पथ के साथी

Wednesday, June 15, 2016

641



ज़िंदगी मुस्काएगी-डॉ योगेन्द्र नाथ शर्मा 'अरुण'

ज़िन्दगी उलझाओगे तो,बस उलझती जाएगी!
मुस्कुराओगे अगर तुम,ये ज़िंदगी मुस्काएगी!!

मुश्किलें आएँगी हरदम,बस जूझना होगा तुम्हे,
जितना मुश्किल से डरोगे,उतना ही ये डराएगी!!

मंजिल स्वयं आती नहीं,ये खूब रखना याद तुम,
जब पाँव चलते जाएँगे,मंजिल स्वयं आ जाएगी!!

जिस ने भी डर के छोड़ दी है, डोर आशा की यहाँ,
कोई दवा उसको कभी, जीवित नहीं कर पाएगी!!

पाँव  से विकलांग है गर, तो  दोष  तेरा  है कहाँ?,
साहस जुटाले दिल में तू,मंजिल तेरी मिल जाएगी!!

सब को ही जाना है एक दिन, कौन रहता है यहाँ?
उपकार कर लेगा अगर, तो  याद  जग को आएगी!!
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डॉ योगेन्द्र नाथ शर्मा "अरुण"
पूर्व प्राचार्य,
74/3,
न्यू नेहरु नगर,
रूडकी-247667

Saturday, May 28, 2016

640

 यादें - सुनीता शर्मा

 
सब रिश्तों में खास हो तुम
 
मेरे दिल के पास हो तुम 

तेरी फकीरी ही अमीरी लगे
मेरे मन के उपवास हो तुम
दूर कितने भी जाओ मगर
जीवन का आभास हो तुम
 
         मन मंदिर में खामोश सफर
 
         यादों के विश्वास हो तुम
 
          तारों को गिनूँ रात भर पर
 
          टूटते तारों के खास हो तुम
  
लम्हे  गमों के काट लेंगे गर
  
जीवन- श्वास की आस हो तुम
  
दुनिया की बढ़ती चकाचौंध में
 
बुझते दिए का उजास हो तुम 
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क्षणिकाएँ -मोक्षदा शर्मा
1-एक बदी 
कुछ लोगों ने 
वृक्षों को
तो कुछ ने पहाड़ों को
काट दिया ....
एक सदी को ,
एक  बदी नें
समय से पहले ,
बहुत कुछ बाँट दिया 
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2- ऊँची उड़ान
नभ पर 
जो ऊँची उड़ान भरते हैं 
दाना पाने के लिए 
वो भी 
धरती पर उतरते हैं ।
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3-भूल न जाना

मेट्रो सी गति लिये
भाग रहे हो
जो उस महानगर ,
भूल न जाना उन्हें 
जो तकते
तुम्हारी राह 
गाँव के छोटे से घर ।
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Thursday, May 19, 2016

639-जलती है धूप

पुष्पा मेहरा        

दिन भर तपता  है सूरज
और जलती है  धूप
घबरा कर उतर आती धरती पर
पर वहां  भी सकून से
न जी पाती वह ,
जाते-जाते छोड़ जाती है
अपना कलेवर तपिस भरा
दहकती हैं  सड़कें ,
झोंपड़ी और टट्टर,
तपते हैं बाहरी तन
ऊँचे- ऊँचे दस- बारह खण्डों के
जिनके अंत::करण शांत ,
शीतल, सुकून -भरा जीवन जीते हैं 
सहते हैं बेसहारा, बेघर
जेठ  के लू बुझे अंधड़
न पानी, न बिजली न ही छाया ढंग की ,
कर्म –श्रम,पसीना, कभी आधा कभी पूरा 
खाकर करते बसर । 
इधर धूप के ताप और उसकी
पीड़ा सहने की शक्ति का भी तो 
हम अनुमान तक नहीं लगा पाते,
सुनती है ताने
पर थकती नहीं
न ही कुछ बोलती
कभी  पेड़ों के बीच
कभी भवनों की छाया में 
पनाह माँगते-माँगते
साँझ होते ही नदियों में अपनी
काया देख बिदा हो जाती,
जानती है कि
वह तो सूर्य की दासी है
जैसे नचाएगा वैसे ही  नाचेगी,
मन से थकी –थकाई , तपी –तपाई 
बिना रस्सी –लुटिया लिये
गहरे तपते सन्नाटे में
कुएँ की  मुँडेरें ललचाई नजरों से झाँक
प्यासी की प्यासी
जली –भुनी,जंगल –जंगलआग लगाती 
ताने सुनने की आदी
बारिश के प्रथम छींटों में भीग कर
अपना ताप मिटा
ठंडी सुकूनभरी ज़िन्दगी बिताने हेतु
शीत का इंतजार करती।
नाज़ भरी ,चतुर वह रूप बदल
नाज- नखरे दिखा मौका पाते ही
अपने गुनगुनाहट भरे
सीले से ताप के
सुख का अहसास  करा
अपनी कीमत बताती ।
धूप के साथ –साथ हम सभी को  
सदा ही समय -समय पर 
उससे मिलने वाले सुख का 
इन्तजार रहता 
और रहेगा,
धूप के हर रूप को उसके अंक मिलते रहेंगे ,
सूरज और धरती की जो भी साँठ - गाँठ है
शाश्वत है  .
हम निरूपायों को इसे आजन्म भोगना है !
पर एक बात सोचनी है कि हम
उसके किस रूप को सराहें और स्वीकारें !!
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Pushpa . mehra@gmail . com  



Tuesday, May 17, 2016

638

1-देह नेह की बातें
ज्योत्स्ना प्रदीप

देह-नेह की बात करो ना
बाहों का सहारा दे दो
चाँद की आभा सभी लूटते
मुझको बस तारा दे दो
नदियों ने छुपा ली जवानी
न सागर ने मन की  जानी
मेघों की न कीअभिलाषा
मुझको एक धारा दे दो ।

सुना - प्रेम धधकती अगन है
बको इसी की लगन है
महा अनल से लेना है क्या?
मुझको इक अंगारा दे दो ।

घर की चाह में भटके किधर
जाना कभी मेरे भी नगर
प्यार की ईंटे लिये खड़ी हूँ
विश्वास का गारा दे दो ।
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2-इन्दु गुलाटी

परदों से झाँकती ज़िदगी
अनंत संभावनाओं की तलाश में
जैसे तैयार हो रही हो
एक सफल उड़ान भरने को...
एक परितृप्त श्वास से भरपूर
और नवीन सामर्थ्य से परिपूर्ण
ये उठी है नया पराक्रम लेकर
नवजीवन के प्रारम्भ का विस्तार छूने।
परिधियों से बाहर आने की आतुरता
आसक्ति नहीं, प्रतिलब्धता
समीक्षा नहीं,अनंतता
विस्तारित व्योम को बस छू लेने की लालसा.....
परदों से झाँकती ज़िन्दगी।।