देशप्रेम
की जंजीरों से ।

मैं आजाद हूँ .....
और मुझे क्या लेना कि
सरे आम किसी की मासूमियत
से खेली  जा / भरे बाजार किसी लाचार
बाप की पगड़ी उझाल दी जा / मासूमों को
बेच दिया जा ...

मैं तो आजाद हूँ ...
मुझे कोई फर्क नही पड़ता
भगत सिंह , चन्द्रशेखर ,सुभाषचंद्र बोष
जैसे देश भक्तो के बलिदान से ।

क्योंकि मैं आजाद हूँ .....
काला धन से तिजोरियों को भरने
के लिए / सांस्कृतिक धरोहरों पर अपने
नाम गुदवाने के लिए / गरीबों के जमा पूँजी
पर अपने लिए महल बनाने के लिए ।

हाँ हूँ आजाद मैं....
मुझे कोई फर्क नही पड़ता / उजाड़ जाने दो
ये उपवन ये मनभावन जंगल / बन जाने दो
कंक्रीटों के महल / हो जाने दो गंगा को अपवित्र।

मुझे क्या मै तो आजाद हूँ ....
और सुनों,
तुम भी आजाद हो मेरी तरह
अपने वर्तमान की व्यापकता को पहचानो
मत पोछो किसी के आँसू
मत दिखाओ सहानुभूति बाले बादल ।

चलो मिल कर खाते हैं बारुद   ,
पीते हैं रक्त और लगाते हैं जोर का अट्टहास

कि मैं आजाद हूँ .........
                      -0-
2-शहीदों के नाम -सत्या शर्माकीर्ति

आज मौन हैं मेरे शब्द
नहीं लिखनी मुझे कोई कविता
क्या सचमुच इतने समर्थ है मेरे शब्द
इतनी सार्थक है मेरी अभिव्यक्ति / कि
रच दूँ आपके बलिदानों को सिर्फ एक
कविता में....
हाँ, नहीं लिखनी मुझे अपने जज़्बा
अपने अंदर उपजे असीम वेदना की लहर..
कैसे व्यक्त कर दूँ कुछ चन्द शब्दों में
आपके बच्चों की चीत्कार जो आपके
पार्थिव शरीर से लिपटकर गूँजी थी...
और किया था आपकी माँ ने अपनी ममता का
अंतिम श्राद्ध...
क्या लिख पाऊँगी / कि मृत्यु के अंतिम पलों में भी
बह रहे थे आपकी आँखों से देश भक्ति  का प्यार /
 कि आपने कहा होगा फहरा लूँ आज तिरंगे को
आखरी बार / कि गोलियों से छिदे सीने में भर ली होगी
वतन की पवित्र मिट्टी /
 कि आपने अपने कुनबे को
‘हम जैसों’ के हवाले कर हो गए शहीद......
मत रोकना आज मेरे कलम से बहते रक्त..
सचमुच व्यर्थ हैं मेरे शब्द / खोखले हैं मेरे आँसू
जो आपके बलिदान का मान नहीं रख सकते ।
पर हाँ .. डरती हूँ फिर भी कि आपका बलिदान भी
न बनकर रह जाए कोई ‘टॉपिक’............
-0-
2-अर्धनारीश्वर - -सत्या शर्माकीर्ति

कौन हूँ मैं
क्या आस्तित्व है मेरा
हूँ ईश्वर की भूल या
रहस्यमयी प्रकृति का प्रतिफल ...

है शब्दों , अर्थों से परे एक वजूद मेरा
पूर्ण- सा / सम्पूर्ण- सा
क्योंकि
अधूरे भावों का विस्तार नही है मुझमें /
न स्त्रियों -सा तुम्हें रिझाने की है चिन्ता
ना पुरुषों-सा पुरुषत्व दिखाने की चेष्टा
खुश हूँ अपनी सृष्टि से..
क्योंकि
देखा है मैंने खुद के अंदर
जन्म लेती हुई माँ को
गाती हूँ जब अनजाने से घरों में
आशीषों भरे कोई मधुर से गीत
तब मेरे दिल से उतर इक मासूम-सी माँ
लेती है बलाएँ नन्ही-सी कली की

अपनी आँखों की गोद में बैठा झुलाती है वो झूले
और  लौट आती है हौले से
अपने इस कठोर से तन में ..

देखा है पनपते पिता का वात्सल्य
जब अकेली मासूम के साथ खेलना चाहता है 
कोई वहशीपन
तो चिंघाड़ पड़ता है एक आदर्श पिता-सा
करता है रक्षा हजार हाथों से
और लौट आता है इस कोमल से दिल में
हाँ तो सुनो
मैं तो पूर्ण हूँ अपने मन के विस्तृत धरातल पर ..
नहीं हूँ प्रकृति की कोई गलती मैं 
मैं तो हूँ प्रकृति का उपहार कोई
क्योंकि महसूस किया है मैंने अक्सर
मैं ही हूँ अर्धनारीश्वर ।
-0-


