पथ के साथी

Friday, September 4, 2026

1520

 परदेसी कान्हा/ शशि पाधा 

 


कैसा उत्सव, कैसी होली 

कान्हा तो परदेस गए 

राधा से पूछें हमजोली 

लौट आने को क्या कह ग ?


भूलके सारा साज शृंगार 

राधे ने हँसना छोड़ दिया  

कलकल बहती यमुना की  

लहरों ने बहना छोड़ दिया 


सब गैयाँ इत-उत ढूँढ रही 

किस नगर-डगर गोपाल गए 

कब लौटेंगे, क्या  बोल ग ?


सूनी- सी गलियाँ गोकुल की 

मुरझाया- सा है नंदनवन 

ग्वाल-पाल सब मौन पड़े 

निर्जन- सा लगता वृन्दावन 

 

मुरली की तानें मौन पडीं 

क्यों कान्हा इतने निठुर हुए?


मटकी में माखन दूध लिये 

आ मात यशोदा  द्वार खड़ी 

क्यों देर हुई अब आने को 

अँखियाँ डग में जडीं-जडीं 

 

 राजपाट ने कैसा बाँधा

 क्यों माँ की ममता भूल ग ?

-0-

वर्जीनिया, यू एस ए 

Email: shashipadha@gmail.com

1519-कन्हैया

 1- ओ कन्हैया /डॉ. कनक लता मिश्रा 

 


ले लो अपनी शरण में कन्हैया 

रखलो हमको भी पलको की छइयाँ

ओ कन्हैया…

सौप दिए अपने सब रंग तुमको 

अपने ही रंग में अब रँग लो ना हमको 

कुछ भी मेरा ना मैं क्या दूँ रंगया 

ओ कन्हैया 

ले लो अपनी…

 

अपना नहीं जग में कुछ भी ओ कृष्णा 

मन से मिटे मोह माया न तृष्णा 

पार तुम ही करो मोरे बंसी बजया 

ओ कन्हैया 

ले लो अपनी…

 

झूठ कपट छल में डूबा जगत् है 

बिखरा जीवन में बिखरा अँधेरा विकट है 

लिखके कान्हा भरो मोरी कोरी चुनरिया 

ओ कन्हैया 

ले लो अपने..

-0-

ओ कान्हा! आया जन्मदिन तेरा/ डॉ. वंदना शर्मा

 


ओ कान्हा! आया जन्मदिन तेरा

फूल चढ़ाऊँ, माखन खिलाऊँ

घर को सजाऊँ, बता

तुझे कैसे रिझाऊँ

 

ओ कान्हा! आया जन्मदिन तेरा

फल चढ़ाऊँ, मेवा चढ़ाऊँ

मन के सुमन भी सारे

तुझे अर्पण कर जाऊँ

बता तुझे कैसे रिझाऊँ

 

ओ कान्हा, आया जन्मदिन तेरा

भजन गाऊँ, आरती गाऊँ

सुबह शाम, आठो याम

नाम तेरा बस रटती जाऊँ

बता तुझे कैसे रिझाऊँ

 

ओ कान्हा! आया जन्मदिन तेरा

 

सबकी बिगड़ी बनाए

मुरली ऐसी सुनाए

पल में कर दे

खुशियों की छाँ

बता तुझे कैसे रिझाऊँ

ओ कान्हा आया जन्मदिन तेरा

vandna.reporter@gmail.com

 

Wednesday, September 2, 2026

1518-नेपाल त्रासदी

  अंजू खरबंदा

 




सब कुछ तो बह गया...

पहाड़ों से उतरता पानी

अपने साथ

मिट्टी, पत्थर, पेड़

और कितने ही आशियाने

बहा ले गया!

 

किसी घर की दीवारें ढह गईं,

किसी घर की छत उड़ गई,

किसी घर का आँगन

मलबे में दब गया!

 

मगर देखो...

वह एक घर

अब भी अडिग खड़ा है

 

चारों ओर तबाही है,

पानी का सैलाब है,

मलबे का पहाड़ है,

और उसके बीच

वह चुपचाप खड़ा है!

