प्रदीप रावत
आया था
तुमसे मिलने.
तुम्हारा
हाल पूछने.
न
चिड़िया की चहचहाहट
न ही
दोस्त तुम मिले....
हर
आँगन , हर घोसला ,
हर खेत
तुम्हारे मुझे सूने मिले..
कभी
आँगन महकता था फूलों से
अब वे
सारे फूल मुझे मुरझाए मिले
हर
पत्ता , हर डाल सूखे
हर
धारा , हर नौला सब सूखे ही रहे।
कभी
चौपालों का भरा था हर आँगन
आज सब
वे आँगन मुझे झाड़ों से पटे दिखे...
मेरे
दोस्त मेरे हमदम
मेरे
उत्तराखण्ड
मुझे
तेरे हर दरवाजे बंद मिले....
-0-
पौड़ी गढ़वाल उत्तराखंड

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