रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’
माना भारी धूल धुआँ है
भीड़भाड़ है, चिल्लपों है
हॉर्न गरजते हैं
वाहनों के
गुत्थम-गुत्था पैदल
चलते
फिर भी अपना मुलुक है
प्यारा
आ गए जिस दूर देश में
यहाँ चुप्पी सब अनजाने- से
न कहकहे, ऊँची आवाज़ें
लगते सब ये बेगाने- से
शिष्टाचार, झूठी मुस्कानें
मौन यहाँ का बड़ा है
गहना
हरियाली में बंजर बनकर
हम सीखे कब गुमसुम
रहना
खुली हवा है चुप
दीवारें
दीवारों से कब दर्द
झाँकता
खिड़की बंद है, बंद दरवाज़े
किसकी पीड़ा कौन आँकता
-0-

जिया हुआ सत्य है ये कविता। दूर देश सच में यही महसूस होता।
ReplyDeleteहार्दिक आभार बहन !
Delete"खुली हवा है चुप दीवारें / दीवारों से कब दर्द झाँकता
ReplyDeleteखिड़की बंद है, बंद दरवाज़े / किसकी पीड़ा कौन आँकता" - बहुत सुंदर, भावपूर्ण पंक्तियाँ! हार्दिक बधाई और शुभ कामनाएँ!🙏💐
यह भी हृदयस्पर्शी कविता है। बधाई भाईसाहब। विदेश के जीवन का यह कटु सत्य है। दुर्भाग्यवश हमारा देश भी इसी संस्कृति के पीछे तेजी से बढ़ता दिख रहा है। डाॅ. पुरुषोत्तम श्रीवास्तव 'पुरु'
Deleteहार्दिक आभार बन्धुवर!
Deleteअपना देश, अपना ही है! सत्य को दर्शाती सुंदर कविता आदरणीय भैया जी!
ReplyDelete~सादर
अनिता ललित
हार्दिक आभार बहन !
Deleteयथार्थ अनुभूति की अभिव्यक्ति, बढ़िया रचना सर, बधाई
ReplyDeleteहार्दिक आभार ! आपने अपना नाम नहीं लिखा।
Deleteबहुत ही सुन्दर, भावपूर्ण लिखा है आपने अंकल जी
ReplyDeleteहार्दिक बधाई आपको।
हार्दिक आभार ! आपने अपना नाम नहीं लिखा।
Deleteसत्य ! नितांत सत्य ! बहुत ही अच्छी कविता है.🙏
ReplyDeleteहार्दिक आभार ! आपने अपना नाम नहीं लिखा।
Deleteरीता प्रसाद
ReplyDeleteकिसकी पीड़ा कौन आंकता बहुत बढ़िया। यही हाल अब दिल्ली जैसे महानगरों का भी है। सड़क पर शोर है,। रिश्तों में खामोशी है पड़ोसी को नहीं पता पड़ोस में रहता कौन है डॉ वंदना शर्मा नई दिल्ली
ReplyDeleteवाह, 'फिर भी अपना मुलुक है प्यारा' अपना देश सारी आपाधापी और गहमा गहमी के बावजूद अपनी माटी की गंध और आत्मीयता में जो सुख है वह कहीं नहीं, क्योंकि 'हरियाली में बंजर बनकर
ReplyDeleteहम सीखे कब गुमसुम रहना'। राष्ट्र प्रेम के भाव से ओतप्रोत सुन्दर रचना भाई साहब। आपको प्रणाम 🙏
अनुभव की सहज अनुभूति सर.. परदेस में मन की व्यथा का सटीक चित्रण।
ReplyDeleteबहुत बढ़िया चित्रण। हार्दिक बधाई भाईसाहब
ReplyDeleteबहुत अच्छी रचना, हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं डॉ कविता भट्ट शैलपुत्री
ReplyDeleteसबके प्रति आत्मीय आभार
ReplyDeleteयह हमारी भी आपबीती है । कभी तो लगता है हम कहाँ आ गये । बहुत खूब भैया । बधाई ।
ReplyDeleteबहुत मार्मिकता से भरी रचना है. देश के बाहर जाकर ही कोई व्यक्ति यह अनुभूति कर सकता है अन्यथा देश में रहकर तो अपने देश की बुराइयां ही दिखाई देती हैं।
ReplyDeleteबहुत सुंदर रचना है।
इस बात को तो शिद्दत से महसूस करती हूँ कि अपना मुल्क सबसे प्यारा है। बहुत सुन्दर भाव
ReplyDeleteकिसकी पीड़ा कौन आंकता - बहुत सुंदर भाव। यही सब पसरा हुआ है आस- पास।
ReplyDeleteवाह बहुत सुन्दर कविता... देश से दूर रहने वाला ही देश की अहमियत जान पाता है.
ReplyDeleteसत्य वचन भाई साहब, यहाँ चाहे कितने ही साधन हो, अपने देश सी ऋतुएँ नहीं, वो स्वाद नहीं और वो आत्मीयता नहीं! बहुत सुंदर अभिव्यक्ति 🌹
ReplyDeleteअपने मुल्क में जीना जैसे चहकना. दुसरे मुल्क में जीना मानो बेमन से सब चुपचाप सुनना और गुमसुम रहना. बहुत अच्छा लिखा आपने .बहुत बधाई .
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