पथ के साथी

Friday, August 14, 2026

1509-मेरे उत्तराखण्ड

 प्रदीप रावत

 


आया था तुमसे मिलने.

तुम्हारा हाल पूछने.

न चिड़िया की चहचहाहट

न ही दोस्त तुम मिले....

हर आँगन , हर घोसला ,

हर खेत तुम्हारे  मुझे सूने मिले..

कभी आँगन महकता था फूलों से

अब वे सारे फूल मुझे मुरझाए मिले

हर पत्ता , हर डाल सूखे

हर धारा , हर नौला सब सूखे ही रहे।

कभी चौपालों का भरा था हर आँगन

आज सब वे आँगन मुझे झाड़ों से पटे दिखे...

मेरे दोस्त मेरे हमदम

मेरे उत्तराखण्ड

मुझे तेरे हर दरवाजे बंद मिले....

-0-

पौड़ी गढ़वाल उत्तराखंड


3 comments:

  1. बहुत सुंदर कविता आपकी पंक्तियों ने दिल को छू लिया,🙏🏻🙏🏻 आशा करती हूं कि आगे भी ऐसी कविताएँ पढ़ने को मिलती रहें 🙏🏻🙏🏻

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  2. जलवायु परिवर्तन या विकास का नतीजा? परिवर्तन जीवन का सत्य है

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  3. सच है, पहाड़ों की वो ख़ूबसूरती को नज़र ही लग गई है जैसे...
    सुंदर भाव लिए कविता!

    ~सादर
    अनिता ललित

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