परदेसी कान्हा/ शशि पाधा
कैसा उत्सव, कैसी होली
कान्हा तो परदेस गए
राधा से पूछें हमजोली
लौट आने को क्या कह गए ?
भूलके सारा साज शृंगार
राधे ने हँसना छोड़ दिया
कलकल बहती यमुना की
लहरों ने बहना छोड़ दिया
सब गैयाँ इत-उत ढूँढ रही
किस नगर-डगर गोपाल गए
कब लौटेंगे, क्या बोल गए ?
सूनी- सी गलियाँ गोकुल की
मुरझाया- सा है नंदनवन
ग्वाल-पाल सब मौन पड़े
निर्जन- सा लगता वृन्दावन
मुरली की तानें मौन
पडीं
क्यों
कान्हा इतने निठुर हुए?
मटकी में माखन दूध लिये
आ मात यशोदा द्वार खड़ी
क्यों
देर हुई अब आने को
अँखियाँ डग में जडीं-जडीं
राजपाट
ने कैसा बाँधा
क्यों माँ की ममता भूल गए ?
-0-
वर्जीनिया, यू एस ए
Email: shashipadha@gmail.com

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