 

लोग कह रहे हैं

मजबूत नींव रही होगी,

कॉलम-बीम मजबूत रहे होंगे,

पानी का बहाव

शायद दूसरी ओर मुड़ गया होगा।

 

हाँ...

यह सब सच हो सकता है

लेकिन

एक सच और भी तो है,

जिसे विज्ञान

शायद नाप न पाए...

 

कभी-कभी

ईश्वर अपनी उपस्थिति

इसी रूप में भी दिखाते हैं

 

जब चारों ओर

तूफ़ानी बहाव हो,

तब किसी एक छत का

यूँ सुरक्षित रह जाना

महज़ संयोग तो नहीं!

 

शायद किसी माँ की प्रार्थना,

शायद किसी बच्चे की दुआ,

शायद किसी बुज़ुर्ग की

मौन प्रार्थना...

 

कौन जाने,

किसकी दुआ ने

उस घर को थाम लिया हो!

 

यहाँ महसूस होता है

ईश्वर का अद्भुत चमत्कार...

 

प्रलय चाहे जितनी बड़ी हो,

अगर ऊपरवाला

हाथ थाम ले,

तो मलबे के समंदर में भी

एक आशियाना

सुरक्षित रह जाता है।

-0-

Monday, August 31, 2026

1517-तुम बिन नैहर छूटा

  डॉ . पूनम चौधरी



तुम बिन नैहर छूटा पापा....

सारे उत्सव फीके तुम बिन,

मन के कोष भी रीते तुम बिन

नेह के बंधन टूट गए सब 

बदली हर परिभाषा 

तुम बिन नैहर छूटा पापा 

 

तुमसे हर विश्वास जुड़ा था,

जीवन का उल्लास जुड़ा था,

तुम से थी रौनक उस घर की 

मायके का एहसास जुडा था।

तुम रूठे तो रूठ गया सब 

रूठ ग हर  आशा,

तुम बिन नैहर छूटा पापा 

 

तुम थे तो सुख-साज बड़े थे,

आशीषों से भाग्य जड़े थे ,

आँसू, पीड़ा, हार, व्यथा सब 

ड के हमसे दूर खड़े थे,

छोड़के बंधन, मोड़ के मुख को,

 तोड़ गए हर नाता,

पापा, बहुत कठिन है जीना,

कैसे धरु दिलासा,

तुम बिन नैहर छूटा पापा

 

मन में साहस भरा था तुमने 

सही गलत का भेद सिखाया।

कभी डाँट और कभी प्रेम से 

जीवन कुंदन सा चमकाया

बिना तुम्हारे सब बदले है 

बदली सबकी भाषा,

 अब ना रहा अधिकार भाव ही,

 ना कोई अभिलाषा।

तुम बिन नैहर छूटा पापा।

तुम बिन नैहर छूटा पापा।

 

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Friday, August 28, 2026

1516

 

तो मिले उपहार 

-डॉ. जेन्नी शबनम  


1.
राखी- त्योहार
भाई है शर्मसार
जेब है ख़ाली

कैसे ले उपहार
मँहगाई की मार।

2.

राखी है आई 

भाई है परदेस 

बहना दुःखी  

वीडियो-कॉल आया 

बहन मुस्कुराई। 

3.

स्नेह का धागा 

जोड़े रखता नाता 

भाई-बहन 

भले हों दूर-दूर 

पर प्रेम अटूट। 

4.

नन्ही बहना 

पहनके गहना 

चहक रही 

राखी पर भइया 

लाया प्यारा तोहफ़ा। 

5.

