लिबास/डॉ. कनक लता मिश्रा
एक-एक हर्फ़ जोड़े,
ज़िंदगी से माँगकर,
उनसे शब्द बनाए,
शब्दों को सिलकर एक लिबास बनाया,
अपनी नाप का लिबास।
ख़ूब सजाया,
ख़ूब सँवारा,
अपने भावों से,
कुछ ख़ुशियों को टाँककर
कसीदाकारी की,
सुन्दर बूटे बनाए,
छोटे-बड़े कई सारे।
कुछ दुखों के पैबंद लगाए,
कुछ दबे हुए एहसास भी निकाले,
उन्हें धोया, सुखाया,
उनसे गोटे बनाए।
कुछ तज़ुर्बों के शीशे को काट-छाँटकर,
प्रेम के धागे से टाँके लगाए,
कुछ यादों की चुन्नटें बनाईं,
कुछ रस्मों-रिवाजों की झालर बनाई,
मोह, माया, ममता की डोरियाँ बनाईं,
कुछ ख़ौफ़, कुछ दहशत भी निकाले
और उनकी ज़ेबें बना डालीं,
और फिर तैयार हुआ लिबास,
शब्दों का लिबास,
जो मेरा अपना है,
मेरे मन का है।
और भी बहुत कुछ बाकी है,
पर इस बार बस इतना ही…
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बहुत धन्यवाद सहज साहित्य, मेरी साधारण सी रचना को स्थान देने के लिए 🙏☺️
ReplyDeleteशब्दों का लिबास,
ReplyDeleteजो मेरा अपना है,मेरे मन का है। बहुत खूबसूरत । हार्दिक बधाई आपको ।सुदर्शन रत्नाकर
'लिबास' - डॉ. कनक लता मिश्रा
ReplyDeleteडॉ. कनक लता मिश्रा की कविता 'लिबास' आत्म-अभिव्यक्ति का सुंदर रूपक है। कवयित्री ने जीवन से एक-एक हर्फ़ माँगकर, शब्दों को सिलकर अपनी नाप का लिबास तैयार किया है।
इस लिबास में खुशियों की कसीदाकारी है, तो दुखों के पैबंद भी हैं। दबे एहसासों को धो-सुखाकर गोटे बनाए गए हैं, तजुर्बों को काट-छाँटकर प्रेम के धागे से टाँका गया है। यादों की चुनटें, रस्मों की झालर और मोह-माया की डोरियाँ इसे पूर्ण बनाती हैं।
खौफ और दहशत की जेबें बनाना यथार्थबोध दर्शाता है। यह कविता रचनाकर्म को आत्म-स्वीकार और आत्म-निर्माण की प्रक्रिया के रूप में स्थापित करती है। डॉ वंदना शर्मा नई दिल्ली
आदरणीय सुदर्शन रत्नाकर सर और आदरणीया डॉ.वंदना शर्मा मैम, आप दोनों को ह्रदय से धन्यवाद देती हूँ जो आपने मेरी एक साधारण सी रचना को अपना स्नेह दिया... 🙏😊
ReplyDeleteकनकलता जी बहुत सकारात्मक कविता । हार्दिक बधाई आपको। सारे दुखों को सजा - टाँककर लिबास बना पहन लिया। बहुत सुन्दर।
ReplyDeleteबहुत सुंदर कृति, बधाई आदरणीया। पुरुषोत्तम श्रीवास्तव 'पुरु'
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