पथ के साथी

Tuesday, May 17, 2011

उजाले की किरनें


लाडो बिटिया जो आज के दिन दुनिया में आई थी ।

शब्दों के उजाले की किरनें  धरती पर जगाई थी ॥

इस दुनिया ने था जाना उसे हर-दीप के नाम से  ।

हमने तो उसमें सगी बहन की पाक सूरत पाई थी ॥

आज के दिन कहता है दिल -तू ऐसा उजाला बने ।

रौशन हो सारा यह जग ,रोज हर पल दिवाली मने॥                                         आज डॉ हरदीप कौर सन्धु का जन्म दिन है ।इस अवसर पर  इनका पंजाबी ब्लॉग http://punjabivehda.wordpress.com/2011/05/17/ਧੀਆਂ-ਧਿਆਣ
और हिन्दी ब्लॉग http://shabdonkaujala.blogspot.com/2011/05/blog-post_17.html भी देखिए ।
असीम शुभ कामनाओं के साथ
काम्बोज

Friday, May 13, 2011

अवधी हाइकु:रूपान्तर- रचना श्रीवास्तव



1-रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’
रूपान्तर : रचना श्रीवास्तव

1
दैईके नेह
दिन रात पीर  कै
फसल काटे 
2
बुढाय गये
लुटाय दिन्ह सब
कछु न पाये
3
बेटवा रहे 
करेजा के टुकरा
भुलाय गये
4
दै कै अमृत
सीचिस कुल रिस्ता
पईस विस 
5
मईया  याद
मन्दिर कै   दियवा
जरे हमेसा 
6
खेतवा हसें
दुरिया कै  तलक
खुस सीवान
7
मस्ताने खेत
मुडिया  कै  डुलावें
पाक  बालियाँ
8
काटे फसल
नाचत  जवनवा
बाजत  चंग
9
चन्दा रतियाँ
 गावें  खलिहनवा
सुने  गनवा
10
ढोल कै थाप
भाँगड़वा  कै जोस 
बंहियाँ डोले
11
चुकाई काव
जौउन तू दिहऔ
हम लिहन
12
तोहार हँसी 
भिगाय दे हमरा
मनवा
-प्रान
13
गीली अँखियाँ
लौउटाये दे चैन
मीठ बतियाँ
14
रिस्तों कै डोर
परेम मा लिपटी
उज्जर भोर
15
कल्हियां मिले
पहिचानल लागे
नीक विचार
16
तुहीं जोडैव   
पवितर हृदय
कै, नीक रिश्ता
17
आज कै दिन
ईश्वर दिहिन ज्यों
सरग राज
 
-0-
2- सुधा गुप्ता के हाइकु
रूपान्तर : रचना श्रीवास्तव
1
पेड़वा बान्धे
फुलवा केरी डार
लागे बारात
2
अमवा  पात
तपत लोहवा - सा
उकसावत 
3
किसोरी डार
किसलय लपेट
सरम लाग
4
फुलवा टोपी
हरियाली कै कुर्ता
दुल्हा वसन्त
5
फुलवा भरी
अनरवा कै झारी
लज्जा निहुरी
6
मीठ कै बोली
नाचत  बयार  मा
बुलबुल कै
7
चेरी पेड़वा
गुलाबी फुलवा से
खूबय सजा
8
भभक गैय
बुरूँश-फुनगी पै
चिनगारियाँ
9
चनार -पात
कहाँ पाईस आग    
बतावा जरा
10
दियवा लागे
घटिया मा खिलत
डैफ़ोडिल  हैं
11
बोगनबिला
के मरोरिस गार
कउन मिला
12
फूटी कोंपल
अंजीर कै पेडवा
कूका ‘बसन्ता’-
13
नाचत हवा
बजावत डफली
प्रेमी महुआ
14
बसौउडा मा 
बौरान  हवईया
 मारत सीटी
15
फुलवा  राखी
कलाई मा सजाये
खुस बसन्त
16
अमवा डारी
कोयलिया गावत
आग लगावे
-0-
बसौउडा=बाँसों के वन
-0-
3-डॉ हरदीप सन्धु
रूपान्तर : रचना श्रीवास्तव

1
तडपी हम
जैईसन मछरी
तोहरे बिना
2
मिलै बुंदिया
तोहरे पियर कै
अचरा भरी
3
जिन्नगी भर
बनयो परछाई
दुःख -सुख मा
4
सपनवा मा
भी, गरवा लगाऊँ
अपनन का
5
कँटवा बोये
उनहूँ  माफ़ करा
गरवा लगा
6
पियार नाही
पनिया बुलबुला
फुटि जो जाये
7
हिलत  नाही
जडिया पियार कै
तुफन्वा आवे
8
दरद  भगा
सीच दिहौ  पिरेम
से, जीवनवा
9
दुःख -दरद
पिरेम दवईया
कष्ट मिटावे 
10
मन मा आसा
पिघलन जो लागी
मोम जैसन
11
गलती भई
जीवन कै किनारा
बन ना पाईस 
12
दिलवा टूटे
तो आपन इच्छा के
मरे न दिहौ
-0-
 