राखी त्योहार 

क्यों आता एक बार

बहना सोचे

हो हर इतवार   

तो मिले उपहार।

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Sunday, August 23, 2026

1515

 

1-परदेसी मन /  शशि पाधा 

ता- ठिकाना पूछता 

जड़ें पुरानी ढूँढता

  घूम रहा परदेसी मन ।



काकी, चाची, मामा, मौसा 

एक गली का इक परिवार 

बीच सजा वो चाट खोमचा 

आसपास बसता संसार

     रोज़ हवा को सूँघता

   खुश्बू वो ही ढूँढता 

   तड़प रहा परदेसी मन ।



जुड़ी- सटी सब छत, मुँडेरें 

आधी रातें, कथा- कहानी 

खाट, दरी, बस चादर, तकिया 

माटी-रची सुराही –पानी 


        
यादों में ही झूमता 

        छत वही फिर ढूँढता 

       पछताया परदेसी मन ।


दोपहरी की धूप गुनगुनी 

आँगन, तकिया लंबी तान 

पके रसोई चाय,कौड़ी 

सर्दी से तब बचते प्राण 

 

     उनींदा- सा ऊँघता 

     हरी चटाई ढूँढता 

     पगला सा परदेसी मन । 



संग मनाए मेले- ठेले

चौगानों में तीज, त्योहार

आपस में बाँटे थे कितने 

चूड़ी, रिब्बन के उपहार



   बिन झूले के झूलता

   ठाँव वही फिर ढूँढता

   बेचारा एकाकी मन

    -0-  वर्जीनिया, यू एस ए ,  shashipadha@gmail.com

2-

2-वर्तमान के दाग़/ डॉ.सुरंगमा यादव

 

बिना दवा के मर जाते हैं, कितने ही बीमार

कहीं नोट गद्दों में भरकर, सोते जिम्मेदार

हाय गरीबी ! उठी न डोली, देखो फिर इस बार

कबाड़ तक में जलते देखे, नोटों के अंबार


न्याय तुला पर धन- बल भारी, किससे करें पुकार

कोर्ट -कचहरी के चक्कर में, बिक जाते घर-द्वार

लगे मुखौटे कई- कई, पहचान हुई दुश्वार

बड़े निवाले खाने वाले, बच जाते हर बार

वर्तमान के दाग़ छिपाए, जाते बारम्बा

इतिहासों के काले पन्ने, दिखलाकर सौ बार

 

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Friday, August 21, 2026

1514-वह स्त्री है

 

[आपने स्त्री जीवन के संघर्ष को पीड़ा को समझा अपने शब्दों से उसके मौन स्वर को मुखरित किया। साधुवाद आदरणीय। उसी कविता की अंतिम पंक्ति से जोड़कर मैंने-‘ स्त्रीहै’  कविता अभी लिखी है।]

 

  स्त्री है /  डॉ. वंदना शर्मा 

  


वह निष्प्राण- सी है अपनी मर्यादाओं के कारण

लेकिन मरती नहीं है

क्योंकि स्त्री है 

सृजन करती है दर्द सहकर 

विनाश भी कर सकती है महाकाली बनकर 

वह  शक्ति है जग की 

उसकी जिजीविषा को कोई नहीं हरा सकता 

समाज ने डाली बेड़ियाँ पैरों में उसके 

ताकि उसकी उड़ान रोक सके; 


पर बहती हवा को
 

कौन रोक पाया है आज तक 

उसके लिए कोई व्रत नहीं रखा जाता 

कोई मन्नत नहीं माँगी जाती 

फिर भी वह  जीती है ज्यादा 

बो जाते हैं बेटे उग आती हैं बेटियाँ 

स्प्रिंग देखा है कभी आपने 

जितना दबाओं उतना उछलता है 

स्त्री की असीम शक्ति से डर 

लगाई पाबंदी पुरुष समाज ने 

पर वह  शक्ति और अधिक मुखरित हुई 

अपनी राह खुद बनाई 

वह  चांद पर जा वापिस आई 

हर अभेद क्षेत्र में परचम लहराया 

नभ अपने कदमों में झुकाया 

क्योंकि व स्त्री है 

हार नहीं सकती 

परिस्थितियाँ अनुकूल भले न हो 

वह  ड़ना जानती है 

वह  स्त्री है 

हर सीमा से परे 

हर बाधा उससे डरे 

वह  कुछ भी कर सकती है 

शक्ति बिना शिव अधूरे 

शक्ति से हो सारे कार्य पूरे 

कण- कण में व्याप्त है जो

जो ऊर्जा, जो प्राण है 

वह  स्त्री है

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