Sunday, January 22, 2017

703



1-डॉ.भावना कुँअर
1
लेकर वे फिरते रहे ,दोनों हाथों पीर।
हमने खुद ही माँग ली, बनकर मस्त फकीर।
2
गर- गर तुम जो करो,रखना इतना ध्यान
देना ना धोखा कभी, जाए चाहे जान।
3
मनवा मेरा हो रहा, पल -पल   आज अधीर
होगा जो पल का मिलन,मिट जाएगी पीर।
4
मैं-मैं करता फिर रहा,बनके तू अनजान
जप ले दो पल राम को,ले जीवन का ज्ञान।
5
तू तो माया में पड़ा,भूला है सब काज
भक्ति करो उस राम की ,सुधरे कल औ आज।
6
प्रेम नदी है आग की , खेल न उल्टे खेल।
बाहर या भीतर रहे,हो जाएगा फेल।
7
विहग बनाए घोंसला,कुछ तो उससे सीख
 हौंसला कर ले बुलंद,माँगे है क्यूँ भीख?
8
खालीपन कैसे भरूँ, करूँ कौन उपचार
कल तक मेरा जो रहा,आज पराया प्यार।
9
पीर भरा दरिया मिला,हो ना पाता पार
जाने कितने कर लिये,नये-नये उपचार।
10
काहे बैठे हो पिया,हमसे इतनी दूर
किसने डाली बेड़ियाँ, क्यों इतने  मज़बूर?
11
मन पंछी उड़ ही चला,आज पिया के गाँव
आँचल में  भर ली  सभी,मधुर प्रेम की छाँव।
12
जो तुम लेकर चल पड़े, प्रेम पगी पतवार ।
करना होगा पार भी,भले तेज़ हो धार॥
-0-
2-ताबीज़--ज्योत्स्ना प्रदीप

उसनें खरीद लिया था
एक तावीज़ की तरह उसको
एक धागे के साथ
गले में बाँधे  भी रक्खा
कुछ समय
पर.....
कुछ मुरादें
पूरी होनें के बाद
सजा दिया
किसी कमरे के आले में
उसी एक धागे  के साथ!!!
-0-
3-रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'
1
जिनको भुला न पाते हैं
वे जनमों के नाते हैं
ख़ुद को हम भूलें  पलभर
 उनको गले  लगाते हैं।
-0-

Saturday, January 7, 2017

702



द्वारिका प्रंग

श्वेता राय


सुदामा-[ सुशीला को समझाते हु सुदामा]

हे भामिनी! प्यारी सुनो मत, लोभ माया में फँसो।
दलदल हृदय को ये करे ,मत  नासिका तक तुम धँसो।।
है धाम प्यारा घर हमारा, प्रेम से इसमें रहो।
मन में लिये तुम नेह -सरिता, अनवरत हिय तक बहो।।

माया जगत् की झूठ सारी, झूठ सब वैभव यहाँ।
हैं झूठ सब रिश्ते यहाँ पर, झूठ है उद्भव यहाँ।।
अब बात मेरी मान कर बस, नाम प्रभु का लो सदा।
तुम भूलकर प्रिय कष्ट सारे, प्रेम ही बाँटो सदा।।

माया अकेली कब रही है, साथ लाती द्वेष ये।
क्षण -क्षण हृदय में व्यर्थ पल पल, है बदलती भेष ये।।
धन -धान्य से मुक्ति सहज ही, कब कहाँ मिलती यहाँ
बस भक्ति ही प्रभु की धरा से, साथ जायेगी वहाँ।।

संसार सारा भ्रम सुनो प्रिय, बात ये तुम मान लो।
प्रभु के चरण बस शीश नत हो, बात ये तुम ठान लो।।
छल- द्वेष से तुम दूर हो ,न्मार्ग पर चलती रहो।
हैं दीन के वो ही सहारे ,नाम प्रभु भजती रहो।।

सुशीला का उत्तर-


हे नाथ! अब मेरी सुनो तुम बात जो मैं बोलती।
प्रतिदिन क्षुधा को मैं कुटी में नीर से हूँ तोलती।।
है धाम प्यारा घर हमारा, मानती इस बात को।
पर क्या करूँ जब सह न पाऊँ, भूख के आघात को।।

सब कष्ट से हैं बिलबिलाते, नींद भी आती नहीं।
चिल्ला रहे छौना सभी हिय चैन मैं पाती नहीं।।
कुछ हैं कहाँ जो दे उन्हें मैं चुप कराऊँ प्यार से।
है सूखती छाती प्रिये भी, गरीबी की मार से।।

मत देर अब स्वामी करो तुम द्वारिका पथ थाम लो।
कहते रहे हो मित्र जिनको अब उन्हीं का नाम लो।।
है दीन के वो तो सहारे, भूप भी अपने हु
यदि देख लें वो भर नयन तो दर्द सब सपने हु।।

मुख से नहीं कुछ बोलना तुम हाथ भी मत खोलना।
सब देख उनका ठाट वैभव मत हृदय से डोलना।।
यदि पा गये हम प्रेम उनका, बात तब ये जान लो।
जीवन करुँ प्रभु के चरण में, दान अपना मान लो।।

विनती तुमसे नाथ है, करो इसे स्वीकार।
प्रभु के दर्शन से प्रिये, लाओ जीवन धार।।

श्वेता राय
विज्ञान अध्यापिका
देवरिया
उत्तरप्रदेश
274001

Monday, January 2, 2017

701-नए साल से दो बातें



नए साल से दो बातें
रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

दो बूँद भी
प्यार मिला है
मुझको जिनसे
उनको
भर-भर गागर देना ।
सुख-दु:ख में
जो साथ रहे
परछाई बन
सुख के
सातों सागर देना 
बोते रहे
हरदम काँटे,
प्यार-भरे दिल
तोड़े
उनको भी समझाना ।
फूल खिलाते
रहे जो भी
सपनों में भी
उनको
हरदम गले लगाना।
-0-