Monday, May 9, 2011

नील कुवलय -से नयन



नील कुवलय -से नयन
-रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'

नील कुवलय -से
तुम्हारे
ये अधमुँदे नयन
कितने पावन
बुनते सपन 
डूबे मदिर
कल्पना के रंग में
और गहरी झील -सा
अपना यह मन ।
भोर की स्वर्ण किरने
लगी मुख चूमने,
आज फिर भी
ये नयन हैं अनमने
लहर -सुधियाँ
कई जन्मों से जुड़ी
रूप का कर रही
अनवरत आचमन ।

 फिर जनम
मिला हमें
तो फिर मिलेंगे ,
अधखिले ये कमल
फिर-फिर खिलेंगे
भूल नहीं पाया
अभी तक
उर यह आकुल
मृदु  स्पर्श
तरल स्मित की चितवन।

Friday, May 6, 2011

भाव-धारा


                         
1
बिना कहे जो सब कुछ कह जाते हैं

बिना दोष जो सब कुछ सह जाते हैं ।
दूर  हैं पर दिल के क़रीब रहते हैं
उनको हम अपना नसीब कहते हैं ।
-मुमताज-टी एएच खान
2

सपना ही सही ,सजाए रखिए  
ज़िन्दगी का भ्रम, बनाए रखिए   
हसरतें हज़ार हैं, ज़िन्दगी है 
                              कुछ तो उम्मीद , बचाए रखिए ।                                                 -रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

Sunday, May 1, 2011

ताँका गीत


 रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

थके न काँधे
कभी बोझ से किसी
दूर आ गया ,
तुम्हारे आँसुओं में
डूबा पाहन -मन । 1

पारदर्शी है-
तुम्हारा आचरण,
शुभ चिन्तन,
लोग देते ठोकरें
कितने हैं निर्मम ! 2

रोया नहीं मैं
कि पथ में शूल हैं,
नहीं झिझका
कि नभ में धूल है
या है कोई चुभन ।3

हों नैन गीले
टिका लो  माथा यह
काँधे पे मेरे
प्रतिकूल है जग
मैं करूँगा सहन ।4

उसी ताप से-
पिंघल ,मैं जी लूँगा
खारे ही सही
भर ओक पी लूँगा
करके आचमन ।5

पास होते जो
तुम ,सब जानते
पहचानते
मैं भी रोया ,मानते
प्यार,अपनापन ।6

प्राण हो मेरे
अब न रोना कभी
आँसू तुम्हारे
हैं सागर पे भारी
घुमड़ते ये घन ।7

बहा जो नीर
कह गया था पीर
मैं था अधीर
बींध गया था मन
अधरों का कम्पन ।8

लो पोंछ  आँखें
गर्म जल में जग
जाएगा जल
ऐसा चढ़ेगा ज्वार
डोलें धरा -गगन ।9

मोती ये तेरे
इनको खोना नहीं
यूँ रोना नहीं
लोग चाहते नहीं-
खिले कोई चमन ।10
 -0-

Wednesday, April 27, 2011

ताँका


रामेश्वर काम्बोज ’हिमांशु’
ताँका  जापानी काव्य की कई सौ साल पुरानी काव्य शैली है । इस शैली को नौवीं शताब्दी से बारहवीं शताब्दी  के दौरान काफी प्रसिद्धि मिली। उस समय इसके विषय धार्मिक या दरबारी  हुआ करते थे । हाइकु का उद्भव इसी से हुआ । इसकी संरचना 5+7+5+7+7=31वर्णों की होती है।एक कवि प्रथम 5+7+5=17 भाग की रचना करता था तो दूसरा कवि दूसरे भाग  7+7 की  पूर्त्ति के साथ शृंखला को पूरी करता था फिर पूर्ववर्ती 7+7 को आधार बनाकर  अगली शृंखला में 5+7+5 यह क्रम चलता;फिर इसके आधार पर अगली शृंखला 7+7 की रचना होती थी । । इस काव्य शृंखला को रेंगा कहा जाता था । इस प्रकार की  शृंखला सूत्रबद्धता के कारण यह  संख्या 100 तक भी पहुँच जाती थी
1-बाँस का वन
बाँस का बन
चिर्-चिर् करता रहा
डूबता मन
ढक देते हैं शिला
सुग्रीव जैसे जन।
-0-
2-झील का जल
1
झील का जल
रातभर उन्मन
तट निर्जन
उगा  न आज चाँद
किनसे बातें करें!
2
हो गई भोर
सूरज पुजारी-सा
आया नहाने
झील है पुलकित
मिलन के बहाने
3
बोला कोकिल
तरु की डाल पर,
लाज तिरती
झुरमुटों के पाखी
चुहुलबाजी करें








4
हुए सिन्दूरी
लहरों के भी छोर
छलक गए
वे नयन निर्मल
झील के पल-पल
-0-